मार्क्स ने किसी पूँजीवादी समाज में वस्तु की संकल्पना का अध्ययन एक ऐसे आर्थिक उत्पाद के रूप में किया जो कि किसी भी सामाजिक संबंध व्यवस्था का परिणाम होता है। साथ ही, जैसे ही बाजार पूँजीवादी समाज में विकसित होता है, कोई भी वस्तु क्रय और विक्रय के अधीन हो जाती है। उत्पादन की पूँजीवादी रीति अपनाने वाले समाजों में वस्तुओं का अपरिमित संचय होता है।
किसी भी पूँजीवादी समाज की मूल इकाई कोई एकल वस्तु ही होती है। वस्तु, दरअसल, एक ऐसी चीज है जो मनुष्य के शरीर के बाहर स्थित होती है और मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। वस्तुओं के विभिन्न उदाहरण दिए जा सकते हैं, जैसे जूते, वस्त्र, रोटी, मक्खन आदि। नाना प्रकार की वस्तुएँ विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। कोई भी वस्तु अपनी मात्रा और गुणवत्ता दोनों दर्शाती है। किसी भी वस्तु का मूल्य सामाजिक रूप से आवश्यक श्रम अथवा उसका उत्पादन करने हेतु वांछित सामाजिक रूप से आवश्यक समय की मात्रा से निर्धारित होता है। उदाहरण के लिए, हीरे किसी भी अन्य वस्तु के मुकाबले अधिक मूल्यवान होते हैं क्योंकि वे पृथ्वी की सतह पर दुर्लभ हैं, और साथ ही, अपने उत्पादन में हीरों को अपेक्षाकृत अधिक श्रम समय की आवश्यकता होती है। किसी भी पूँजीवादी समाज में कोई भी वस्तु दो कारकों से सहबद्ध होती है - उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य । इसी प्रकार, श्रम जो किसी वस्तु में सन्निहित हो, अपना दोहरा अभिलक्षण भी दर्शाता है, यथा प्रयोज्य श्रम और अमूर्त श्रम।
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