Recents in Beach

विद्यापति पदावली की विशेषताओं को रेखांकित कीजिए।

 हिन्दी में विद्यापति मैथिल कोकिल’ के नाम से प्रसिद्ध है। परन्तु इस कोकिल की अमृत-काकली मे मिथिला की अमराइयाँ ही नहीं गूंज रही हैं, सम्पूर्ण उत्तर-भारत को उसने अपनी पीयूष-वर्षा से अभिषिक्त किया है।

उनकी ‘पदावली मूर्छना-भरे संगीत की रंगस्थली है और है आत्म-विभोर कर देने वाली अनुभूतियों का साधना-मंदिर । इस कोकिल ने साहित्य के प्रांगण में जिस अभिनव वसन्त की स्थापना की है,

उसके सुख-सौरभ से आज भी पाठक मुग्ध है क्योंकि उनके गीतों में जो संगीत धारा प्रवाहित होती है। वह अपनी सुरताल से श्रोता या पाटक को नाद-वेसुध और गद्गद् कर देती है। विद्यापति ने स्वयं अपने काव्य के संबंध में जो कहा था– 

                "करोतु कवितुः काव्यं भव्यं विद्यापतिः कविः।" 

वह उनकी लोकप्रियता को देख सत्य सिद्ध होता है । मिथिला में तो घर-घर इनके गीत विभिन्न अवसरों पर गाये ही जाते हैं इतनी लोकप्रियता का एकः कारण है उनके गीतों की संगीत-माधुरी और भावानुभूति की तीव्रता ।

ऐतिहासिक दृष्टि से विद्यापति हिन्दी में गीति-काव्य के आदि प्रणेता या प्रवर्तक कहे जा सकते हैं । यद्यपि उनसे पूर्व भी सिद्धों और नाथों ने गीत रचे थे, परन्तु वे मानव-मन को न तो अपनी संगीत माधुरी से और न भाव-तन्मयता से मुग्ध कर सके ।

वस्तुतः यह उनका लक्ष्य भी न था। उन्होंने परवर्ती कवियों कबीर, मीरा, अष्टछाप के लगभग सभी कवियों और रीति कवियों को भी इतना प्रभावित और प्रेरित किया है कि उन्हें हिन्दी गीति काव्य का प्रवर्तक मानने में कोई संकोच नहीं होता, भाव और शिल्प दोनों क्षेत्रों में उन्होंने हिन्दी गीति-काव्य को स्वरूप प्रदान किया ।

विद्यापति गीत काव्य के अद्भुत शिल्पी हैं । वह जानते हैं कि चतुर्दिक वातावरण को मूर्तिमान करने और नायक-नायिका की मनोदशा को सच्ची अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए कौन-सा राग, कौन-सा छन्द और शब्दों का शिल्प-विधान किस प्रकार का करना होगा ।

यदि नायिका की आंतरिक अनुभूति का चित्रण करना होता है, तो वह एक प्रकार का गीत लिखते हैं और यदि उसकी विरह-शिथिलता, शारीरिक क्षीणता और मानसिक जड़ता का चित्र उकेरना होता है,

तो दूसरे प्रकार के गीत-शिल्प का विधान करते हैं । उदाहरण के लिए, निम्न गीत लीजिए जिसमें पंक्ति की मन्द गति, टेक और शब्दों के कुशल विन्यास द्वारा विरहिणी की व्याकुलता और शारीरिक क्षीणता का चित्र अंकित किया गया है 

माहव सुन-सुन वचन हामारि।
तुव गुन सुन्दरि अति भेल दूबरि
गुनि-गुनि प्रेम तोहारि।
+ + +
कातर दिठि करि चौदिस हेरि हेरि
नयने गलये जलहारा।

छोटे-छोटे शब्दों द्वारा गीत में नाद-सौन्दर्य, स्वर-ताल और अद्भुत थिरकन भरने की कला में भी विद्यापति सिद्धहस्त हैं। नीचे के गीत में कृष्ण प… मिलनोत्कंठा न केवल शब्दार्थ द्वारा, अपितु गीत की गति से भी प्रकट होती है

नन्दक नन्दन कदम्बेरि तरुतरे,
घिरे-घिरे मुरलि बोलाव।
समय संकेत निकेतन बइसल
बेरि बेरि बोलि पठाव ।

पहली दो पंक्तियों के एक-एक शब्द में धुंघरुओं की रुनझुन बजती सी-प्रतीत होती है । ‘घिरे-घिरे, तरु तरे’ में ताल है, तरलता है और साथ ही थिरकन भी है ।

बेरि बेरि, फिरि-फिरि, जनि-जनि’ में कृष्ण की उत्कण्ठा तो मूर्तिमान हुई ही है, शब्द भी नृत्य करते प्रतीत होते हैं । ‘बोलाव और पठाव’ में एक प्रकार का मधुर और सुकुमार स्वर खिंचाव है और ये शब्द संगीतकार को आलाप के लिए भी पर्याप्त सामग्री प्रदान करते हैं ।

अतः गाने की दृष्टि से यह गीत बहुत ही उपयुक्त एवं श्रोताओं को विमुग्ध करने में सफल है

राग-रागिनियों की दृष्टि से भी विद्यापति का काव्य अपने वैविध्य एवं सफल निर्वाह के लिए विरस्मणीय रहेगा। यह महान् कवि भाव साधना के मन्दिर निष्ठावान पुजारी ही नहीं, संगीत का विज्ञ आचार्य भी था।

अतः उनके काव्य में परवर्ती आचार्यों को विभिन्न राग रागिनी गाने के लिए अपूर्व भण्डार मिला । ३.. क्षेत्र में उनकी समानता केवल सूरदास कर सकते हैं ।

मालव, घनछरी, सामरी, महिरानी, कोलाव, विभास, असावरी, मल्हार, केदारा, कानड़ा, सारंग, गुजरी, बसन्त, नाट, ललित आदि रागों में निबद्ध विद्यापति के ये गीत सचमुच संगीतकारों के लिए बहुमूल्य कोष हैं ।

उनके गीतों में कोमलकांत पदावली होते हुए भी अनुप्रास का आग्रह नहीं है। सर्वत्र सरल लय, मधुर झंकार युक्त शब्द और नादपूर्ण शब्दावली का प्रयोग ही उनके काव्य को श्रुति मधुर बनाता है।

सुकुमारता और तरलता के लिए उन्होंने संयुक्त वर्णों को भी तोड़ डाला है जैसे भमर, धुनि, पिय, सोभाव, कओन, जउवन, पाओल, बेआकुलि आदि । 

व्यंजनों के स्थान पर स्वरों का प्रयोग भी, जो अपभ्रंश की प्रवृत्ति थी, उनके काव्य को अद्भुत संगीत-माधुरी प्रदान करता हैं ।

छन्दों की अनेकरूपता की दृष्टि से भी विद्यापति का काव्य अपना विशिष्ट स्थान रखता है । संगीत के लिए चूंकि मात्रिक छन्द अधिक उपयुक्त होते हैं, अतः इनके काव्य में मात्रिक छन्द ही अधिक मिलते हैं।

वैसे भी हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप जितने मात्रिक छंद हैं, उतने वर्ण-वृत्त नहीं । पंत और अयोध्यासिंह उपाध्याय के काव्य की तुलना करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। उनकी सूझ-बूझ ने विषयानुकूल छन्दों का प्रयोग किया है ।

अनुभूति-प्रधान तथा गेय गीत यदि छोटे हैं, तो वर्णनात्मक और आरती वाले पद लम्बे हैं, क्योंकि संगीत की दृष्टि से लम्बे पद उपयुक्त नहीं होते, उनमें आलाप नहीं भरा जा सकता ।

घटनात्मक रचनाओं में 8, 11, 12 और 15 मात्राओं वाले छंदों का प्रयोग हुआ है । उनका सर्वाधिक प्रिय छंद 28 मात्राओं वाला है, यद्यपि उनके गीतों में 22, 24,25,27 मात्राओं के छंदों का भी प्रयोग हुआ है।

28 मात्रा वाले छंद को उन्होंने अपनी प्रतिभा और संगीत-कौशल से जगह-जगह भिन्न भिन्न रूप प्रदान किया है-क. 16 मात्राओं की टेक है और 28 मात्राओं का अंतरा, तो कहीं 12 की टेक और 28 का अंतरा है।

नाटकीय चित्र उपस्थित करने और ध्वनि-अर्थ की दृष्टि से भी इनके गीत प्रशंसनीय हैं । कहीं नारी के सौंदर्य का, कहीं नायक-नायिका की छेड़-छाड़ का, कहीं उनके हाव-भाव और केलि-विलास का बिम्बात्मक चित्र प्रस्तुत किया गया है, तो कहीं उनकी विनोदप्रियता में ध्वनि से सहायता ली गई है।

छोड़ कन्हैया मोर आंचर रे, फाटत नव सारी।’

अपजस होएत जगत भरि हे, जनु करिअ उघारी’ में नायक-नायिका की चपलता, नायक की ढिठाई, नायिका की क्रीड़ा, आँचल खींचने और छुड़ाने का उपक्रम, उनके बीच संवाद की चुहल और संवाद के समय नायिका के विभ्रम का चित्र साकार हो उठता है, विद्यापति ने परवर्ती कवियों-कबीर, मीरा, सूर, तुलसी, अष्टछाप के ब्रजभाषा कवियों और रीति-काव्य को भी प्रभावित किया, अतः उनकी देन अविस्मरणीय है ।

कबीर के भक्ति-काव्य में प्रेम का सुकुमार एवं मधुर तत्त्व, मीरा के काव्य में पाया जाने वाला कृष्ण का लीला-माधुर्य, मिलनोत्कंठा और उत्कट विरह-पीड़ा, अभिसार, मान तथा संयोग के चित्र, अष्टछाप तथा रीति काल के कवियों की रचनाओं में शृंगार के आलम्बन, आश्रय, अनुभाव, दूती, अभिसार, मानमनुहार अर्थात् शृंगार-निरूपण की पद्धति सभी पर विद्यापति की छाप है ।

Subcribe on Youtube - IGNOU SERVICE

For PDF copy of Solved Assignment

WhatsApp Us - 9113311883(Paid)

Post a Comment

0 Comments

close