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रीति काव्य में घनानंद का क्‍या महत्व है?

 घनानन्द और रीतिकाल के अन्य कवियों के काव्य में जो भेद दिखाई पड़ता है जो उन्हें रीतिकाल का विशिष्ट कवि बनाता है।

1. रीतिकाल के अन्य कवि राज्याश्रित कवि थे, उनकी काव्य-रचना का प्रमुख उद्देश्य अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न करना था, उन्होंने इन राजाओं तथा सामंतों को रिझाने, उनके मनोविनोद के लिए काव्य लिखा जबकि घनानन्द ने अपनी प्रेयसी राजनर्तकी सुजान के सच्चे प्रेम में डूबकर अपने आश्रयदाता को रुष्ट कर दिया और जो कुछ लिखा स्वान्तः सुखाय लिखा, अपनी मार्मिक पीड़ा को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए लिखा।

2. रीतिकाल के अधिकांश कवियों में आचार्य बनने की महत्त्वाकांक्षा थी । मौलिक चिन्तन और उद्भावनाओं की शक्ति न होते हुए भी उन्होंने लक्षण-ग्रंथ लिखे और उदाहरण के रूप में छंद लिखे ।

इन ने दृष्टि कविता कामिनी के बाह्य रूप को सजाने-संवारने पर केन्द्रित थी, अनभति पक्ष की उन्होंने उपेक्षा की । इन्होंने साहित्यशास्त्र की बंधी-बंधाई सरणियों का आश्रय लेकर शृंगार रस की रचनाएं लिखीं ।

इस मानसिकता में लिखी गयी कविता हृदय से निकली अनुभूतियां कम होती हैं, बुद्धि का सहारा लेकर अधिक लिखी जाती हैं । MHD 01 Free Solved Assignment

घनानन्द में यह दोष नहीं था, अतः उनकी कविता में बुद्धि तत्त्व कम है, हृदय पक्ष प्रधान है ओर वही कविता का प्राण होता है।

3. अन्य रीतिकालीन कवियों ने अनुभूति के अभाव में बुद्धि, कल्पना, अनुमान के आधार पर प्रेम की विभिन्न स्थितियों के अलंकृत चित्र प्रस्तुत किये हैं।

इसके विपरीत घनानन्द सच्ची अनुभूति को बुद्धि और कल्पना से श्रेयस्कर मानते थे-बुद्धि को दासी तथा रीझि (प्रेमानुभूति) को पटरानी मानते थे । वह कृत्रिम प्रेम के विरुद्ध थे ऐसे प्रेम-कथन को नीर-मंथन कहते थे जिससे कुछ प्राप्त नहीं होता ।

4. प्रेम के प्रति दृष्टि-भेद के कारण ही घनानन्द अन्य कवियों से विशिष्ट हैं । जहां बिहारी प्रेम को चौगान का खेल बताते हैं और उसमें चालाकी, धूर्तता, दिखावे को बुरा नहीं मानते, वहां घनानंद प्रेम को एक सीधा स्नेहपूर्ण मार्ग बताते हैं

जिसमें चतुराई, कपट, बुरे आचरण के लिए कोई स्थान नहीं अति सूधों सनेह को मारग है जहां नेकु सयानप बांक नहीं तहां सांचे चलें तजि आपनपौ झझक कपटी जो निसाँक नहीं |

5. जहां रीतिकाल के अन्य कवियों ने संयोग शृंगार के चित्रों में रति-क्रिया के अश्लील चित्र अंकित करने में भी संकोच नहीं दिखाया है, MHD 01 Free Solved Assignment

वहां घनानन्द के संयोग-चित्रों में नायक-नायिका के मिलन के क्षणों में भी उन्हें अतृप्त, अशांत, बेचैन दिखाया है क्योंकि मिलन के क्षणों में भी उनके मन में विविध भावों की भीड़ इतने तीव्र वेग से उमड़ती है कि संयोग का ऐन्द्रिय सुख लुप्त हो जाता है ।

सुजान से संयोग होने पर कवि की बुद्धि आश्चर्य में डूब जाती है; वह प्रिय का दर्शन भी अच्छी तरह नहीं कर सकता, संयोग के क्षण स्वप्न की तरह टूट जाते हैं।

घनानन्द की विशेषता है कि विरह के क्षणों में तो विरही-युगल अशांत रहते ही हैं, मिलन के क्षणों में भी उन्हें शांति नहीं मिलती |

6. घनानन्द नायिका-भेद, नखशिख वर्णन, वयःसंधि आदि रूढ़ियों से मुक्त रहे हैं । उनका मन तो प्रेमी-प्रेमिकाओं के मनोभावों के चित्रण तथा विश्लेषण में ही रमा है ।

नायिका के रूप वर्णन में नख शिख वर्णन की प्रणाली न अपनाकर सौंदर्य का सहज स्वाभाविक वर्णन करते हैं, नायिका की रूप राशि के सामूहिक प्रभाव का वर्णन करते हैं, अतः उसमें गरिमा है- 

झलकै अति सुंदर आनन गौर, छके दृग राजत काननि हुवै ।
हँसि बोलन मैं छवि फूलन की बरषा, उर ऊपर जाति है हुवै।
लट लोल कपोल कलोल करै, कल-कंठ बनी जल जावलि हुवै।
उठै दुति की, परिहै मनौ रूप अबै धर चैं।।

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