प्रस्तुत कविता ओमप्रकाश वाल्मीकी की ‘घृणा तुम्हें मार सकती है” से र लिया गया है। कवि जानता है कि ‘वर्ण व्यवस्था रेतीले द्रह से अधिक कुछ नहीं है। बस कुछ लोग हैं जो इसे अभेद्य किला बता रहे हैं। लेकिन किसी झूठ की उम्र उतनी नहीं होती, जितनी इसकी हो चुकी है, इसलिए यह किला कभी भी भरभरा कर टूट सकता है। और हर हाल में इसे टूट जाना चाहिए।
ज्यों ही ‘वर्ण व्यवस्था और उसकी कोख से जन्मी घृणा का अन्त होगा त्योंही भारतीय समाज की तस्वीर बदल जाएगी। तब एक सर्वण और एक दलित के घर की रोटी के स्वाद में अंतर बताने वाले नहीं रह जाएंगे। सवर्ण और दलित जैसे बंटवारे नहीं रह जाएंगे। प्रेमचंद जिस रा-ट्रीयता का स्वप्न देख रहे थे, वह रा-ट्रीयता आ जाएगी। प्रेमचंद ने लिखा था, “हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें जन्मगत वर्गों की गन्ध न होगी।
वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय, उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन।” प्रेमचंद के समय में दलित संज्ञा के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग होता रहा है।” प्रेमचंद भेद रहित समाज देखना चाहते थे। वाल्मीकि की यह कविता भी तीखेपन के भीतर इसी आकांक्षा को समेटे है। कविता में आगे आता है:
ये पंक्तियाँ श्रम की संस्कृति को सामने लाती हैं। दलित और अन्य सर्वहारा वर्ग के लिए रोटी के मायने ही कुछ और होते हैं। वे रोटी का जुगाड़ अपने रक्त का पसीना बनाकर करते हैं। वे जानते हैं कि वर्णवादी और पूँजीवादी शोनकों की निगाह उनकी रोटी पर ही है। वे किसी भी हालत में अपनी रोटी पर शोनकों का अधिकार नहीं रहने देना चाहते हैं। और इसीलिए लड़ना चाहते हैं। वे अपनी साँसों पर अपना अधिकार चाहते हैं और ‘रोटी के फर्क को मिटाना चाहते हैं। वे बताना चाहते हैं कि फर्क तो दृटि और चेतना में है। इसे बदल लो फिर हम तक पहुँचने में कहीं कोई बाधा न होगी।
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