निर्वाह अर्थव्यवस्था वह अर्थव्यवस्था है, जिसमें विभिन्न प्रकार के कार्यकलाप परिवार के निर्वाह या पालन-पोषण के लिए किए जाते हैं। इसमें उत्पादन उतना ही किया जाता है, जो परिवार के सदस्यों के लिए पर्याप्त हो। यहां अधिशेष की गुजाइश बहुत कम होती है। निर्वाह अर्थव्यवस्था में कई कार्यकलाप हैं, जो जीवित रहने के लिए बुनियादी खाद्य साधन उपलब्ध कराते हैं। ये कार्यकलाप हैं खेती, पशुपालन, फल संग्रह और शिकार। हड़प्पा काल में विकसित कृषि व्यवस्था थी, जिसमें पूरे वर्ष खेतों को प्रयोग किया जाता था। शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन दोनों फसलें उगाई थीं, जिसके प्रमाण उत्खनन से मिले-जुले बीज हैं। प्रमुख खाद्य फसलें गेहूँ, जौ, मटर, चना, सरसों और तिल थे। पटसन जैसी रेशेदार फसल भी उगाई जाता थीं। अनार, काजू और अंगूर जैसे फलों की खेती भी की जाती थी।
हड़प्पा के लोग गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सुअर आदि पालते थे, जिनकी खुदाई में हड्डियाँ मिली हैं। सांड, भेड़ा और कुत्ते भी इनके पालतु पशु थे। पशुओं का प्रयोग दूध, परिवहन और हल जोतने के लिए किया जाता था। लोग विभिन्न जानवरों का मांस भी खाते थे। हड़प्पा के लोग प्रायः नदियों के किनारे रहते थे और मत्स्यन का कार्य करते थे। यहाँ सिन्धु नदी की कुछ मछलियों की हड्डियां मिली हैं। हड़प्पा समुद्री मछलियां अन्तर्देशीय बसावटों में पहुँचाई जाती थीं। लोग जंगली जानवरों का शिकार करके उनका आहार के रूप में प्रयोग करते थे। हड़प्पा नगरों में कृषि उत्पादन हड़प्पा क्षेत्र की कृषि गहन थी, क्योंकि एक ही खेत का एक वर्ष में एक से अधिक फसल उगाने के लिए प्रयोग किया जाता था। शीत और ग्रीष्म दोनों फसलों के साक्ष्य का अर्थ है कि हड़प्पा निवासी दोहरी फसल की परंपरा का पालन करते थे।
हड़प्पा की कृषि विभिन्न किस्मों के अन्न, तेल और रेशे वाली फसलों सहित फसलों की एक व्यापक श्रृंखला उपलब्ध कराती थी। सक्रिय प्रोटीन के साथ इसमें दर्शाया कि हड़प्पा का भोजन विविधता से पूर्ण था। यद्यपि हल का फाल अभी तक खुदाई में नहीं मिला है, किन्तु हल के मिट्टी के खिलौने मॉडल इनके प्रयोग की ओर इंगित करते हैं। प्रारंभिक हडप्पाई कालीबंगा में दो अलग-अलग प्रकार के खाँचों से जोते गए। खेत के साक्ष्य से प्रमाणित होता है कि एक से अधिक फसल उगाने का प्रचलन भी था। उत्खनन में मिले अनेक पाषाण फलकों से प्रमाणित होता है कि कुछ का प्रयोग फसल की कटाई के लिए हंसिये के रूप में किया जाता होगा।
हड़प्पा नगरों में खेती के लिए सिंचाई के लिए भी समुचित व्यवस्था थी, यद्यपि नदियों की बाढ़ से खतरा था, परंतु इसके द्वारा छोड़ी गई उपजारू मिट्टी का भी किसानों ने भरपूर फायदा उठाया होगा। नदियों की अपेक्षा नहर या चैनल सिंचाई के लिए अधिक उपयोगी रही होंगी। उन्हें इस प्रौद्योगिकी के बारे में जानकारी भी थी, क्योंकि इसका प्रयोग उन्होंने नाली प्रणाली में किया। भारत में नहरों का साक्ष्य नहीं मिला है, परंतु अफगानिस्तान में शोर्तुघई के स्थल से इसका प्रमाण मिला है। सिंचाई के लिए दूसरी युक्तिसंगत पद्धति कुओं का प्रयोग रही होगी। हड़प्पा के निवासियों को पेयजल के लिए कुएं के निर्माण की प्रौद्योगिकी ज्ञात थी और इसकी पूरी संभावना है कि फसलों के लिए कुओं का पानी खींचने की तकनीकी का सिंचाई के लिए प्रयोग किया गया होगा। हड़प्पा नगर में गैर-कृषि उत्पादन के तीन पैटर्न मौजूद थे, जिसमें पहला पैटर्न लोथल है।
पीरियड I में लोथल एक गैर-हड़प्पई ग्राम है, जहां प्रयोग किए जा रहे, अभ्रकी लाल बर्तन प्राथमिक मृद्भाण्ड थे।
पीरियड II के बाद की अवधि में गांव को साफ कर दिया गया और एक नई नियोजित बसावट स्थापित की गई। इस बसावट से विभिन्न कार्यकलापों, के लिए सीमांकित विशेषीकृत क्षेत्र थे।
निचले नगर के घर दूर-दूर हैं, जो शिल्पों; जैसे सीपी के काम, धातुकर्म और मनकों के काम का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। इनके स्वाभाविक (organic) विकास की संभावना नगण्य प्रतीत होती है और सड़कों के साथ एक सीधी पंक्ति के रूप में बने हैं। एक ऊंचे स्थान पर तथाकथित नसर दुर्ग (Acropolis) था. जहां पकी हुई ईंटों से नालियां और हवन कुंड बनाए गए थे। नगर दुर्ग ऊंचाई पर स्थित होने के कारण इसे बसावट के अंदर अन्य दूसरे क्षेत्रों से अलग करना सरल था और साथ ही निचले शहर में चलाए जा रहे क्रियाकलापों तथा भंडारगृह और गोदी क्षेत्र पर इससे निगरानी रखी जा सकती थी।
लोथल का महत्त्व इसकी अवस्थिति में भी है। समुद्र तट पर आदान-प्रदान के प्रयोजन से खम्भात की खाड़ी के समीप और कच्चे माल; जैसे कार्नेलिर और सेलखडी (Steatite) के स्रोतों के पास अवस्थित होने का तात्पर्य था कि इस बसावट में हडप्पा निवासियों के लिए उत्पादन और वितरण दोनों होते थे।
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