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छायावाद और रहस्यवाद

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'छायावाद” शब्द का सम्बन्ध वेदान्त के प्रतिबिम्बवाद से जोड़कर उसे दा्शनिकता प्रदान की, लेकिन इसके साथ ही रहस्योंन्मुखता को इस काव्यधारा की निजी विशेषता न मानकर बाहरी प्रभाव कहा । उन्होंने छायावाद की पहली सुसम्बद्ध व्याख्या करते हुए 'छायावाद' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में माना । उसका एक अर्थ उन्होंने रहस्यवाद लिया जिसका सम्बन्ध काव्यवस्तु से होता है | अर्थात्‌ जहाँ कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है ।”

मानव स्वभाव से ही जिज्ञासु प्राणी है । वह जितने भी पदार्थों को देखता है, उन सबके विषय में जान लेना चाहता है, परन्तु वह विश्व के सबसे महान्‌ रहस्य, परम तत्त्व परमेश्वर को जिसने इस जगत्‌ का निर्माण किया है, जानने और समझने में असफल रहा है । वह आज तक नहीं समझ पाया है कि वह कोन है, जो तारों के द्वीप में जाकर नित्य ही दीपावली मनाया करता है अथवा वह कौन-सी शक्ति है जिसकी सूर्य और चन्द्रमा घूमकर आरती उतारा करते हैं। जब मानव अज्ञेय, अदृश्य और अगण्य शक्ति से साक्षात्कार करने का प्रयास करता हुआ विभिन्‍न प्रकार की अनुभूतियाँ प्राप्त करता है तथा उन्हें शब्दों के माध्यम से व्यक्त कर देता है, तब एक ऐसे भाव समूह का संचयन हो जाता है, जिसे साहित्यिक शब्दावली में “रहस्यवाद” कहते हैं।

रहस्यवाद सम्बन्धी अनेक पारिभाषिक स्पष्टीकरण किए गए हैं। रहस्यवाद की कुछ विशिष्ट परिभाषाएँ इस प्रकार हैं | आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार-“काव्य की एक धारा-विशेष को रहस्यवाद शब्द सूचित करता है | वह उसमें लक्षित होने वाली उस अभिव्यक्ति की ओर संकेत करता है जो विश्वात्मक सत्ता की प्रत्यक्ष, गम्भीर एवं तीव्र अनुभूति के साथ सम्बन्ध रखती है ।” चतुर्वेदी की यह व्याख्या अत्यधिक गम्भीर एवं क्लिष्ट होने के कारण स्वयं व्याख्या की अपेक्षा रखती हैं ।

डॉ० रामकुमार वर्मा के शब्दों में-“रहस्यवाद जीवात्मा की उस अन्तर्निहित प्रवृत्ति का प्रकाशन है, जिसमें वह दिव्य और लौकिक शक्ति से अपना शान्‍्त और निश्चल सम्बन्ध यहाँ तक बढ़ जाता है कि दोनों में कोई अन्तर नहीं रह जाता ।” डॉ० रामकुमार वर्मा ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह “अन्तर्निहित प्रवृत्ति” आखिर है क्‍या । वैसे वर्मा जी की परिभाषा पूर्णतः स्पष्ट है ।

डॉ० सरनामसिंह शर्मा अरुण” लिखते हैं-“रहस्यवाद आत्मा और परमात्मा की अभेदानुभूति (जिसमें समस्त सृष्टि समाहित है) की अभिव्यक्ति है ।” उन्होंने साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि अनुभूति विशेष हाने के बावजूद भी जब तक वह एक विशेष रूप में काव्य में नहीं उतरती, तब तक उसे रहस्यवाद की संज्ञा नहीं मिल सकती । रहस्यवाद का पर्याप्त स्पष्ट स्वरूप यह संज्ञा सामने लाती है । आचार्य रामचन्ध शुक्ल के मतानुसार-“चिन्तन के क्षेत्र में जो अद्वेतवाद है, वही भावना के क्षेत्र में रहस्यवाद है ।” इस परिभाषा से यह भ्रान्ति उत्पन्न हो जाती है कि रहस्यवाद में सिर्फ भावना ही भावना होती है, चिन्तन पक्ष बिल्कुल नहीं होता । वस्तुतः चिन्तन एवं भावना परस्पर विरोधी हैं । यदि इस श्रान्ति से बचा जाए, तो इस परिभाषा को स्वीकार किया जा सकता है ।

डॉ० गोविन्द त्रिगुणायत द्वारा दी गई व्याख्या इस प्रकार है, जो सर्वाधिक तर्क संगत है । “रहस्यवाद ब्रह्म के आध्यात्मिक स्वरूप से आत्मा की भावात्मक ऐक्यानुभूति के इतिहास का प्रकाशन है । जब साधक भावना के सहारे आध्यात्मिक सत्ता की रहस्यमयी अनुभूतियों को वाणी के द्वारा शब्दमय चित्रों में सजाकर रखने लगता है, तभी साहित्य में रहस्यवाद की सृष्टि होती है ।”

रहस्यवाद का पर्याप्त विवेचन पाश्चात्य विद्वानों में अण्डरहिल (एवलिन) ने प्रस्तुत किया है-“भगवत्सत्ता के साथ एकता स्थापित करने की कला ही रहस्यवाद है ।” उन्होंने आगे लिखा है कि जो उस एकता में विश्वास रखता है और एकतासिद्धि ही जिसका चरम लक्ष्य है, वही रहस्यवादी है ।

उपर्युक्त सभी परिभाषाओं को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि आत्मा में परमात्मा के लीन होने की लालसा एवं काव्य में आत्मा व परमात्मा के प्रेम की व्यंजना का चित्रण ही रहस्यवाद है । काव्य में प्रयुक्त होने वाली साधारण भाषा अर्थात्‌ लौकिक शब्दावली, रहस्यवादी अनुभूति अर्थात्‌ अलौकिक अनुभूति का भार वहन नहीं कर पाती | अतः प्रतीकों एवं रूपकों का समावेश भाषा में करना पड़ता है । इस प्रकार साहित्य में विशेष अनुभूति की प्रतीकाश्रित अभिव्यक्ति “रहस्यवाद” का नाम पाती है ।

रहस्य साधन एवं रहस्यानुभति की अण्डरहिल ने पाँच अवस्थाएँ मानी हैं-

1. यह स्थिति ब्रह्म जिज्ञासा की स्थिति है । साधक ईश्वर दर्शन हेतु इस अवस्था में व्याकुल हो उठता है । इसी अवस्था को 4ेदान्त' में आत्म-अनात्म कहा गया है । 'कबीर' और “जायसी” में इस अवस्था के चित्र प्रचुर मात्रा में प्राप्त हैं ।

2. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए रहस्यवादी इस अवस्था में नाना प्रकार की साधनाओं में प्रवृत्त होता है । उसे विरह की अनुभूति इसी अवस्था में होती है । प्रेम कंचन का रूप विरह अनल में तपकर और भी निखर आता है |

3. साधक के मन का स्व” इस अवस्था में तिरोहित होने लगता है तथा वह ब्रह्म के सानिध्य का अनुभव करने लगता है | “अण्डरहिल' के मतानुसार साधक को इस स्थिति में अनेक ध्वनियों का श्रवण एवं आंशिक दृश्यों का अनुभव होने लगता है ।

4. आंशिक रहस्यानुभूति क्षणिक होती है, क्योंकि विघ्न आ जाते हैं। अतः इस अवस्था में साधक साधना में बाधक शिकारों का वर्णन करते हैं। कबीर कृत माया” वर्णन तथा जायसी कृत 'शैतान” वर्णन इसी कोटि में आता है ।

5. परमात्मा के ऐक्य एवं भावात्मक साक्षात्कार की स्थिति इस अवस्था में होती है । डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त ने रहस्यवाद के तीन प्रमुख लक्षणों की ओर संकेत किया है-

(क) अद्वैतवादी विचारधारा की स्वीकृति ।

(ख) परमसत्ता से रागात्मक सम्बन्ध की अनुभूति ।

(ग) भाषा के माध्यम से अभिव्यक्ति ।

उपर्युक्त लक्षण एक रहस्यवादी काव्य में अवश्य होने चाहिएं, परन्तु किसी एक के अभाव में भी उसे रहस्यवादी नहीं माना जा सकता |

विभिन्‍न विद्वानों ने अध्ययन की सुविधा के लिए रहस्यवाद को कई प्रकार से विभाजित किया है-

1. साधानात्मक रहस्य ।

2. भावात्मक रहस्य ।

पाश्चात्य विद्वान्‌ सर्जन” ने रहस्यवाद के चार भेद किए हैं-

1. प्रेम और सौन्दर्य सम्बन्धी रहस्यवाद ।

2. दर्शन सम्बन्धी रहस्यवाद ।

3. धर्म और उपासना सम्बन्धी रहस्यवाद ।

4. प्रकृति सम्बन्धी रहस्यवाद ।

ऐतिहासिक आधार ग्रहण करते हुए विद्वानों ने रहस्यवाद के 'पुरातन' और “आधुनिक” नाम से भी दो भेद किए हैं | इन सभी भेदों को निरर्थक बताते हुए डॉ० गाविन्द त्रिगुणायत और डॉ० गणयपतिचन्द्र गुप्त ने रहस्यवादी कवियों के कृतित्व के आधार पर दो भेद किए हैं-

(क) समष्टिमूलक रहस्यवादी कवि ।

(ख) व्यष्टिमूलक रहस्यवादी कवि ।

डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त के अनुसार इन कवियों को यथार्थ रहस्यवादी एवं काल्पनिक रहस्यवादी दो वर्गों में रख सकते हैं | यहाँ कबीर, दादू को प्रथम वर्ग में तथा प्रसाद, पन्‍त, निराला आदि को दूसरे वर्ग में स्थान दिया गया है ।

रहस्यवाद को अनेक खण्डों में विभक्त करना मेरी दृष्टि में उचित नहीं है | शुक्लजी के भेदों के विषय में सिर्फ यह कहा जा सकता है कि भावना के अभाव में रहस्यवाद की कल्पना करना निरर्थक है | भावना से अलग होने पर रहस्य मात्र “अद्वैतवाद” बनकर रह जायेगा ।

उपर्युक्त रहस्यवाद के स्वरूप पर दृष्टिपात करने के उपरान्त रहस्यवाद की कुछ प्रमुख प्रवृत्तियों की ओर भी संकेत कर सकते हैं -

1. आध्यात्मिक तत्त्वों का समोवश भारतीय रहस्यवादी काव्यधारा की सर्वप्रमुख विशेषता है । रहस्यवादी काव्य में अभिव्यक्ति का माध्यम लौकिक होते हुए भी संकेत अलौकिकता की ओर होता है । लौकिकता का आवरण किन्ही-किन्हीं रहस्यवादी रचनाओं में नहीं होता तथा अध्यात्म तत्त्व के दर्शन स्पष्ट रूप से किए जा सकते हैं ।

2. रहस्यवाद का प्राण प्रेम को माना गया है, क्योंकि प्रेम के द्वारा ही लौकिक एवं अलौकिक जीवन में सामंज्जस्य उपस्थित होता है, परन्तु रहस्यवादी प्रेम को हृदय की साधारण भावुक स्थिति मानना भूल होगी । प्रेम अथवा इश्क ही रहस्यवादी के लिए सब-कुछ है | अबुल अल्लाह ने भी प्रेम को ही अपना सर्वोपरि धर्म स्वीकार किया है ।

रहस्यवादियों ने प्रेयसी-प्रियतम, सखी-सखा, पिता-पुत्र, गुरु-शिष्य आदि विभिन्‍न रूपक प्रेमानुभूति की अभिव्यक्ति के लिए अपनाए हैं, परन्तु इन सब में सर्वाधिक प्रधानता प्रेयसी एवं प्रियतम की है । कबीर आदि रहस्यवादियों ने ब्रह्म को पुरुष (प्रियतम) माना है, किन्तु जायसी भिन्‍नता प्रदर्शित करते हुए (प्रेयसी) स्त्री में ब्रह्म का स्वरूप निहारते हैं | हिन्दी कवियों में स्थूल मिलन के अश्लील दृश्यों एवं जुगुप्सोत्पादक क्रिया-कलापों का अभाव दाम्पत्य का रूपक अपनाने पर भी दृष्टिगत होता है । यह स्वस्थ मनोवृत्ति का परिचायक है ।

3. रहस्यवादी की अनुभूति दिव्य एवं अलौलिक होती है । अतः इस अनुभूति की अभिव्यक्ति के लिए एक विशेष भाषा अथवा एक विशेष प्रकार की शब्दावली की आवश्यकता होती है । इसी कारण रूपकों और प्रतीकों की भाषा में रहस्यवादी बोलता है तथा अपने मनोभाव उलटबॉसियों में व्यक्त करता है ।

4. प्रायः मुक्तक गीति शैली को ही रहस्यवादी कवियों ने अपनाया है । आत्मा अभिव्यक्ति के लिए प्रबन्ध की अपेक्षा मुक्तक अधिक से अधिक उपयुक्त होता है । इसी कारण जायसी आदि कवियों ने अपने ग्रन्थों में आदि से अन्त तक न तो रूपकों का ही पूर्णरूपेण निर्वाह किया है और न पूरे ग्रन्थ में वे रहस्यवादी ही रह पाए हैं ।

5. रहस्यवादियों के लिए परोक्ष सत्ता रहस्य एवं आकर्षण की रही है । जहाँ एक ओर कबीर “कहिबे को शोभा नहीं देख्या ही परिमाण” कहकर उस सत्ता की रहस्यात्मकता की घोषणा करते हैं, वहीं प्रसाद भी है अनन्त रमणीय कोन तुम ?”” कहकर उसी के प्रति आकर्षण व्यक्त करते हैं । हिन्दी रहस्यवादियों में ब्रह्म के प्रति आत्म-समर्पण भावना के साथ दीनता और लघुता की भावना भी पाई जाती है । रहस्यवादी सभी विद्वानू एकमत नहीं हैं । रहस्यवाद का उद्गम कुछ विद्वानों ने सौमेटिक धर्म भावना से माना है । प्रसादजी ने इस धारणा को निर्मूल सिद्ध करते हुए लिखा है -“रहस्यवाद सैमेटिक धर्म भावना के विरुद्ध है एवं ईसा मंसूर और सरमद आर्य अद्वैत भावना से प्रभावित हैं ।” अतः रहस्यवाद भारतीय उपज है । पाश्वात्य विद्वान्‌ 'बॉगन” इस सम्बन्ध में लिखते हैं-“रहस्यवाद की सबसे पहली झाँकी भारत ने ही विश्व को दी ।”

क्रमशः उपनिषदोत्तर धार्मिक साहित्य भावात्मक होता गया, जिसके परिणामस्वरूप ज्ञान का स्थान भक्ति ने ले लिया | भक्ति सूत्रों में प्रेम भावना का वर्णन तो अलौकिक सत्ता के प्रति हुआ, किन्तु अद्वैतवाद सर्वथा लुप्त हो गया । शंकराचार्य द्वारा अद्वैतवाद को पुनजीवन प्रदान करने पर पुनःरुकी हुई रहस्यवादी काव्यधारा आठवीं-नवीं शती में आगे बढ़ी । वैसे इसके लिए शुद्धाद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि मतों का प्रतिपादन बाधक सिद्ध होता रहा ।

सर्वप्रथम सिद्धों और नाथों के काव्य में हिन्दी साहित्य की रहस्य भावना देखने को मिलती है । यद्यपि इन सिद्धों और नाथों की अद्वैत साधना में भावात्मक अनुभूति अत्यन्त न्यून मात्रा में पाई जाती है, तथापि उसे रहस्यवाद के अन्तर्गत रखा जा सकता है | रहस्यवाद के सच्चे स्वरूप का सर्वोत्तम

दर्शन अल्पकालीन सन्तकाव्य में मिलता है । कबीर, दादू आदि के नाम प्रमुख रहस्यवादी सनन्‍्त-कवियों में लिए जा सकते हैं। दो धार्मिक सम्प्रदायों का प्रभाव सन्त कवियों पर पड़ा-पहला नाथपन्थी सम्प्रदाय तथा दूसरा वैष्णव भक्ति सम्प्रदाय | इन कवियों की रचनाओं में भक्ति का पुट आ जाने के कारण एक विशेष प्रकार की मधुरता आ गई है ।

सूफी कवियों का रहस्यवादी भावना के प्रसार में अविस्मरणीय योगदान है । कुछ लोग संतों का रहस्यवाद सूफीमत से प्रभावित मानते हैं, किन्तु सबल तर्कों के द्वारा यह कथन, कथन मात्र ही सिद्ध होता है | प्रथम तो संतों और सूफियों की प्रणय भावना के स्वरूप में अंतर देखने को मिलता है। सूफी परमात्मा को प्रेयसी और संतपति के रूप में स्वीकार करते हैं । दार्शनिक दृष्टिकोण से भी दोनों में पर्याप्त अन्तर है। सूफी मत के मूल में सर्वात्मिवाद है, जबकि सन्‍्तों की रहस्य भावना अद्वैतवाद पर आधारित है ।

रहस्यवादी काव्यधारा भक्ति काल के उपरान्त रीतिकाल में अन्तर्निहित दिख पड़ती है । “भक्ति काल की 'पूत” और अलौकिक भावनाओं को रीतिकाल के कवियों ने लौकिक धरातल पर पटककर उन्हें केवल श्रृंगार और वासना से ढक दिया है ।” रहस्यवाद का सूर्य आधुनिक काल में आकर पुनः चमक

उठा । रहस्वाद का दर्शन प्रसाद, पन्‍त, निराला और महादेवी वर्मा में पुनः हुआ । सन्‍्तों की रहस्य भावना के समकक्ष इस काल के कवियों की रहस्य साध ना को रखा जा सकता है, किन्तु इन दोनों में कुछ भिन्‍नता भी दिखाई देती है । इस युग के कविगण कवि पहले हैं, दार्शनिक बाद में | सन्‍त कवि सन्त पहले हैं, कवि बाद में | रहस्यवाद के साधना पक्ष का आधुनिक कवियों ने लगभग परित्याग कर दिया है, अतः उनके रहस्यवाद में भावुकता का बोलबाला है । इसके विपरीत सन्‍्तों और सूफियों का रहस्यवाद साधना प्रधान रहस्यवाद है ।

कुछ विदेशी प्रभाव भी आधुनिक रहस्यवाद पर दृष्टिगोचर होता है । ईट्स और ब्लॉक प्रभृति कवियों ने “रवीद्धनाथ टैगोर” को पर्याप्त प्रभावित किया था और टैगोर की “गीताग्जलि' हिन्दी कवियों के लिए प्रेरणा स्नोत बनी । वस्तुतः आज के रहस्यवाद में धार्मिक अनुभूति का अभाव तथा कल्पना की प्रचुरता पाई जाती है | वास्तविक अनुभूति एवं गहन चिन्तन का नितान्त अभाव परिलक्षित होता है । रहस्यवाद की सीमाएँ आज के बौद्धिक परिवेश में बहुत स्पष्ट हो चुकी हैं। एक तो किसी अलौकिक सत्ता में विश्वास कर पाना कठिन हो रहा है, दूसरे काव्य की वस्तु को किसी अलौकिक सत्ता से सम्बन्ध जोड़ने तक सीमित करना भी उचित नहीं है । इसके अलावा डॉ० नामवर सिंह ने जैसा कि लिखा है -“रहस्यवादी दृष्टिकोण से जीवन और जगत्‌ की समस्याओं को हल करना तो दूर, उन्हें ठीक से समझना भी असम्भव है । रहस्यवाद ने सामाजिक समस्याओं को रहस्य बना दिया और फिर उन्हें रहस्यवाद कहा । उनकी रहस्यमयता में ही आनन्द लेने का पाठ पढ़ाया ।” इस प्रकार रहस्यवाद आधुनिक युग में प्रासंगिक नहीं रहा |

जो प्रवृत्ति सन्‍्तों के बौद्धिकता प्रधान हृदय को भावविहल बना सकी थी, वह क्या एकदम निरर्थक हो सकती है ? तर्क एवं बौद्धिकता की धूप से तपते मनुष्य को छाँह की तो जरूरत पड़ेगी ही | रहस्यवादी रचनाओं की अभिव्यक्ति हृदय को निश्छल अनुभूति के द्वारा हो सकती है। इसके अतिरिक्त “मानवजाति के छोटे-छोटे समूहों को रहस्यवादी काव्य भले ही कोई बड़ा सन्देश न दे पाए, किन्तु जहाँ तक अखिल मानव समाज का प्रश्न है, वह सभी आत्माओं को एक ही सत्ता से सम्बन्धित करके अखण्ड एकता का सन्देश देता है ।”

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