M.H.D-19
हिंदी दलित साहित्य का विकास
1. निम्नलिखित काव्यांशों में से किन्ही दो की लगभग 200 शब्दों में संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए।
जो किसी अंधड़ का इंतजार करने से पहले
(ख) यदि वेद-विद्या पढ़ने की करो धृष्टता,
यदि यज्ञ करने का करो दुस्साहस,
तो छीन ली जाय तुम्हारी धन सम्पत्ति,
या, कत्ल कर दिया जाय तुम्हें उसी स्थान पर।
(ग]) वर्णाश्रम की जोंघ चाटने वाले
सतयुगी शासक अब
राजपथ के इर्द गिर्द बनी
माँदों में घुस चुके हैं।।
प्रक रही है यहाँ
मृत इतिहास की जहरभरी
चाशनियाँ, उठाते हैं वे
जिन्दगी का हर लुत्फ
और समता भरे भारत के लिए
की गई हर लड़ाई को
कहते हैं जो व्यभिचार ||
(घ) मेरे बेटे के साथ
अपने बेटे को मेजो
दिह्ाड़ी की खोज में।
और अपनी बिटिया को
हमारी बिटिया के साथ
भेजो कटाई करने
मुखिया के खेत में।
शाम को थक कर
पसर जाओ घरती पर
सूँघों खुद को
बेटे को
बेटी को
तभी जान पाओगे तुम
जीवन की गंघ को.
बलवती होती है जो
देह की गंघ से।
(ड.) मैं भागती हूँ-सब ओर एक साथ
विद्रोहिणी बन चीखती अत
गूंजती है आवज सब | में
मुझे अनन्त असीम दिगन्त चाहिए
छत का खुला आसमान नहीं
आसमान की खुली छत चाहिए!
मुझे अनन्त आसमान चाहिए!!
2. निम्नलिखित गद्यांशों में से किन्हीं दो की लगभग 200 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
(क) बालमन की यह खरोंच ग्रंथि बन गई थी। जब भी वह पच्चीस की संख्या पढ़ता या लिखता, उसे पच्चीस चौका डेढ़ सौ ही याद आता। साथ ही याद आता पिताजी का विश्वास भरा चेहरा और मास्टर शिवनारायण मिश्रा का गाली-गलौज करता लाल-लाल गुस्सैल चेहरा। सुदीप दोनों चेहरे एक साथ स्मृति में दबाए पच्चीस चौका डेढ़ सौ की अंधेरी दुर्गन गलियों में मटकने लगा। जैसे-जैसे बड़ा होने लगा, कई सवाल उसके मन को विचलित करने लगे, जिनके उत्तर उसके पास नहीं थे।
(ख) ठाकुर ने सुना तो खोपड़ी जल उठी उसकी। लगा दिमाग में जितनी भी नसें हैं वे आपस में जुड़ गयी है और वे अब फटी कि तब। वह गुस्से से बड़बड़ा उठा- “ससुरे चमार-भंगियों ने देखी कितना सर उठा रखा है...? दस-बीस साल पहले तो मुँह में जबान ही जैसे न थी और अब कहते हैं गाँव में कोई ठाकुर-वाकुर नहीं....।”
(ग) “क्यों पिल पड़ते हो इस तरह खाने पर।” बाद में हरखू ने उसे समझाने की कोशिश की थी, “यह ठीक है कि हम लोग देवताओं की तरह धूप सुगः्ध और फल की खुशबू सूँघकर रह सकते। हमें एक पेट भात चाहिए ही चाहिए। लेकिन क्या इस तरह जलील होकर? यह भी ठीक है, हमें कभी बढ़िया खाना नसीब नहीं होता और बाबू लोगों के यहाँ किसी अवसर पर ही ऐसा खाना मिलता है।” लेकिन गंगाराम ने बात काट दी थी। कहा था, “काका, मैं सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं खाता। मैं खा-खाकर इतना मोटा, इतना ताकतवर हो जाना चाहता हूँ कि मुझे जो लड़के रात-दिन चिढ़ाते रहते हैं- गंगाराम-नंगाराम कहके - मैं अकेले उन सबों को सबक सिखा सकूँ।"
(घ) “क्या समझता है ये मस्टरवा साला, ब्राह्मण हो गया जैसे भगवान। जो है वही अंतिम है। जो बच्चा पैदा हो गया है उसके बाद फिर बच्चे होंगे ही नहीं। सतयुग-द्वापर युग की बात करेगा। नहीं बदलेगा। समय की नब्ज पहचान कर चलो, नहीं तो ब्राह्मण संस्कारी और छुआछूत के खोल में तड़प-तड़प कर मर जाएगा। समय पर परिस्थितियों से समझौता करो तमी खैर है। हवा का रूख बदल गया है, अब टाट-झोंपड़ा उड़ेगा देखना।”
3. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर लगभग 300 शब्दों में लिखिए 10045 40
(क) परिवर्तन की बात' कहानी के माध्यम से वर्चस्ववाद और शोषण की परंपरा के संबंधों को स्पष्ट कीजिए।
(ख) दलित कहानी की सोदेश्यता पर विचार कीजिए।
(ग) दलित कहानी के सामीजक, सांस्कृतिक सरोकारों को निर्दिष्ट कर सोदाहरण विश्लेषण कीजिए।
(घ) दलित उत्पीड़न के संदर्भ में स्वानुभूति और सहानुभूति के सवाल को 'आमने-सामने' कहानी के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
(ड़) अपने-अपने पिंजरे' के संरचनागत वैशिष्ट्य का उद्घाटन कीजिए।
(च) दलित आत्मकथनों की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? सोदाहरण समझाइए।
(छ) जा का दलित समाज पर क्या असर पड़ा? दलित आत्मकथनों की रोशनी में इसकी व्याख्या कीजिए।
4. निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो के उत्तर लगभग 200 शब्दों में लिखिए।
(क) “घृणा तुम्हे मार सकती है” कविता के उद्देश्य पर टिप्पणी लिखिए।
(ख) 'जनपथ' कविता के संरचना शिल्प पर प्रकाश डालिए।
(ग) दलित कहानी तथा सामान्य कहानी के अंतर को स्पष्ट कीजिए।
(घ) दलित स्त्री आत्मकथा के वैशिष्ट पर प्रकाश डालिए।
(ड.) प्रेमचंद तथा दलित कहानिकारों की कहानियों में मुख्य अंतर क्या है। स्पष्ट कीजिए।
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