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रिपोर्ताज 'तूफानों के बीच'

 ‘तूफानों के बीच’ रांगेय राघव का एक महत्त्वपूर्ण रिपोर्ताज संकलन है तथा हिंदी में रिपोर्ताज विधा का पहला सशक्त प्रयास माना जाता है। इसमें राघव जी ने 1942 में बंगाल में पड़े अकाल के कारण हुई तबाही का ज्वलंत वर्णन किया है। वे बंगाल के इस अकाल को प्राकृतिक विपदा नहीं, अपितु अंग्रेजों की शेषणकारी नीति का परिणाम मानते हैं।

रांगेय राघव जनचेतना के रचनाकार होने के कारण उनके चिंतन का केंद्र है मनुष्य और उसका मनुष्यत्व। समाज के प्रति उत्तरदायी लेखक को ही वे सार्थक मानते हैं। ‘तूफानों के बीच ‘ राघव जी की यही चिंतनधारा दिखती है। लेखक ने बंगाल के अकाल की विभीषिका के संत्रास की पीड़ा को झेला। वह द्रष्टा और भोक्ता दोनों है। ‘तूफानों के बीच’ की अनुभूति बंगाल के लोगों की भूख, रोग और मृत्यु की पीड़ा और करुणा को पाठक के सामने यथार्थ कर देती है।  अकाल की स्थिति में मनुष्य मात्र मुट्ठी भर अनाज के लिए हर मूल्य चुकाने को तैयार होता है। वह मूल्य चाहे नैतिक हो, आर्थिक हो या शारीरिक संघर्ष और अपनी अपराजेय शक्ति द्वारा कठिनाइयों से लड़ता है।

‘तूफानों के बीच’ इस सारे यथार्थ का प्रामाणित दस्तावेज है। राघव जी बंगाल के अकाल को देश की स्वाधीनता से भी जोड़कर देखते हैं। उनका मानना है कि भुखमरी की समस्या आजादी के बाद ही समाप्त हो सकती है। राघव जी मानते हैं कि पराधीनता और जनशक्ति युग की दो बड़ी सच्चाई हैं। वे अंग्रेजी शासन तथा उन पूंजीपतियों के प्रति अपना आक्रोश जाहिर करते हैं, जिन्हें अंग्रेजों का संरक्षण प्राप्त है।

शासक और पूंजीपति व्यापारी दोनों मिलकर चोरबाजारी और मुनाफाखोरी कर रहे हैं, जिसका परिणाम यह भयंकर अकाल है। राघव जी ने शोषकों के साथ उन लोगों को भी प्रस्तुत किया है, जो इन पीड़ित लोगों के लिए दिन-रात एक कर रहे थे। उन्होंने अपनी गहन अंतर्दृष्टि द्वारा इतिहास, परंपरा, समाज, व्यक्ति तथा मानवता सबको एक सूत्र में पिरोकर अकाल विभीषिका के खिलाफ मानव की क्षमता को प्रस्तुत किया है। उनकी पूरी रचना युग के यथार्थ तथा जनता की अपराजेय शक्ति को सामने लाती है। 

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