दलित साहित्य की उत्पत्ति का कारण समाज में फैले शोषण, अत्याचार, प्रताड़ना और उनका बहिष्कृत जीवन है दलित रचनाकार ज्यादातर गाँवों से निकले हुए ग्रामीण हैं। उन्होंने समाज में जातिवाद का घिनौना रूप देखा है और उसी वास्तविकता का चित्रण अपनी कहानियों में दलित रचनाकारों ने किया है।
‘परिवर्तन की बात’ सूरजपाल चौहान की कहानी है। इन्होंने अपनी कहानी में उस नई जागृति को दर्शाया है, जो दलित वर्ग में पैदा हो चुकी है। भारतीय सामाजिक संरचना वर्णवाद पर आधारित रही है, जिसमें प्रत्येक वर्ण के कार्य पहले से ही निर्धारित है।
शुद्ध वर्ण को सबसे निम्न वर्ण माना जाता है और सभी अवांछित कार्य जैसे गंदगी उठाना, मैला साफ करना, खेतों पर काम करना मरे हुए जानवर उठाना उनसे करवाये जाते हैं। इस वर्ग को किसी के आदेश की अवहेलना करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि कोई दलित किसी सवर्ण जाति के व्यक्ति को कार्य करने से मना करता है, तो उसे उसके लिए दण्ड भोगना पड़ता है।
सूरजपाल जी की कहानी से ठाकुरों के वर्चस्व और शोषण का अंदाजा लगाया जा सकता है, जब वह किसना को बार-बार मरी गाय उठाने को कहते हैं। उसके इंकार करने पर उसकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करवाई जाती है, किंतु इस बार किसना पक्का इरादा कर चुका है कि वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करेगा किसना की निडरता और साहस के आगे ठाकुर कुछ नहीं कर पाता किसना के स्वर में विद्रोह है।
ठाकुर उससे प्रतिशोध लेने के लिए पूरी बस्ती के चारों तरफ काँटे वाली तार लगवा देता है। उनके पानी लाने के रास्ते बंद करवा देता है। सवर्ण जाति अपनी श्रेष्ठता पर आँच नहीं आने देती और यदि कोई किसना जैसा सिर उठाकर विद्रोह करता है, तो ये अमानवीयता की हद कर देते हैं। हरियाणा के गोहाना झन्झर महमूदपुर, पलवल और महाराष्ट्र में भी इस प्रकार की अनेको घटनाएँ घटी हैं।
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