लोहिया का एक मुख्य योगदान, भारत जैसे गैर-यूरोपीय देशों में समाजवादी आंदोलन पर विचार करते हुए, समाजवाद को पुर्नपरिभाषित करना था। समाजवादी को फिर से परिभाषित करने का उनका प्रयास, उनकी इस सोच के अनुरूप था कि किसी भी वाद(विचारधारा) का बिना सोचे-समझे पालन नहीं किया जाना चाहिए।
जर्मनी में लोहिया की उच्च शिक्षा की पढ़ाई, एक ऐसा दौर था जिसने लोहिया की सोच और विचारों को आकार प्रदान किया। लोहिया की समकालीन और जीवनी लेखक इढुमती केत्कर हमें सूचित करती हैं कि जर्मनी में ही लोहिया एक सामाजिक लोकतंत्रवादी बने। 1933 में, जब वह भारत लौटे तो वह कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) के नेताओं में से शामिल हो गए जिसका गठन 1934 में हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन से प्राप्त एक लंबे प्रशिक्षण और समाजवादी आंदोलन के निर्माण के लिए, संगठनात्मक संघर्ष के माध्यम से, लोहिया ने समाजवाद के अपने विचारों को विकसित किया। सबसे प्रभावशाली भारतीय समाजवादी नेताओं में से एक, जयप्रकाश नारायण ने श्रृदावन आंदोलन शुरू किया और राजनीति छोड़ दी। अच्युत पटवर्धन और रामनंदन मिश्रा जैसे अन्य नेता, आध्यात्मिक खोज की ओर मुड़ गये। अशोक मेहता कुछ समय बाद कांग्रेस में शामिल हो गए और महान बुद्धिजीवी आचार्य नरेंद्र देव का 1955 में निधन हो गया। यह समाजवादी आंदोलन के लिए एक गंभीर समय था। ऐसी स्थिति में, लोहिया ने खालीपन को भरने की कोशिश की।
लोहिया ने भारतीय समाजवाद को, एक नई अवधारणा और दर्शन देने का भरसक प्रयास किया। वह पारंपरिक अर्थों में समाजवादी नहीं थे। उन्होंने मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट सर्वाधिकारवाद का विरोध किया। वह चाहते थे कि भारतीय समाजवादी आंदोलन, मार्क्सवादी विचारों और कार्यों से मुक्त हो। वह अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांत से प्रभावित थे। उन्होंने गांधीवादी और मार्क्सवादी अवधारणाओं के बीच एक संयोग(संश्लेषण) लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने समाजवादी दल को पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ, सबसे प्रभावी हथियार बनाने के लिए, कार्यवाही का एक नया प्रयोजन और पद्धति देने में योगदान दिया।
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