’त्याग-पत्र’ डायरी और संप्रेषण की शैली में लिखा हुआ उपन्यास है। हम प्रेमचंद के उपन्यास से तुलना करके ‘त्याग-पत्र’ की संरचना और शैली को समझ सकते हैं। प्रेमचंद लेखक के रूप में अपने उपन्यासों की कथा कहते हैं। वे पूरे समय उपन्यास में उपस्थित रहते हैं। कथा चरित्र और घटनाओं का वे स्वयं वर्णन करते जाते हैं और उसका अर्थ भी करते जाते हैं। प्रेमचंद के उपन्यासों में लेखक प्रत्येक स्थिति पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित रहता है। उनके उपन्यास की कथा का आरम्भ होता है, फिर कथा विकसित होती है अगर अंत में किसी निष्कर्ष पर पहुँच कर समाप्त हो जाती है।
‘त्याग-पत्र में ऐसा नहीं होता। इस उपन्यास के प्रारम्भ में ही लिखा हुआ है कि यह मौलिक सामाजिक उपन्यास है और इसके लेखक जैनेन्द्र कुमार हैं। अर्थात यह अनुवाद नहीं है। इसके बाद उपन्यास से जैनेन्द्र कुमार गायब हो जाते हैं। पाठकों को यह सूचित किया गया है कि यह उपन्यास अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसका हिंदी उल्था यहाँ दिया गया है। इसे सर एम. दयाल ने लिखा है जो संयुक्त प्रांत के चीफ जज थे। फिर उन्होंने जजी से त्यागपत्र दे दिया और हरिद्वार में जाकर रहने लगे।
दो महीने पहले उनका स्वर्गवास हो गया। उनके कागजों में यह पाण्डुलिपि मिली है, जिसमें व्यक्तियों और स्थानों के कुछ नाम बदल दिए हैं। यह हम आपको पहले भी बता चुके है। अब इस उपन्यास में से एम. दयाल अनुपस्थित हो जाते हैं। यहाँ प्रमोद नामक नया पात्र आता है। यह प्रमोद उस उपन्यास का कथावाचक है, जो अपनी बुआ मृणाल के जीवन की कहानी कहता है। आरम्भ में ही यह भी बता दिया जाता है कि मृणाल की मृत्यु हो चुकी है। प्रमोद अपने पद से त्यागपत्र दे देता है। इस संरचना के भीतर यह उपन्यास लिखा हुआ है। उपन्यास का अंत होते-होते एम. दयाल फिर आते हैं और अपना त्यागपत्र लिखते हैं और उपन्यास समाप्त हो जाता है। इसको इस तरह से समझ सकते हैं- लेखक जैनेन्द्र कुमार→चीफ जज सर एम. दयाल →कथावाचक प्रमोद→कथा की प्रमुख पात्र मृणाल→और अंत में उपन्यास के पाठक ।
1 संवाद: योजना ‘त्याग-पत्र’ में संवाद बहुत कम हैं। लेखक प्रमोद के माध्यम से वर्णन करता जाता है। जहाँ वह उपस्थित रहता है, वहाँ जो कुछ सुनता है. उन्हें वह पुनः प्रस्तुत करता है इन संवादों के माध्यम से पाठक को मृणाल की मनःस्थिति, उसकी सामाजिक स्थिति और उसके विचारों का पता चलता है। यह अवश्य है कि इन संवादों में मृणाल बहुत तर्कशील, जीवंत और इसी पात्र के रूप में हमारे सामने आती है। प्रमोद और मृणाल की बातचीत हो रही है। मृणाल बीमार है। “चलो, तुम्हें यहाँ के अस्पताल में भर्ती करा दूं।” उन्होंने कहा-जो बात मैंने कही वह तेरी समझ में नहीं आई न चलो ठीक है।
नहीं भाई, अस्पताल में क्यो जाऊँगी। मैंने बताया-अस्पताल में इंतजाम ठीक हो जाएगा। प्राइवेट वार्ड में कर दूंगा। खर्च की फिक्र कुछ मत करो, बुआ। बुआ ने बीच में टोक कर कहा-“लेकिन वही तो फिक्र मुझे है, प्रमोद । तुम बहुत सा रुपया दे जाओ तो क्या अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में दौड़कर मैं चली जाने वाली हूँ? प्रमोद देह है, तब तक दस बीमारियाँ लगी हैं। घबराहट किस बात की है।
2 भाषा : जैनेन्द्र कुमार की भाषा प्रेमचंद की भाषा परंपरा से भिन्न है। ‘त्याग-पत्र में जैनेन्द्र कुमार ने उर्दू-फारसी मिश्रित खड़ी बोली का प्रयोग नहीं किया। वे आमतौर पर सरल तत्सम शब्दों से युक्त सहज भाषा का प्रयोग करते हैं। इसके साथ ही वे जयशंकर प्रसाद की भाँति आलंकारिक तत्सम शब्दों का प्रयोग भी नहीं करते। वे अपनी भाषा को भरसक काव्यात्मक होने से बचाते हैं। इनकी भाषा प्रौढ़ और गंभीर है। चूंकि ‘त्याग-पत्र’ एक चिंतनपरक उपन्यास है, इसलिए इसकी भाषा भी चिंतनपरक है। वे हास्य का प्रयोग लगभग नहीं करते।
कई बार उनकी भाषा में व्यंग्य अवश्य आता है, परन्तु यह व्यंग्य भी मर्यादा की सीमा में रहता है। मृणाल और प्रमोद दोनों औपचारिक और गंभीर भाषा में सोचते और बोलते हैं। अपना क्रोध और नाराजगी भी वे स्यत भाषा में अभिव्यक्त करते हैं। उदाहरण के लिए मृणाल का पति मृणाल को अपने घर से निकाल देता है। उस समय भी उसकी भाषा असंयत नहीं होती। वह सहज, सरल और संयत स्वर में मृणाल से कहता है- “मैं तेरा पति नहीं हूँ” या “हाँ जाओ। अपने मैके चली जाओ।” या “फिर जो चाहे कर. चाहे जहाँ जा।”
3 शैली : जैनेन्द्र कुमार का यह उपन्यास वर्णनात्मक शैली में लिखा हुआ उपन्यास नहीं है। ऐसी वर्णनात्मक शैली का प्रयोग प्रेमचंद के उपन्यासों में मिलता है। जैनेन्द कुमार ने आत्मकथात्मक और संस्मरणात्मक शैली में इस उपन्यास की रचना की है। वर्णनात्मक शैली में लेखक स्वयं सर्वज्ञ होता है तथा वही संपूर्ण घटनाओं का वर्णन करता है। जबकि इस उपन्यास में लेखक से अलग एक कथावाचक है। इस कथावाचक से अलग एक लेखक की कल्पना भी की गई है जो आगे चलकर कथावाचक से अभिन्न हो जाता है।
यह कथावाचक पाठकों को अपनी बुआ मृणाल के जीवन की कहानी सुनाता है अर्थात् इस उपन्यास का पाठक एक तरह का श्रोता है। प्रमोद बुआ की कथा सुना रहा है। चूंकि इन कथाओं का साक्षी प्रमोद होता है, अतः वह अपनी समझ और जानकारी से पाठकों को अवगत कराता चलता है। पाठक को तो विशेष वर्णन भी पढ़ा सकते हैं, लेकिन श्रोता के पास न इतना धैर्य होता है और न इतना समय होता है, इसलिए संक्षेप में मूल बात और घटनाओं को कह दिया जाता है। उपन्यास में जहाँ प्रमोद अनुपस्थित रहता है, वहाँ की सूचनाएँ पाठक को अन्य पात्रों से मिलती है। इन अन्य पात्रों में उपन्यास की नायिका मृणाल को भी शामिल किया जा सकता है।
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