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ठाकुर ने सुना तो खोपड़ी जल उठी उसकी लगा दिमाग में जितनी भी नसें हैं वे आपस में जुड़ गयी है। ………….? दस-बीस साल पहले तो मुँह में जबान ही जैसे न थी और अब कहते हैं गाँव में कोई ठाकुर-वाकुर नहीं।

प्रस्तुत गद्य मोहनदास नैमिशराय की आवाजें से लिया गया है | दलित चेतना के प्रसार के संबंध में गांव और शहर के आपसी रिश्तों पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। प्राप्त अवसरों का लाभ उठाकर दलित समुदाय के जो लोग गांव छोड़कर शहर में जा बसे उनमें से कुछ ने आवाजाही का संबंध बनाए रखा। इसमें भी मुख्यतः दो वर्ग थे। गांव से संबंध रखने वाले कुछ ऐसे थे जो अब गांव के प्रति हिकारत का भाव रखते थे।

कुछ ऐसे भी थे जो ग्रामीण दलितों की दशा से क्षुब्ध थे, परिस्थितियों को समझते थे और अपने समुदाय को दोन देने, कोसने की बजाए उनमें नई रोशनी, नया जज्बा पैदा करने का प्रयास करते थे। 

‘आवाजें में मेहतर समुदाय के जिस इतवारी के यहाँ से बदलाव की आवाज उभरी है उसका श्रेय इतवारी के उस लड़के को दिया गया है जो शहर से गांव पहुंचा है, “रोज-रोज इतवारी के घर पर ही पंचायत होती है। उसका लड़का शहर से आया है। उसी का काम हो सकता है।” एक कहावत है कि सौ बुझे हुए दीपक मिलकर एक दीपक को नहीं जला सकते जबकि एक जला हुआ दीपक सौ बुझे हुए दीपकों को जला देता है।

इतवारी का लड़का यही दायित्व निभा रहा है। ठाकुरों को इस अप्रत्याशित परिघटना पर अचरज होता है। वे समझ नहीं पाते कि जो मेहतर आज तक उनके सामने मुंह भी नहीं खोलते थे वे काम पर आने से मना कैसे कर सकते हैं। दास को अपनी दासता का एहसास विद्रोह की पहली सीढ़ी है। मेहतरों के साथ यही हुआ। उन्हें उनके ही परिवार के किसी सदस्य ने एहसास करा दिया। इस एहसास की जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई। एक उदाहरण देखें। इतवारी को काम पर बुलाने ठाकुर का कारिन्दा आया हुआ है। आपस में बातचीत चल रही है:

“इतवारी तुझे ठाकुर ने बुलाया है……

कारिन्दे के पहली बार कहने को इतवारी ने अनसुना कर दिया था। तब दोबारा कारिन्दे ने उसी लहजे में कहा तो वह उबल सा पड़ा

“कौन ठाकुर….?”

“गांव में कौन ठाकुर है तुझे पता नहीं…..?”

कारिन्दा क्षण भर में ही भड़क उठता है.

“नहीं, हमें कुछ पता नहीं। अब कोई किसी की ठकुराहट नहीं चलती है, सब अपनेअपने घर में आजाद हैं।”

“क्या….?”

“कारिन्दा अब पूर्ण रूप से गर्मा गया था। उसे सपने में भी विश्वास न था कि इतवारी, जिसकी उम्र मैला ढोते-ढोते तथा दूसरों की जूठन खाते-खाते बीत गई वह ऐसा भी कह सकता है।"

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