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दलित कहानी के सामीजक, सांस्कृतिक सरोकारों को निर्दिष्ट कर सोदाहरण विश्लेषण कीजिए।

दलित कहानी के सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकार दलित साहित्य में पाचना व निरोहता का कोई स्थान नहीं है। यह वेदना को आक्रोश में परिवर्तित करता है। दलित कहानियाँ धर्म एवं संस्कृति की परंपराओं द्वारा निर्धारित नैतिक मूल्या व मानदंडों को अस्वीकार करती हैं। इन कहानियों में घृणा तथा हिंसा के कृत्यों की अवहेलना की गई है तथा करुणा एवं बंधुत्व के भाव पर बल दिया गया है। यही आधार दलित कहानी की सामाजिक एवं सांस्कृतिक सरोकार भी है तथा वैचारिक प्रतिबद्धता भी वर्ण व्यवस्था एवं जातिवाद की समाप्ति तथा ईश्वर-भाग्य एवं पुनर्जन्म जैसी काल्पनिक बातों की अस्वीकृति ही दलित कहानी का मुख्य उद्देश्य है भाग्यवाद से जोड़कर व्यवस्था के नृशस स्वरूप का अनावरण करना दलित कहानियों का दायित्व समझा गया है।

दलित कहानियों से संपूर्ण परिवर्तन की अभिलाषा झलकती है। ये कहानियाँ उम्बल भविष्य दृष्टि का विकल्प प्रस्तुत करती है। बाबासाहेब चेतनामय आंदोलनों में नारा दिया है शिक्षित बनो संघर्ष करो संगठित हो। यह उद्देश्य दलित कहानियों में सार्थक होता दिखाई देता है। दलित कहानियों का मुख्य उद्देश्य दलितों में चेतना का प्रसार और परिवर्तन की ओर अग्रसर करना “यह अंत नहीं” ग्रामीण दलित स्त्री चेतना की प्रामाणिक कहानी है। यदृष्टि रखने वाले पर साहित्य के माध्यम से आक्रमण करतो है। दुश्मन की बेशर्मा को उसके डर का रूप देती है। रचनाकार ने पंचायती राज व्यवस्था को नाकामी तथा उसके अनुचित कार्यों तथा का आरीको से विश्लेषण किया है।

कहानी में वर्णन किया गया है कि गाँव का विसन दलित है, लेकिन वह अगड़ों और सामंतों का मोहरा बनकर रह गया है। इस स्थिति में उसकी पत्नी विरमा को न्याय की आशा नहीं है, परन्तु उसकी बाककुशलता ने उम्मीद की रोशनी का प्रसार किया। सभी ने मिलकर कहा, ‘ना बिरमा यह अंत नहीं है, तुमने हमें ताकत दी है। हार को जीत में बदलेंगे, लोगों में विश्वास जगाकर, ताकि फिर कोई बिसन मोहरा न बने।’ दलित आत्मकथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने समाज को व्यवस्था के प्रति अपनी सजगता का परिचय देते हुए संरचना तंत्र को हर घड़ी को यथार्थता को समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया। डॉ. अंबेडकर ने गाँवों को भारतीय संविधान एवं गणतांत्रिक प्रणाली के विकास में अवरोधक माना था। उनके विचार में गाँवों में ही पूँजीवादी तथा ब्राह्मणवादी व्यवस्था की उत्पत्ति होती है। डॉ. अंबेडकर के शब्दों में, “भारतीय गाँव हिंदू-व्यवस्था के कारखाने हैं। उनमें ब्राह्मणवाद, सामंतवाद और पूँजीवाद की साक्षात अवस्थाएँ देखी जा सकती हैं, उनमें स्वतंत्रता समता और बंधु लिए कोई स्थान नहीं है। दलित कहानियाँ जातियांध के परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डालती है।

दलित साहित्य का यह विशिष्ट रूप लेखकों का उत्तरदायित्व निश्चित करता है तथा दलित कहानियों के सामाजिक, सांस्कृतिक सरोकारों को दृढ़ बनाता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी शवयात्रा से उनकी वैचारिक परिपक्वता का बोध होता है। उन्होंने दलितों के मानस में उठ रहे अन्तर्विरोध तथा अंबेडकरवादी संगठनों के आडंबर का बेबाकी से वर्णन किया है। दलित कहानी की वैचारिको अतुलनीय है दलित रचनाकारों का वैचारिक कौशल और दलित चेतना का प्रसार दलित साहित्य की अमूल्य निधि है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘मुंबई कांड’ में वैचारिकी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। कहानी का सजग रूप दलितों में विरोध की । भावनाओं को उद्धृत करता है। कहानी का पात्र सुमेर मुंबई कांड के विरोध में जूते की माला लेकर उठ खड़ा होता है, परन्तु कदम बढ़ाते ही उसके दिमाग में विचार आता है, ‘अरे मैं बह क्या कर रहा हूँ। मुंबई में किसी ने मेरे विश्वास पर चोट को और मैं यहाँ किसी की आस्था पर चोट करने जा रहा है। कुछ गांधी को बापू कहते हैं और अंबेडकर को ‘बाबा’? वहाँ ‘बाबा’ कहने वाले मारे गए, यहाँ बापू वाले मारे जा सकते हैं। ‘बाबा’ कहने वालों भी गाज गिर सकती है। जो भी हो मारे तो निर्दोष हो जाएंगे नहीं यह रास्ता न बुद्ध का है और न ही अबेडकर का।’

दलित कहानियों में हिंदू व्यवस्था का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया गया है। दलित कहानियों की भाषा-शैली तथा स्तर को अनुपयुक्त बताने वालों को अपनी संकीर्ण सोच में परिवर्तन लाने के लिए आत्मावलोकन एवं पुनर्मथन की आवश्यकता है। दलित कहानों के इतिहास, सरोकार तथा मानवीय पक्षों को समझे बिना दलित कहानी के संवाद भाषाशैली एवं उद्देश्यों को समझना अनुपयुक्त है। दलित कहानियाँ पाठक के अंतर्मन तक पहुंचने में सक्षम एवं समर्थ हैं। इनमें अस्मिता गौरव व अधिकारों के लिए संघर्ष का विवरण विस्तृत रूप में दिया गया है, जो मानवता के आयामों का बांध कराने में सफल सिद्ध हुआ है। वर्ण आधारित व्यवस्था के चलते मानवता का लोप हो गया था।

दलित कहानियाँ यथास्थितिवाद को अस्वीकार करते हुए अंबेडकरवादी विचारधारा के आधार पर समतापरक समाज निर्माण करके नवीन अखंड भारत का निर्माण करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस प्रकार दलित कहानियाँ अपनी विशिष्टताओं और सरोकारों के द्वारा परंपरागत साहित्य से अलग दिखाई देती हैं। इनमें कथावस्तु और विशिष्टता का परिमाप अन्य कहानियों से विस्तृत है। दलित कहानियाँ समाज विभिन्न आक्षेपों को समेटे हुए हैं। न सिर्फ दलितों के जीवनानुभव, अपितु हाशिए पर जीवन व्यतीत करने के लिए विवश अन्य सामाजिक वर्गों की व्यथा कथा का चित्रण दलित कहानियों में किया गया है।

दलित कहानियों की कथावस्तु में वर्ण व्यवस्था तथा साम्प्रदायिकता के अंतसंबंध, शिक्षण संस्थानों में दलितों के साथ हो रहा भेदभाव, ब्राह्मणवादियों एवं यथास्थितिवादियों का नकार, पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्रियों के अधिकार ग्रामीण एवं शहरी जीवन में अंतर अन्तर्जातीय द्वन्द्र, संस्कृति एवं इतिहास की पड़ताल तथा ईश्वर-धर्म एवं भाग्यवाद का नकार मुख्य रूप से सामान्यतः हर कहानी में पाए जाते हैं। दलित कहानियों का मुख्य पहलू परस्पर घृणा एवं हिंसा का भाव छोड़कर प्रेम एवं सहिष्णुता का प्रसार करना है। दलित कहानियों के सरोकारों को जानने-समझने के लिए आंदोलनकर्ताओं को जीवन समय के यथार्थ को जानना आवश्यक है, इसका विशिष्टता असमानता से परिपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को एक समतापरक सामाजिक व्यवस्था में रूपान्तरित करने हेतु निहित है।

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