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आचार्य शुक्ल का रस चिंतन

 हिन्दी के रीतिकालीन आचार्यों की रस-रृष्टि संस्कृत आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट रस-सिद्धान्त पर ही आधारित है। वे अभिनव गुप्त, मम्मट, विश्वनाथ आदि आचार्यों से विशेष रूप से प्रभावित है। इनके यहाँ कोई मौलिक चिंतन नहीं दिखाई देता।

आधुनिक हिन्दी समीक्षकों में रामचन्द्र शुक्ल ने व्यापक रूप से रस-सिद्धान्त की मीमांसा किया है। उन्होंने 'रस मीमांसा' तथा 'चिन्तामणि” (भाग 1 - 2) में रस की चर्चा करते हुए रस को आधुनिक संदर्भों, में शब्द-भेद के द्वारा नये लक्षण दिए हैं-

'हृदय की अनुभूति ही साहित्य में रस और भाव कहलाती है।'

'जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है।'

'लोक हृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस दशा है।'

'हृदय के प्रभावित होने का नाम ही रसानुभूति है।'

शुक्ल जी रसानुभूति को लौकिक मानते हैं।

शुक्ल जी ने रस को काव्य की आत्मा माना है।

. आचार्य शुक्ल ने विरोध और अविरोध के आधार पर संचारियों के चार वर्ग किए हैं- सुखात्मक, दुखातमक, उभयात्मक और उदासीन 

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