प्राचीन काल से लेकर उनन्नीसवीं शताब्दी के लगभग तीसरे चरण तक प्रबन्ध काव्य और नाटक में गौण तत्त्व के रूप में 'कथा' का प्रयोग होता रहा। गद्य में कथा की परम्परा विष्णु शर्मा कृत “पंचतन्त्र' से प्रारंभ हुई। बाणभट्ट ने 'कादम्बरी' ओर 'हर्षचरित' के रूप में गद्यकथा को काव्य के पद पर प्रतिष्ठित किया। सुबन्धु और दंडी ने भी इस परम्परा को आगे बढाया। उन्नीसवीं शताब्दी में, मुद्रणयन्त्र के प्रवेश के बाद भारत में 'कथा' न केवल बाल-बुद्धि के मनोविनोद के लिए पुस्तक का रूप ग्रहण करने लगी, अपितु लेखक के विचोरों, भावों और नैतिक बोध की अभिव्यक्ति का साधन भी बनने लगी। हिन्दी में कथा के इन्हीं रूपों से 'उपन्यास' और 'कहानी' विधाएं विकसित हुई।
आधुनिक विधा के रूप में “कहानी' पद का प्रयोग
आधुनिक विधा के रूप में कहानी पद का प्रयोग संस्कृत भाषा के शब्द ' आख्यायिका' से हुआ। आधुनिक समय में मुद्रण यंत्र के आगमन के बाद “कथा' श्रव्य के साथ-साथ पाठये होने लगी और उनन्नीसवीं सदी के आरंभ में कहानी विधा अनेक परिस्थितियों के गर्भ में कुलबुलाते हुए उपन्यास विधा के प्रारंभ के पश्चात ही सामने आई। 'कहानी' लेखन का आरंभ पहले बंगला में 'छोटी गल्प' के नाम से हुआ, जोकि अंग्रेजी की 'शॉर्ट स्टोरी' का रूपांतरण था और हिन्दी में 'कहानी' का आरंभ “आख्यायिका' नाम से हुआ, जिसे बाद में 'कहानी' के रूप में जाना गया।
अंग्रेजी के शॉर्ट स्टोरी' पद और अवधारणा से “कहानी' का संबंध
अंग्रेजी आलोचकों ने “शॉर्ट स्टोरी' की पहचान ऐसी संक्षिप्त गद्यकथा के रूप में की है, जो “नॉवेल', 'एपिक' ओर “रोमांस” जेसे बृहदाकार, व्यापक फलक वाले कथा-रूपों से भिन्न होती है तथा इसका उद्देश्य किसी एकल प्रभाव की सृष्टि करना होता है, जो किसी एक सार्थक प्रसंग या दृश्य से, तो कभी एक पात्र के माध्यम से बिजली की चमक की तरह उद्भासित हो उठता हे। 'शॉर्ट स्टोरी' में मितप्रसारी दृश्य-रचना और संक्षिप्त वर्णन होते हैं तथा चरित्र कार्य-व्यापार का पूर्ण विकास नहीं दिखाया जाता, जबकि 'कहानी' किसी कालबिन्दु में सिमटी किसी मानवीय कार्य-व्यापार या प्रसंग को उजागर करती है। “कहानी ' में कहानीकार भावना या विचार को कलात्मक प्रस्तुतीकरण के द्वारा विस्मृत संवेदना का दर्शन कराते हुए पाठक को भाव-विभोर करते हुए रसासिक्त बना देता है।
कहानी का आकार
“छोटी कहानी' पद में उसके आकार की दृष्टि से, 'छोटा' होने का भाव निहित है। 'उपन्यास' और “कहानी ' में अंतर का आधार उनका आकार ही है। पर 'छोटा' और “बडा' शब्द-सापेक्ष हैं और उनका कोई निश्चित मापदंड नहीं निर्धारित किया जा सकता। 'छोटी कहानी ' या 'शॉर्ट स्टोरी' की एक “क्लासिक परिभाषा के अनुसार उसे एक बैठक में समाप्त हो जाना चाहिए। एडगर एलेन पो ने आधे घंटे से लेकर दो घंटे में समाप्त होने वाली रचना को कहानी माना है। परतु ये तर्क उचित नहीं हैं। कुछ परिभाषाओं द्वारा कहानी को अधिकतम शब्द-संख्या 7,500 निर्धारित की गई हैं। सामान्य व्यवहार में 'शॉर्ट स्टोरी' शब्द अधिकतम 20,000 और न्यूनतम 1,000 शब्द वाली रचनाओं के लिए प्रयोग होता है। एक हजार से कम शब्दों की कहानियों को अंग्रेजी में 'लेस फिक्शन', “शॉर्ट स्टोरी' या “माइक्रो स्टोरी” नाम से जाना जाता है और 20,000 शब्दों से ज्यादा वाली कथाओं को “नॉवेलेट', 'नोवेला' या 'नॉवेल' कहते हैं। हिन्दी में 150 शब्दों से लेकर 10,000 शब्दों तक की कहानियों को छोटी कहानी की संज्ञा दी गई है। साथ ही हिन्दी में लघु कथा और “लम्बी कहानी' पद का भी प्रयोग काफी अराजक रूप में होने लगा है। कहानी-लेखकों और सम्पादकों के अनुसार इनकी आकार-सीमा अक्सर बदलती रहती हे। “लघु कथा', “कहानी ', “लम्बी कहानी', उपन्यासिका, 'लघु उपन्यास' और “उपन्यास' के बीच की दूरी इतनी लचीली होनी चाहिए कि जरूरत पड़ने पर ये एक-दूसरे का स्थान ले सकें। कहानी का पहचान का प्रमुख आधार
'शॉर्ट स्टोरी! विधा पहले यूरोपीय भाषाओं में विकसित हुई। बंगला में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशक के ' शॉर्ट स्टोरी' के नमूने पर 'छोटी गल्प' या “गल्प” नाम से लगभग 44 रचनाएं लिखी। 1900-1910 में हिन्दी-उर्दू में इसी श्रेणी की रचनाएं “सरस्वती ', 'जमाना' आदि पत्रिकाओं में 'आख्यायिका' और “'कहानी' नाम से प्रकाशित हुईं।
अंग्रेजी आलोचकों द्वारा 'शॉर्ट स्टोरी' की पहचान 'नॉवेल', 'एपिक' और 'रोमांस' जेसी बड़ी रचना के कथा-रूप से भिन्न रचना के रूप में की जाती हे। 'शॉर्ट स्टोरी' का उद्देश्य किसी एकल प्रभाव की सृष्टि करना होता है, जो किसी एक सार्थक प्रसंग या दृश्य से, जिसमें कुछ थोडे पात्र कार्यरत होते हैं। अनेक आलोचकों के अनुसार छोटी कहानी उपन्यास की तुलना में कम जटिल तथा किसी एक प्रसंग पर केन्द्रित होती है। हिन्दी में प्रेमचन्द और रामचन्द्र शुक्ल ने कहानी के स्वरूप-निर्धारण का प्रयास किया। मानसरोवर, भाग-1 के प्राक्कथन में प्रेमचन्द लिखते हैं-“वर्तमान आख्यायिका मनोवेज्ञानिक विश्लेषण ओर जीवन के यथार्थ स्वाभाविक चित्रण को अपना ध्येय समझती हे। उसमें कल्पना की मात्रा कम, अनुभूतियों की मात्रा अधिक होती है, बल्कि अनुभूतियां ही रचनाशील भावना से अनुरंजित होकर कहानी बन जाती हे।”
रामचन्द्र शुक्ल ने अपने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास” में प्राचीन कथा साहित्य (संस्कृत) में उपलब्ध कथाओं को दो स्थूल भेदों-'घटनाप्रधान' ओर “मार्मिक' में वर्गीकृत किया है। 'बृहतकथा', 'बेतालपचीसी ', “सिंहासन बत्तीसी' आदि को उन्होंने “'घटनाचक्र में रमानेवाली रचनाएं माना, तो “कादम्बरी' “'माधवानल', “'कामकन्दला' आदि को मार्मिक स्थलों में रमानेवाले भावप्रधान आख्यान कहा है। उन्होंने नाटक में विषय में कहा है कि उसमें घटनाओं की श्रृंखला लगातार सीधी न जाकर इधर-उधर ओर श्रृंखलाओं से गुंफित होती चलती है और अन्त में जाकर सबका समाहार हो जाता है। शुक्ल जी के अनुसार घटनाओं के विन्यास की यह वक्रता उपन्यासों और आधुनिक कहानियों को नए-पुराने से अलग करता है। इसी आधार पर शुक्ल जी ने राजा शिवप्रसाद की “राजा भोज का सपना' को “आधुनिक कहानी' नहीं माना। शुक्ल जी ने स्पष्ट किया कि अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाली 'छोटी आख्यायिकाओं या कहानियों” से प्रेरणा लेकर बंगला में गल्प के नाम से कहानियां प्रकाशित की गईं।
कहानी में नये प्रयोग होते रहे हैं, आज भी हो रहे हैं। हिन्दी कहानी के बीसवीं सदी के छठे दशक में प्रवेश करते समय विश्व स्तरपर कहानी का रूप अत्यधिक वैविध्यपूर्ण और जटिल हो चुका था। आश्चर्यपूर्ण घटनाएं 19वीं शताब्दी की कहानी की पहचान हुआ करती थीं, परन्तु बीसवीं शताब्दी के सूक्ष्म कार्यव्यापारों और सामान्य प्रसंगों को कहानीकारों ने ज्यादा महत्त्व दिया।
विश्व स्तर पर भी, बीसवीं शताब्दी के कहानी-लेखक की संरचनात्मक समस्याओं का समाधान पूरी तरह नहीं हो पाया। प्रारम्भिक संरचना के अभिकर्त्ता के रूप में आश्चर्यजनक ओर कौतूहलजन्य प्रसंगों का व्यापक रूप में बहिष्कार हो गया। वर्तमान में 'छोटी कहानी' एक छोटे, पर बौद्धिक दृष्टि से ज्यादा मांग करने वाले पाठकवर्ग का प्रिय कथा-रूप बन चुकी है। संरचना की दृष्टि से चौथे दशक में हिन्दी कहानी प्रौद़ता पर पहुंच गयी, जिसका श्रेय प्रेमचन्द के साथ जेनेन्द्र और अज्ञेय को दिया जा सकता है। अमरकान्त, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, शेखर जोशी, इन्तिजार हुसैन निर्मल वर्मा, रेणु आदि ने कहानी की संरचना को छठे दशक में नए आयाम प्रदान किए।
कहानी और उपन्यास
कथ्य की दृष्टि से यद्यपि 'उपन्यास' और 'कहानी' लगभग समान हैं ओर दोनों ही मानव जीवन की सच्चाइयों और संवेदनाओं का चित्रण करते हैं, किन्तु उपन्यास में मानव-जीवन की सच्चाइयों और संवेदनाओं का एक 'विजन' में समाहार होता है, वहां कहानी मात्र एक सच्चाई या संवेदना के बिन्दु पर केन्द्रित होती है। कहानी का यथार्थ जीवन के एक हिस्से तक सीमित होता है, उसमें पात्रों की संख्या भी सीमित होती है। उपन्यास में जीवन व्यापक संदर्भ में अनेक पात्रों द्वारा व्यक्त होता है। कहानी में केन्द्रीय पात्र के चरित्र का भी कोई मार्मिक प्रसंग, कोई संकट, कोई अप्रत्याशित स्थिति, कोई मनोवैज्ञानिक द्वन्द्र की कहानी का विषय बनता हेै। उपन्यास में मनुष्य के जीवन, उसके सामाजिक संबंधों, उसकी मनोवैज्ञानिक समस्याओं आदि के अवलोकन, विश्लेषण और अंकन के लिए पर्याप्त अवकाश होता हे।
कहानी का उद्देश्य
कहानी के एक नहीं अनेक उद्देश्य हो सकते हैं। “कथा' का उद्देश्य मनोरंजन, किसी उपदेश की व्यंजना या किसी नैतिक मूल्य का प्रतिपादन भी हो सकता है। आयरिश कहानी-लेखक फ्रैंक ओ कोनोर का 'छोटी कहानी ' के उद्भव के संबंध में मानना है कि कहानियां 'सतह के नीचे छिपे आबादी-समूह ' द्वारा प्रभुत्वसम्पन्न समुदाय को सम्बोधित करने का साधन है। कहानी के इस गुण को भारतेन्दु युग के लेखकों ने नहीं समझा था। माथव प्रसाद मिश्र (पुरोहित का आत्मत्याग), माधवराव सप्रे (एक टोकरी भर मिट्टी), मास्टर भगवान दास (प्लेग की चुडैल), गिरिजादत्त वाजपेयी (पंडित ओर पंडितानी), बंगमहिला (कुम्भ में छोटी बहू ओर दुलाई वाली) ने और नबाबराय (प्रेमचन्द) ने इसे समझकर अपनी रचनाओं में इसकी अभिव्यक्ति भी की। नवाब राय ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध दमित शासित वर्ग की व्यथा और विद्रोह को वाणी देने के लिए इसका प्रयोग किया। भारतेन्दु युग की पत्रिकाओं में व्यक्तिगत निबन्धों, लेखों और सम्पादकीय टिप्पणियों द्वारा ओऔपनिवेशिक शासन से ग्रस्त भारतीय जीवन की यथार्थ तसवीर यथार्थवादी उपन्यासों के माध्यम से भी समकालीन जीवन ओर व्यक्तियों की झाँकियाँ प्रस्तुत होने लगीं।
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