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कल्याणकारी राज्य पर समकालीन परिचर्चा

कल्याणकारी राज्य परिवर्तन पर नहीं, अपितु संशोधन पर विश्वास करता है। लोगों को उनके कष्ट के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कल्याणकारिता का आधुनिक सिद्धांत स्वतंत्रता, समानता, न्याय आदि मूल राजनीतिक अवधारणाओं की पुनर्व्यवस्था पर निर्भर करता था। विभिन्‍न विद्वानों ने विभिन्‍न तरीकों से कल्याणकारी राज्य को उचित ठहराया है। किसी ने कहा कि यह स्वतंत्र व्यापारिक पूँजीवाद के कुप्रभावों को दूर करता है, किसी ने कहा यह स्वतंत्रता को बढ़ाता है, किसी ने कहा यह न्याय (सामाजिक न्याय सहित) की व्यवस्था करता है, तो किसी ने कहा कि यह नागरिक अधिकारों को कार्यरूप प्रदान करता है। कुछ अन्य आधारों पर भी कल्याणकारी राज्य को उचित ठहराया गया है; जैसे-

(1) राज्य और बाजार-कल्याणकारी राज्य ऐसी अर्थव्यवस्था की स्थापना करता है जो व्यापारिक संघों, बहुराष्ट्रीय तथा परराष्ट्रीय निगमों की शक्तियों के प्रभुत्व को सीमित कर देती है। राज्य लोगों की दशाओं में सुधार कर सकता है। उन्हें सामाजिक तथा आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर सकता है। समाज में रहने वाले सभी नागरिकों को बिना किसी वर्गीय आधार के सामाजिक जीवन का एक न्यूनतम स्तर उपलब्ध करवा सकता है।

(2) व्यक्तिवादी-कल्याणकारिता व्यक्ति की स्वायत्तता में निहित एक तथ्य है। यदि कल्याणकारिता न हो, तो लोगों की प्राथमिकताएँ सीमित हो जाएँगी।

(3) वैयक्तिक स्वतंत्रता की संवृद्धि-उदारवादी राज्य का कार्य स्वतंत्र समाज के अस्तित्व को बल देना तथा नैतिकता को बनाए रखना है। इसका मुख्य कार्य निरक्षता, निर्धनता, गंदगी आदि को दूर करके ऐसी परिस्थितियों की स्थापना करना है, जहाँ नागरिक अपनी क्षमताओं को बिना बाधा के निखार सकें। इस प्रकार राज्य स्वतंत्रता का स्रोत एवं कल्याणकारिता की शर्त हो।

(4) समानता-सभी समाजों में उपस्थित असमानता को राजनीतिक तरीकों से शुद्ध करना आवश्यक होता है। उदारवादी कल्याणकारी राज्य ऐसे समतावाद का तर्क देता है, जो पूँजीवादी बाजारू समाज में आर्थिक व सामाजिक समानताओं को अपने में स्थान दे सके। समतावादी प्रयासों से कल्याणकारिता में वृद्धि करना राज्य का नैतिक दायित्व है।

(5) अधिकार-कल्याणकारी राज्य को अधिकारों के संदर्भ में उचित माना जाता है। कल्याणकारी राज्य से जुड़े अधिकार ऐसे अधिकार हो सकते हैं, जब संसाधनों के स्वामित्व की अपेक्षा उसके पुनः वितरण हेतु उत्पीड़न की औचित्यता सही मानी जाए। ये अधिकार दूसरों से आक्रमक गतिविधियों से बचाव के अधिकार तथा दूसरों के अपने व्यवहार को अनुकूल बनाने के अधिकार होंगे।

(6) नागरिकता-कल्याणकारी राज्य के माध्यम से नागरिकता ने समाज में सभी व्यक्तियों को एकीकृत कर दिया है। नागरिकता वर्ग पर परिवर्तन आरोपित करती है। स्वतंत्र भाषण एवं अधिकार (कानून), राजनीतिक एवं सामाजिक संबंधी अधिकारों की तीन श्रेणियों की पहचान नागरिकता के सिद्धांत के अन्तर्गत की जाती है।

(7) न्याय -कल्याणकारी राज्य की न्याय की अवधारणा संसाधनों के वैधपूर्ण वितरण से लोगों के हित-स्तरों से संबंधित है। इसके अंतर्गत वंचितों को अधिकतम लाभ होना चाहिए तथा प्रत्येक को उचित अवसर की समानता की स्थिति में पद व प्रतिष्ठा की प्राप्ति सुलभ हो।

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