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अंतर-राज्यीय विवादों को हल करने के विभिन्‍न तरीकों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

 जहाँ राज्यों के हितों में संघर्ष हो, वहाँ अनेकों विकल्पों में से युद्ध एकमात्र विकल्प हो सकता है, जिसके द्वारा संघर्ष या विवाद का समाधान ढूंढा जा सकता है। समझौता-वार्ता मध्यस्थता सुलह करवाना पंच निर्णय और न्यायिक प्रक्रिया संघर्ष समाधान के कुछ उपाय हैं। परंतु, यह थ्य कि अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में संघर्ष बने ही रहते हैं, यह राज्यों के लिए आवश्यक हो जाता है कि वे अपने विवाद सुलझाने के लिए स्वयं कुछ उपाय विकसित करें तथा अन्य व्यवस्थाएँ अपनाएँ। जब संघर्ष इतना बढ़ जाता है कि युद्ध की संभावना उत्पन्न हो जाती है, तब कोई न कोई औपचारिक प्रबंध करना आवश्यक हो जाता है। कई बार राष्ट्रीय प्रतिष्ठा संघर्ष समाज के मार्ग में बाधा बन जाती है।

ऐसी परिस्थिति में आवश्यक होता है कि औपचारिक प्रक्रियाओं के अनुसार विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का मार्ग अपनाया जाए। विवादों के समाधान के लिए राजनयिक-राजनीतिक तथा न्यायिक उपाय अपनाए जाएँ। राजनयिक राज्यों में वार्ता, सदाशयता मध्यस्थता, जाँच तथा समझौता शामिल होते हैं। न्यायिक प्रक्रिया में पंचनिय और न्यायिक निर्णय शामिल किए जाते हैं। राजनयिक (कूटनीतिक) उपाय समझौता-वार्ता संघर्षरत् राज्यों के बीच वार्ता या तो द्विपक्षीय होती है या फिर बहुपक्षीय भी हो सकती है।

ये वार्ताएँ संबद्ध राज्यों के मध्य बातचीत या तो राज्याध्यक्षों/शासनाध्यक्षों के बीच प्रत्यक्ष रूप से हो सकती है या फिर उन देशों के राजदूतों अथवा विशेष प्रतिनिधियों के बीच हो सकती है। जिन राज्यों के मध्य हित-टकराव है उनके बीच में वार्ता अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के माध्यम से भी हो सकती है। वार्ता, सदाशयता, मध्यस्थता तथा समझौता इत्यादि पंच निर्णय और न्यायिक निर्णय की अपेक्षा विवादों को निपटाने के कम औपचारिक उपाय होते हैं। समझौता वार्ता प्रायः सदाशयता या मध्यस्थता से पूर्व अपनाए जाने वाला उपाय व मार्ग होता है। 

इसमें परामर्श और संचार-संबंध शामिल होते हैं। 1965 के ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते में परामर्श का प्रावधान था। 1963 के अमेरिकी-सोवियत दूरसंचार समझौते में वार्ता और परामर्श निहित थे। सदाशयता तथा मध्यस्थता -सदाशयता और मध्यस्थता दोनों के लिए एक तीसरे मित्र पक्ष की आवश्यकता होती है, जोकि विवाद सुलझाने के लिए अपनी सहायता दे सकता है। सदाशयता अथवा मध्यस्थता का प्रस्ताव या सुझाव, करने वाला कोई व्यक्ति हो सकता है या राज्य या फिर कोई अंतर्राष्ट्रीय संगठन। सदाशयता और मध्यस्थता में अंतर मामूली-सा ही होता है। सदाशयता में कोई तीसरा पक्ष विवाद में फँसे दोनों पक्षों को एक मंच पर लाकर समझौते का सुझाव देता है परंतु वह स्वयं प्रत्यक्ष रूप से समझौता-वार्ता में शामिल नहीं होता।

मध्यस्थता में मध्यस्थ की भूमिका अधिक सक्रिय होती है, जिसमें वह स्वयं वार्ता में शामिल होकर शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रयास कर सकता है। परंतु, मध्यस्थ के सुझाव बाध्यकारी नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, 1966 में ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता कराने के लिए पूर्व सोवियत संघ ने मध्यस्थता की थी। सदाशयता और मध्यस्थता का क्षेत्र सीमित होता है। इसके लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया नहीं है।  प्रयास यह किया जाता है कि विवादग्रस्त राज्य स्वैच्छिक वार्ता भागीदारी करें ताकि विवाद को सुलझाया जा सके। उदाहरण के लिए श्रीलंका-एल.टी.टी.ई. संघर्ष सुलझाने में सहायता के लिए नार्वे ने सदाशयता का सुझाव दिया था। सुलह करवाना सुलह करवाने की प्रक्रिया में जाँच और मध्यस्थता दोनों शामिल होते हैं। कोई व्यक्ति या आयोग विरोधी पक्षों में सुलह करवाने का प्रयास कर सकता है।

संयुक्त राष्ट्र ने सुलह करवाने के अनेक प्रयास किए हैं। सुलह करवाने की प्रक्रिया में अनेक उपाय उपयोग में लाए जा सकते हैं ताकि विवाद का शांतिपूर्ण समाधान तलाश किया जा सके। इसमें प्रायः तथ्यों की जाँच के पश्चात्, विवाद समाधान के सुझाव दिए जाते हैं ताकि विरोधी विचारों में सुलह करवाई जा सके।  सुलह करवाने के आयोगों का प्रावधान हेग के 1899 और 1907 के दस्तावेजों में किया गया है। इस प्रकार के आयोगों की स्थापना संबद्ध पक्षों के मध्य किए गए विशेष समझौतों के द्वारा की जाती है। यह आयोग जाँच-पड़ताल करके अपनी सिफारिशें करता है। परंतु ये सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होती हैं। बोगोटा समझौते , 1948 में भी इस प्रकार के आयोग की व्यवस्था है।

जाँच, सुलह करवाने की प्रक्रिया से भिन्न है, क्योंकि इसमें कोई सिफारिशें नहीं की जाती है। परंतु, जाँच के द्वारा विवाद से संबंधि तथ्यों का पता लग जाता है, ताकि संबद्ध पक्ष वार्ताओं के माध्यम से विवाद के समाधान का प्रयास कर सके। विवादास्पद सीमाओं के प्रश्न पर जाँच आयोग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पंच निर्णय -पंच निर्णय में विवाद कुछ ऐसे व्यक्तियों को सौंपा आता है जो कि पंच कहलाते हैं। इन व्यक्तियों को दोनों पक्ष स्वेच्छा से चुनते हैं। वे अपमा निर्णय देके में किसी कानूनी बाधा से बँधे नहीं होते हैं। परंतु, कभी-कभी ऐसे विवाद भी पंच निर्णय के लिए सौंपे जाते हैं जिनमें मात्र कानूनी सहे शामिल होते हैं।

विभिन्न देशों द्वारा हस्ताक्षर की गई अनेक संधियों में विवाद समाधान के लिए पंच निर्णय के प्रावधान पाए जाते हैं। पंच निर्णय की परंपरा शताब्दियों पुरानी है।  ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य संपन्न 1794 की जे संधि में आपसी विवादों के समाधान के लिए पंच निर्णय की व्यवस्था, की गई थी। सन् 1872 के, ब्रिटेन और अमेरिका के विवाद संबंधी अलाबामा विवाद में दिए गए निर्णय ने पंच निर्णय के महत्त्व को स्थापित एवं सिद्ध किया था।

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