बाणभट्ट की आत्मकथा' के सृजन के पीछे हजारीप्रसाद द्विवेदी का उद्देश्य अतीत-वैभव की भव्यता का चित्र प्रस्तुत करना नहीं था और न ही ऐतिहासिक घटनाओं एवं तिथियों को ब्योरेवार प्रस्तुत करता था। इस रचना का उद्देश्य था ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में तत्कालीन युगीन जीवन के आंतरिक यथार्थ को उद्घाटित करना। इसलिए ऐतिहासिक तथ्य और सांस्कृतिक तत्वों का आधार लेकर तत्कालीन युग-सत्य की खोज की गयी है। द्विवेदी जी ने एक युग-विशेष की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की छानबीन कर समकालीन संदर्भों में उनकी संगति बिठायी है। इस उपन्यास के द्वारा मानवीय मूल्यों की चिंता, मानवता की स्थापना, नारी-स्वतंत्रता, जातिविहीन समाज की स्थापना के द्वारा स्वाघीन भारत की कल्पना को साकार करने का प्रयास किया गया है। अत: यह उपन्यास जितना ऐतिहासिक है उतना समसामयिक भी। यह लेखक की गहरी सूझ-बूझ, यथार्थवादी दृष्टिकोण और सर्जनात्मक विशिष्टता का ही प्रमाण है कि अतीतकालीन समस्याएँ अपने समय के संदर्भ में जितनी सार्थक है, आज के संदर्भ में उतनी ही संगत भी। अपने समय की स्थितियों के प्रति सजगता और कलात्मक चेतना के कारण द्विवेदी जी समय के अंतर को सहजता से दूर करते हैं। ऐतिहासिक कथ्य को कल्पना का आधार देकर मानवीय सवेदनाओं, जटील संबंधों को, सच्चे प्रेम और चिंताओं को वास्तविक धरातल से जोड़ देते हैं। इससे उपन्यास में जितनी गहराई, व्यापकता है उतनी ही विश्वसनीयता भी शामिल है।
महाराज
हषर्वर्धन के राज्यकाल में जो विदेशी आकमण हुए तथा उनके परिणामस्वरूप जनता को जो
असहनीय कष्ट और अमानवीय यातनाएँ भोगनी पड़ी इसका चित्रण योग्य विम्बयोजना के माध्यम
से किया गया है। इस भयावह स्थिति से देश को उबारने के लिए ही उपन्यासकार द्विवेदीजी
ऐतिहासिक दृष्टि व्यापक, मानवीय घरातल से उठती है, वे ऐतिहासिक बोध की सार्थकता को मानवीय उपयोगिता में मानते हैं। सामाजिक
विकास की प्रकिया में इतिहास की वैज्ञानिक दृष्टि को कैसे उपयोग में लाया जा सकता
है यह पहली बार बाणभद्ट की आत्मकथा' के द्वारा स्पष्ट हो
जाता है। इतिहास के विकास और पतन में जनसाधारण की भूमिका का महत्व जन संघर्ष और
विकास की कहानी व्यक्ति के स्थान पर समूह का महत्व और जनसामान्य की सोच का क्या
प्रभाव होता यह पहली बार द्विवेदीजी की इतिहास दृष्टि में परिलक्षित हुआ है।
बाणभट्ट
की आत्मकथा' के विजन में केन्द्रीय स्थिति एक ऐसी
प्रेम-संवेदना की है जो लोकोत्तर है। उपन्यास का नायक बाणभट्ट निपुणिका और भटिटनी
के प्रेम का आलम्बन है। यह प्रेम अपनी गहनता, तीव्रता,
त्याग और संयम में अद्वितीय है। निपुणिका का बाणभट्ट के प्रति प्रेम
उद्दाम होते हुए भी आत्मबलिदान में समाप्त होकर उसे उदात्त बना देता है। द्विवेदी
जी प्रेम के उस भारतीय आदर्श के कायल हैं जो मानता है कि तपस्या और लोकमंगल की भावना
से सम्पन्त होने पर ही प्रेम स्थाई और कल्याणकारी होता है। कालिदास ने अपने
काव्यों में इसी प्रेम का चित्रण किया है। बाणभट््ट की आत्मकथा में निपुणिका का
बाणभट्ट के प्रति प्रेम कामजन्य था, इसी कारण वह कमल पत्र पर
पड़ी जल की बूँद की तरह बिखर गया। पर जब यह प्रेम छह वर्षों के पश्चाताप और प्रायश्चित
की आँच में तप कर कंचन बन गया तो इसमें स्थायित्व आ गया। बाणभट्ट की आत्मकथा की एक
पात्र, महामाया, एक स्थान पर बाणभट्ट
से कहती है : “स्त्री प्रकृति है। उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किन्तु सार्थकता पुरुष की म॒कति में है।“(प. 91-92) निपुणिका
पर महामाया के इस कथन का अद्भुत प्रभाव पड़ा है। जब निपुणिका को विश्वास हो जाता
है, और बाणभट्ट भी इसकी पुष्टि कर देता है, कि वह बाणभट्ट को बाँधने में सफल हुई है तब वह उसे मुक्त कर अपनी सार्थकता
प्रमाणित करती है और वह भट््टनी तथा उसके बीच से हट जाती है। अपनी मृत्यु की घड़ी
में भी वह परम सस्तुष्ट है।
भटिटनी और बाणभटूट का प्रेम तो और भी उदात्त है। बाणभट्ट भट््टनी
को,
जो एक अपुहत राजकुमारी है, हर्षवर्द्धन के एक
सामन््त के अन्तःपुर से निकाल कर उसकी रक्षा करता है। इस साहसिक अभियान के पीछे
काम की नहीं, बल्कि कर्तव्य की प्रेरणा है। बाणभट््ट नारी
का बेहद सम्मान करता है, वह नारी देह को देवमन्दिर मानता है।
निपुणिका के प्रेम की उपेक्षा भी उसने अपने इसी मूल्यबोध के कारण, अनजान में, कर दी धी। निपुणिका की प्रेरणा से ही वह
अपनी जान की बाजी लगाकर, भट्टनी की रक्षा करता है। बाणभट्ट
और भटिटनी, साथ में निपुणिका भी, काफी
दिनों तक साथ साथ रहते हैं। 'इसी साहचर्य से भटिटनी के मन
में बाणभट्ट के प्रति अनुराग का उदय होता है। पर यह प्रेम वाणी के माध्यम से तो
कभी व्यक्त नहीं ही होता, आंगिक चेष्टाओं और सात्विक भावों के
रूप में भी बड़ी मुश्किल से व्यक्त होता दिखाई देता है। बाणभट्ट भट्टनी की पूजा करता
है; भदटिटनी के प्रति उसके मन में केवल श्रद्धा ही श्रद्धा
है, समानता के स्तर पर
प्रतिष्ठित होने वाला प्रेम नहीं। इस प्रेम में भावना का उफान कहीं नहीं दिखाई देता; शरीर प्राप्ति या काम का आकर्षण तो इसमें है ही नहीं। यह प्रेम केवल भावना के रूप में है जो अत्यन्त प्रगाढ़ तो है, पर काम का अतिकमण कर भक्ति के क्षेत्र में पहुँचा हुआ है। निपुणिका और भटिटनी दोनो बाणभट्ट से प्रेम करती हैं, पर चूँकि यह प्रेम काम का अतिकमण कर चुका है, अत: वे एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या या असूया भाव से ग्रस्त नहीं हैं। उपन्यास के अन्त में बाणभट्ट के प्रति भटिटनी का प्रेम अभिव्यक्त होता है, पर वह प्रेम मानव कल्याण के एक उदात्त लक्ष्य के प्रति समर्पित है, शारीरिक मिलन के प्रति नहीं।
बाणभट्ट
की आत्मकथा में चित्रित प्रेम सामान्यत: उपन्यासों में चित्रित होने वाले प्रेम की
तुलना में निश्चय ही विशिष्ट है। कुछ लोगों को यह प्रेम हवाई, अमनोवैज्ञानिक, आदर्धवादी, अयथार्थ
आदि प्रतीत हो सकता है, पर इससे गुजरने का एक अपना सुख है।
यह प्रेम उपन्यासकार के अपने विशिष्ट विजन की वस्तु है, जिसे
विश्वसनीय रूप में प्रस्तुत करने में उसे अद्भुत सफलता मिली है। यह विजन आगे चलकर
एक व्यापक सामाजिक यथार्थ की पृष्ठभूमि निर्मित करता है।
बाणभट्ट
की आत्मकथा' प्रेम की संवेदना तक सीमित नहीं है। इसके भीतर एक
राष्ट्रीय संकट का इतिहास बोध भी सत्निहित है। किसी भी राष्ट्र के इतिहास में
राजनीतिक संकट, जिसमें विदेशी शक्तियों का आक्रमण भी शामिल
है, आते ही रहते हैं। जिस समय 'बाणभट्ूट
की आत्मकथा” लिखी जा रही थी, भारत परतन्त्र था और द्वितीय
विश्वयुद्ध की विनाशलीला अपने चरम पर थी। उपन्यासकार की चेतना में यह परतन्त्रता
राष्ट्रीय संकट के रूप में विद्यमान थी। इसकी अभिव्यक्ति बाणभट्ट की आत्मकथा में
परोक्ष रूप में, हषवर्द्धन काल के राष्ट्रीय संकट के रूप में,
हुई है। यद्यपि स्वयं हजवर्द्धन को हूणों के किसी आकमण का सामना
नहीं करना पड़ा था, पर उसके राज्यकाल में पश्चिम से उनके
आकमण की सम्भावना बनी हुई थी। बाणभट्ट की आत्मकथा में इस सम्भावना को औपन्यासिक
प्रसंग के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रसंग के रूप में द्विवेदी जी का
इतिहास-बोध भी व्यक्त हुआ है। इतिहासकार इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि भारत में
विदेशी आकमणकारियों की सफलता का प्रमुख कारण सामान्य जनता की राजनीतिक उदासीनता या
तटस्थता, हिन्दू समाज व्यवस्था के विरोधाभास, समाज का अनेक जातियों में विभाजन तथा निरन्तर बढ़ता जातिभेद और वर्गभेद
था। इस काल की जनता को इस बात का बोध नहीं था कि विदेशी आक्रमणकारियों से युद्ध
में उसकी भी कोई भूमिका हो सकती है। इसका एक बड़ा कारण गुप्तकाल के बाद जातिगत
भेदभाव और संकीर्णता में निरन्तर होती वृद्धि थी। युद्ध क्षत्रियों का पेशा तो
बहुत पहले से ही माना जाता था, पर धीरे धीरे यह मान्यता
कट्टर संकीर्णता में परिणत होती गयी और युद्ध करना केवल राजपूतों का काम माना जाने
लगा। इसके अतिरिक्त गुप्त काल में सामन््ती प्रथा का जन्म हुआ, जिसके कारण सेना में भी वर्णभेद की स्थिति पैदा हो गयी। जब तक सम्राट्
शक्तिशाली रहे तब तक तो इस व्यवस्था से लाभ ही होता रहा पर केन्द्रीय शक्ति के
दुर्बल होते ही यह व्यवस्था सैन्य शक्ति की दुर्बलता बन गयी। बाणभट्ट की आत्मकथा
में इस राजनीतिक स्थिति को मार्मिक और ऐतिहासिक यथार्थ के रूप में प्रस्तुत किया
गया है। उपन्यास में कुमार कृष्णवर्द्धन, भर्वुर्मा, लोरिकदेव आदि भारतवर्ष को हूणों के आक्रमण से बचाने के लिए किसी राजशक्ति
की, विशेष कर पश्चिमोत्तर सीमान्त के प्रतापी शासक तुवर
मिलिन्द की, भूमिका को आवश्यक मानते हैं। पर विद्रोहिणी
महामाया भैरवी इसका विरोध करती है। वह एक जनसभा को सम्बोधित करती हुई कहती है :
“आर्य, सभासदों, उत्तरापध के
लाख लाख नौजवानों ने कया ककण वलय धारण किया है? क्या वे वृद्धों
और बालकों, बेटियों और बहुओं, देवमन्दिरों
और विहारों की रक्षा के लिए अपने प्राण नहीं दे सकते? क्या
इस देश के दिद्वानों में स्वतन्त्र संगठन बुद्धि का विलोप हो गया है?” (ए(. 216) वस्तुत: यह महामाया भैरवी का नौजवानों और
विद्वानों से प्रश्न नहीं है,बल्कि उपन्यासकार का अपने
समकालीन नौजवानों और बुद्धिजीवियों को आहवान है। महामाया युवकों को देवपुत्रों'
और 'महाराजाधिराजों' की
आशा छोड़ने और संगठित होकर आकमणकारियों का सामना करने के लिए उद्ब॒ुद्ध करती है।
वह घोषणा करती है : “राजाओं, राजपुत्रों
और देवपुत्रों की आशा पर निश्चेष्ट बने रहने का निश्चित परिणाम पराभव है। प्रजा
में मृत्यु का भय छा गया है, यह अशुभ लक्षण है। अगर तुम
आर्यावर्त को बचाना चाहते हो तो प्राण देने के लिए तत्पर हो जाओ। धर्म के लिए
प्राण देना किसी जाति का पेशा नहीं है, वह मनुष्य मात्र का
उत्तम लक्ष्य है। अम्रत के पुत्रो, मैं भविष्य देख रही हूँ। राजा,
महाराजा और सामन््त स्वार्थ के गुलाम बनते जा रहे हैं। प्रजा भीर
और कायर होती जा रही है। विद्वान और शीलवान नागरिकों की बुद्धि कुठित होती जा रही
है। धर्माचरण में इसलिए व्याघात उपस्थित हुआ है कि राजा अन्धा है, प्रजा अन्धी है और विद्वान् अच्धे हैं।अपने आप को बचाओ, धर्म पर डुढ़ रहो, न्याय के लिए मरना सीखो, ब्राहमण से चांडाल तक एक हो जाओ--चदूटान की तरह दुर्भेद्य एक। यही बचने का
उपाय है।“वस्तुत: यह उद्बोधन उपन्यासकार का है जो ब्रिटिश शासन काल में भारतीय
जीवन में व्याप्त मतभेद, जड़ता, कायरता
और निर्णयहीनता से व्यथित था। तत्कालीन भारत की स्थिति से पीड़ित लेखक का सारा
आक्रोश इस उद्बोधन द्वारा व्यक्त हुआ है। उपन्यास की महामाया भैरवी गैरिकधारिणी भैरवियों
का दल संगठित कर, समस्त देश में घूम घूम कर, युवा शक्ति को जगाती है। यह उपन्यासकार का नारी शक्ति को आहवान भी माना जा
सकता है।
बाणभट्ट की आत्मकथा में तत्कालीन हिन्दू समाज में व्याप्त स््तरभेद
और जातिभेद की ओर भी इशारा किया गया है। महामाया भैरवी देश की रक्षा के लिए
ब्राहमण और चांडाल को एक हो जाने का सन्देश देती है। भट्टनी यहाँ की सामाजिक
व्यवस्था की दुखती रग पर उँगली रखती है : “ यहाँ इतना स्तर भेद है कि मुझे आश्चर्य
होता है कि यहाँ के लोग कैसे जीते हैं। तुम यदि किसी यवन कन्या से विवाह करो तो यह
इस देश में एक भयंकर सामाजिक विद्रोह माना जाएगा। जहाँ भारतवर्ष के समाज में एक
सहस्न स्तर हैं वहाँ उनके (यवनों के) समाज में कठिनाई से दो-तीन होंगे। भारतवर्ष
में जो ऊँचे हैं वे बहुत ऊँचे हैं, जो नीचे हैं उनकी
निचाई का कोई आर पार नहीं: परन्तु उनमें सब समान हैं। उनकी स्त्रियों में रानी से
लेकर परिवारिका तक के और गणिका से लेकर वार-विलासिनी तक के सैकड़ों भेद नहीं हैं
।“वस्तुत: यह चिन्ता अपने समय को लेकर उपन्यासकार की है जिसे उसने सातवीं शताब्दी
के भारतीय समाज के चित्रण के रूप में प्रस्तुत किया है। महामाया भैरवी और भटिटनी
के द्वारा जो आहवान उपन्यास में किया गया है, स्वाधीनता
आंदोलन के दौरान वह कार्य महात्मा गांधी द्वारा सम्पन्न हुआ है। गांधी जी के
आह्वान पर ही भारत की विभिन्न जातियों के लोग, किसान-मजदूर,
हिंदू-मुसलमान एक जुट होकर स्वाघीनता संग्राम के लिए एक मंच पर आए।
इस तथ्य की ओर भी उपन्यासकार संकेत करता है।
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