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'मंदिर' और “सद्गत्ति' कहानी के आधार पर प्रेमचंद के दलित जीवन संबंधी विचारों की विवेचना कीजिए।

उस समय दलित की अवधारणा अभी निर्मित होनी शुरू हुई थी। इसलिए प्रेमचंद के समय की दलित-दृष्टि को आज के संदर्भों में आंकना भारी भूल होगी। प्रेमचंद सामंती औपनिवेशिक काल के कथाकार थे और उस समय की सीमा में ही दलितों के प्रति हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध संवेदनात्मक प्रतिक्रिया कर रहे थे। उसे आज के दलित विमर्शों की कसौटी पर रखकर नहीं कसा जा सकता।

समकालीन दलित साहित्य आंदोलन के पुरस्कर्त्तओं की एक धारा उन्हें एक ऐसे रचनाकार के रूप में देखती है जिसकी प्रगतिशीलता गाँधीवादी की भूमि पर अवस्थित थी। जबकि दूसरा हिस्सा प्रेमचंद को प्रगतिशील धारा को. रचनाकार मानने से इंकार करता है। ऐसे लोगों का मानना है कि प्रेमचंद की प्रगतिशीलता गाँधीवाद से आगे नहीं जाती है. और उनके पास अपने समय में चल रहे स्वामी रामचंद्रदास और स्वामी अछूतानंद के आंदोलनों की क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को देखे पाने की चेतना का अभाव था। इनका यह भी मानना है कि अम्बेडकर का दलित आंदोलन प्रेमचंद के समय में शुरू हो चुका था, किंतु वे उस आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में दलित समस्या को समझने में असमर्थ थे। आज के दलित लेखक यह सवाल भी उठाते हैं कि गाँधी और अम्बेडकर के बीच चली जाति विषयक बहस से प्रेमचंद परिचित न रहे हों यह नहीं हो सकता। ऐसी दशा में अम्बेडकर के आंदोलनों के प्रति प्रेमचंद की निष्क्रियता को दलित लेखक शक की निगाहों से देखते हैं।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि आज के दलित रचनाकोर यदि प्रेमेचंद को गाँधीवाद तक'सीमित करके देखते हैं तो यह उनकी अधूरी दृष्टि है। प्रेमचंद की दलित जीवन से जुड़ी जिन कहानियों को शिद्दत से याद किया*जाता है, वे सारी भारतीय राजनीति में डॉ. अम्बेडकर की सक्रियता के बाद की हैं औरउनमें अम्बेडकर के आंदोलन (का प्रभाव देखा जा सकता है। जिन उपन्यासों में दलित सवाल तीखी वैचारिकता,से उठाए«गए हैं, उनमें 'रंगभूमि' प्रमुख है। दलितों-के संदर्भ में गाँधीवाद करुणा उपजाने और हृदय परिवर्तन से आगे नहीं जाता। लेकिन रंगभूमि का सूरदास बॉकायदा एक पूँजीपति द्वारा जबरन जमीन अधिग्रहित करने के विरुद्ध जिला प्रशासन से संघर्ष करता है और मारा जाता है| सूरदास कहीं से भी गाँधीवादी चरित्र नहीं है। लेकिन इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि हमारे आज के बहुत से, दलित<लेखक सूरंद्रास को भी गाँधीवादी चरित्र ही मान कर चल रहे हैं।

फिर भी, आज केज्युग के तमाम दलित लेखकों से अलग, अपना विच्नारँ प्रकट करते हुए एक संदर्भ में दलित लेखक कंवल भारती ने स्वीकार किया। है. कि “प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में दलित के प्रति सहानुभूति का स्तर सिर्फ दया भाव तक सीमित नहीं है। दया भाव समस्या को नहीं उठाता। बल्कि उसे बनाए रखने का यत्न करता है। प्रेमचंद का दलित विमर्श इस यत्न से मुक्त है॥-बे दलित समस्याओं की मुक्ति के लिए दलितों के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। वे दलित समस्या को राष्ट्र की समस्या मानते हैं। प्रेमचंद के साहित्य में दलित नहीं बल्कि दलित समस्या है। प्रेमचंद जानते थे कि दलित सिर्फ अस्पृश्यता से ग्रस्त नहीं है। उसकी समस्या ज्यादा बड़ी है। वे आर्थिक शोषण, धर्मातरण, विषम समाज व्यवस्था, गरीबी और प्रतिरोध जैसी दलित समस्या के सभी रूपों से परिचित थे।”

इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रेमचंद समाज पर पैनी दृष्टि रखते थे और उनकी दलित-दृष्टि अपने समय से बहुत आगे थी। वे समाज में समता का स्वप्न देखने वाले ऐसे रचनाकार थे जो जानते थे कि एक जाति के रूप में दलितों को संगठित करने से उनकी मुक्ति संभव नहीं है। उनका विश्वास था कि दलितों को समाज की मुख्यधारा में लाए बिना समता का स्वप्न साकार नहीं हो सकता। प्रेमचंद जाति के प्रश्न को वर्ग के प्रश्न के रूप में देखते थे। वे संपूर्ण वर्ग की उन्नति चाहते थे।

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