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भारत द्वारा कौन सी मानव अधिकार संधियों का अनुमोदन किया गया है? नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों की अर्न्तराष्ट्रीय प्रसम्विदा (ICCPR)के अनुमादन के समय भारतद्वारा कौन सी सीमायें (Reservation) लगाई गई है

पिछले 60 वर्षों में भारत ने 15 मानव अधिकार संधियों का समर्थन किया अथवा उन पर हस्ताक्षर किए हैं (समर्थन या हस्ताक्षर करने की तिथि कोष्ठकों में दी गई हैं ।)। फिर भी, हम इस इकाई में पाँच संधियों की चर्चा करेंगे जिन्हें मुख्य (कोर) संधियों के नाम से जाना जाता है। इन्हें मुख्य (कोर) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके समर्थन करने वाले राज्य इन संघधियों द्वारा स्थापित निगरानी संस्थाओं के प्रति उत्तरदायी हैं। चूँकि, अभी तक भारत ने सभी प्रकार के उत्पीड़न तथा अन्य क्रूर, अमानवीय तथा अनादर व्यवहार अथवा सजा के विरुद्ध अभिसमय (Convention against Torture and other Cruel, Inhuman and Degrading Treatment or Punishment; CAT) का समर्थन नहीं किया है। अत: इसकी यहाँ पर चर्चा नहीं की गई है। मुख्य संधिया निम्नलिखित हैं:

1) सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय (International Convention on the Elimination of All Forms of Racial Discrimination; ICERD) (3 दिसम्बर, 1968)

2) आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा (International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights; ICESCR) (10 अप्रैल, 1979)

3) नागरिक-राजनीतिक अधिकारों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा (International Covenant on Civil and Political Rights;' ICCPR) (10 अप्रैल, 1979)

4) बाल अधिकार पर अभिसमय (Convention on the Rights of the Child; CRC) (11 दिसम्बर, 1992)

5) महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय (International Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women; CEDAW) (9 जुलाई, 1993); और

6) सभी प्रकार के उत्पीड़न तथा अन्य क्रूर, अमानवीय तथा अनादर व्यवहार अथवा सजा के विरुद्ध अभिसमय (Convention against Torture and other Cruel, Inhuman and Degrading Treatment or Punishment; CAT) (14 अक्तूबर, 1979 को हस्तांतरित)।

भारत नागरिक-राजनीतिक अधिकारों संबंधी अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा का एक सदस्य है। अक्तूबर, 2007 तक भारत ने प्रसंविदा की निगरानी संस्था मानव अधिकार समिति को केवल तीन आवधिक एिपोर्टे प्रस्तुत की हैं। पहली रिपोर्ट (जुलाई 1980 को नियत) जुलाई 1983 में; दूसरी (नियत जुलाई, 1985), जुलाई 1969 में तथा तीसरी (नियत मार्च 1992) नवंबर 1985 में प्रस्तुत की गई हैं। क्रमशः मार्च 2001 तथा 2006 में नियत रिपोर्टों की अभी प्रतीक्षा हो रही है। कई अन्य देशों की तरह भारत समय पर अपनी आवधिक रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर सका है। इसके अतिरिक्‍त जब ये रिपोर्टें विलम्ब से प्रस्तुत की जाती हैं तो वे पुरानी हो जाती

हैं। इनमें ठोस वास्तविकताएँ और मानव अधिकार उल्लंघन नहीं दर्शाएं गए होते। नागरिक-राजनीतिक अधिकारों के अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा के अंदर भारतीय दायित्वों का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भारत ने भी कई प्रतिबंध (शर्ते) लगाई हैं। वे हैं:

1) अनुच्छेद 1 के संदर्भ में भारत ने घोषणा की है कि शब्द “आत्म निर्णय" का अधिकार विदेशी नियन्त्रण वाले लोगों पर लागू होता है और प्रभुत्तासंपन्‍न राज्यों पर लागू नहीं होगा।

2) भारत का कथन है कि अनुच्छेद 9 भारतीय संविधान के खंड 22 के अनुरूप लागू होगा। फिर भारत ने यह भी कहा है कि भारतीय कानून के अंतर्गत प्रसंविदा के अनुच्छेद 9(5) द्वारा वर्णित अवैध गिरफ्तारी या कैद की क्षतिपूर्ति के लिए कोई प्रवर्तनीय कानून नहीं है।

3) अनुच्छेद 13 (विदेशियों को निष्कासन से छूट) के संदर्भ में भारत का तर्क है कि यह अनुच्छेद भारतीय संविधान के अनुरूप लागू होगा।

4) नागरिक-राजनीतिक अधिकारों के अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंविदा के अनुच्छेद 12, 19(3), 21 और 22 के संदर्भ में भारत ने घोषणा की है कि उक्त अनुच्छेद के प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 19 के प्रावधान के अनुरूप लागू होंगे।

इन प्रतिबंधों (शर्तों)ने भारत मे अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दायित्यों के कार्यान्वयन पर काफी हद तक विपरीत प्रभाव डाला है। आरंभ में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत की संविधान सभा बताती है कि वह सरकार की कार्यसूची में इन शर्तों को हटाने या परिवर्तित करने का कोई प्रयास नहीं कर रही है। आइए, हम इन शर्तों की सामग्री और निहितार्थ की जाँच करें।

प्रसंविदा के अनुच्छेद 1 के लिए भारत द्वारा लगाई गई शर्त की काफी आलोचना हुई है। भारत की शर्त पर फ्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड की सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र के पास आपत्ति दर्ज कराई है। फ्रांसीसी सरकार का कथन है कि उसे भारत की शर्त पर आपत्ति है क्योंकि यह शर्त संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के आत्मनिर्णय के अधिकार को लागू करने का अधिकार प्रदान न करने की कई शर्तें लगाती है। जर्मनी का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र और प्रसंविदा में शामिल आत्मनिर्णय का अधिकार न केवल विदेशी शासन के लोगों पर अपितु सभी लोगों पर लागू होता है। इसलिए सभी लोगों को अपनी स्वतंत्र रूप से राजनीतिक स्थिति निर्धारित करने का और अपने आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास करने का अहस्तांतरणीय अधिकार है। भारत के अपने दृष्टिकोण में, आत्मनिर्णय के अधिकार की व्याख्या को उचित नहीं समझा जा सकता क्योंकि यह न केवल चर्चाघीन प्रावधानों की स्पष्ट भाषा के विपरीत है अपितु प्रसंविदा के लक्ष्य और उद्देश्य के अनुरूप भी नहीं है। नीदरलैंड का मानना हैं कि इस अधिकार के दायरे को सीमित करने के कोई प्रयास या प्रसंविदा में अवर्णित शर्तें लगाना आत्मनिर्णय की संकल्पना को कम कर देगा और इसकी सार्वमौमिक स्वीकारता को गंभीर रूप से कमजोर बना देगा।

अनुच्छेद 9 के प्रति भारत की शर्तों की विद्वानों ने, मानव अधिकार समिति तथा भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी आलोचना की है। भारत हमेशा यह दावा करता आ रहा है कि भारत की विशेष परिस्थितियाँ कानून और शांति बनाए रखने, आतंकवाद से लड़ने तथा सुरक्षा को अन्य खतरों से बचाने के लिए वैयक्तिक स्वतंत्रता का अतिक्रमण करने पर थोड़ी बहुत ढील देना वांछनीय होगा।

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