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इतना जल इतनी शीतलता हृदय की प्यास न बुझी। पी सकूँगी ? नहीं तो जैसे बेला में चोट खाकर सिंधु चिल्ला उठता है, …………… दोनों पास-पास बैठ गये।

संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश जयशंकर प्रसाद की चर्चित कहानी ‘आकाशदीप’ से लिया गया है। इस कहानी में चम्पा और बुद्धगुप्त प्रमुख पात्र हैं। एक संकटपूर्ण स्थिति में ये दोनों पात्र अपरिचित होने के बावजूद साथ-साथ संघर्ष करते हैं। दोनों बंदी होते हैं फिर दोनों प्रयासपूर्वक मुक्त हो जाते हैं। इसके बाद ये दोनों आपस में एक-दूसरे का परिचय प्राप्त करते हैं। परिचय के एक हिस्से में सबसे पहले चम्पा अपना परिचय देती है।

बुद्धगुप्त ने चम्पा के प्रति अपने प्रेम भाव को बहुत शालीन और मार्यादित ढंग से अभिव्यक्त कर दिया। यह अभिव्यक्ति प्रेम के निवेदन की तरह है। इस निवेदन को स्वीकारने या अस्वीकार करने का निर्णय चम्पा को करना है। बुद्धगुप्त यहाँ प्रार्थी की मुद्रा में खड़ा है। आगे वह कहता है कि चम्पा हमारे पास असंख्य धन राशि है और बहुत सारी नावें भी हैं, हम नावों में उस धन राशि को भरकर भारत भूमि की ओर चल पडते हैं और वहाँ तुम राज रानी की तरह रहोगी। बुद्धगुप्त की इच्छा है कि आज ही उनका विवाह हो और कल वे भारत भूमि के लिए प्रस्थान करें।

यदि चम्पा सहमत हो तो यह हो सकता है। बुद्धगुप्त स्वयं मानता है कि वह महानाविक है और उसकी आज्ञा समुद्र की लहरें भी मानती हैं।  बाकी छोटी-मोटी विघ्न बाधा तो सामने आनी ही नहीं है। केवल चम्पा की स्वीकृति की आवश्यकता है अर्थात् जिस जलदस्यु का कहा प्रकृति तक मानती है वह चम्पा के समक्ष निवेदन की मुद्रा में है। जिसे दया-धर्म से कोई वास्ता नहीं था और जो केवल पशु-बल और धन में विश्वास रखता था उसके हृदय में भी कोमल भावनाएँ जगाने में सक्षम हुई है। देखते-देखते पीड़ा और ज्वलन से आरक्त बिम्ब धीरे-धीरे सिंधु में चौथाई-आधा. फिर संपूर्ण विलीन हो गया। एक दीर्घ निश्वास लेकर चम्पा ने मुँह फेर लिया।

विशेष : 1. जिस तरह इस अंश में बुद्धगुप्त अपने प्रेम का निवेदन करता है और निर्णय चम्पा पर छोड़ देता है और इस निवेदन में चम्पा की गरिमा का बराबर ध्यान रखा गया हैं।

  1. चरित्रों की चारित्रिक विशेषताएँ भी यहाँ प्रकट हुई हैं। जलदस्यु होकर भी बुद्धगुप्त शालीनता और संबंधों की मर्यादा का ध्यान रखता है। 

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