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क्या शिक्षा लोकतंत्रीय व्यवस्था को सुगम बनाती है? चर्चा कीजिए।

भारत में राष्ट्र निर्माण

औपनिवेशिक समाजों में राष्ट्रीय पहचान राष्ट्र तथा राष्ट्रीयता जैसी संकल्पनाएं औपनिवेशिक इतिहास के इर्द-गिर्द निर्मित की जाती हैं। राज्ट्र चेतना की प्रक्रिया एवं प्रत्याशा के समावेश का इतिहास में सर्वाधिक महत्त्व है। भारत के संदर्भ में युवा पीढ़ी को सामाजिकता का पाठ पढ़ाने में स्वतंत्रता संघर्ष का ज्ञान सर्वाधिक महत्त्व रखता है। विद्यालयों में मानसिक रूप से उन्हें पूर्व परिभाषित तरीके से तैयार किया जाता है। कुमार ने राष्ट्रवाद की कुछ ऐसी विरोधी विचारधाराओं की जाँच की, जिनसे स्कूलों ने युवाओं को समाजिक बनाने का प्रयास किया था और ऐसा करने में उसने कुछ ऐसे तरीकों को दष्ठाया जिनमें इतिहास का प्रयोग विशिष्ट विचारधाराओं के मतारोपण के लिए किया जाता है।

अंतत: कुमार, राज्य की राष्ट्र निर्माण योजना को समझने के लिए चयन एवं प्रस्तुतिकरण को समझने के लिए प्रक्रमों पर बल देते हैं। कुमार के अनुसार इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि युवा मस्तिष्क के निर्माण के लिए वक्तव्यों की प्रस्तुति कैसे की जाती है। भारतीय शिक्षा पद्धति राष्ट्र निर्माण के विस्तष्टत उद्देश्य में सहायक है और इसी कारण से छोटी उम्र से बच्चों का राष्ट्रीय विरासत से सामंजस्य स्थापित किया जाता है।  आरंभिक चरणों से ही शिक्षा का सुविचारित प्रयोग राष्ट्र-निर्माण के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है। फलतः अतीत का ज्ञान ऐसा महत्त्वपूर्ण माध्यम है, जिससे भावी पीढ़ी की राष्ट्रीय पहचान बनाने, उनके समाजीकरण एवं संस्कृतिकरण को सुनिश्चित करता है।

इसी कारण स्कूल सैद्धांतिक भूमिका निभाते हैं। स्कूल बच्चों को प्रेरित करने के लिए राष्ट्र की पूर्व ऐतिहासिक उपलब्धियों के सरकारी ज्ञान का प्रयोग करता है, ताकि बच्चे इन्हें समझकर आज्ञाकारी नागरिकों के रूप में अपने कर्तव्यों को भली-भांति पूरा कर सकें। युवाओं को मनोवैज्ञानिक रूप से नागरिक की भूमिकाओं से रू-ब-रू कराने में इतिहास महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कुमार का कथन है कि दोनों राष्ट्र अपनी राष्ट्र निर्माण योजना की वजह से बंटवारे की समान घटना को किस प्रकार अलग-अलग तरीके से प्रस्तुत करते हैं। भारतीय पाठ्यपुस्तकों में सन 1919 से सन 1947 के काल को “गांधीवादी युग” के रूप में देखती हैं, जिसका भारतीय राष्ट्रवादी संघर्ष में विशिष्ट महत्त्व है, चूंकि गांधीजी ने इस आंदोलन की प्रकृति को बदल दिया था।

अत: इस भाग में गांधीजी के व्यक्तित्व, उनकी विचारधाराओं एवं मुहिमों को उजागर किया गया है। इस प्रकार भारतीय पाठ्यपुस्तकें उनके व्यक्तित्व तथा विचारों को प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार ‘राष्ट्र निर्माण’ राष्ट्रीय विकास का प्रतीक बन गया है। इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में किसी नाम या घटना का उल्लेख करना अथवा इनकी उपेक्षा करना आदि बातें इस सर्वोपरि राष्ट्रीय विचारधारा के मार्गदर्शन पर निर्भर करती हैं। कुमार के अनुसार यह ‘स्मृति की राजनीति’ को दर्शाती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष को लेकर भारत और पाकिस्तान के दृष्टिकोण के बीच का फर्क ऐसी घटनाओं के चयन से जुड़ा हुआ है, जिनका वे उल्लेख करते हैं। कुछ विशेष वृतांतों एवं घटनाओं को जहाँ एक संदर्भ में अधिक प्राथमिकता दी जाती है, वहीं दूसरे संदर्भ में उनकी अनदेखी की जाती है।

यह प्रवृत्ति, जिसे कुमार ‘उल्लेख की राजनीति’ कहते हैं, संघर्ष के पिछले सत्रह वर्षों (1930-47) के दौरान होने वाली घटनाओं के प्रस्तुतीकरण में बढ़ जाती है।  इस प्रकार पिछले दशकों में राष्ट्र निर्माण की विचारधारा भारतीय एवं पाकिस्तानी पाठ्यपुस्तकों में पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण बन गई है। यद्यपि दोनों राष्ट्रों की स्वतंत्रता की समझ एक-दूसरे से पृथक है। कुमार इसे भारतीय संदर्भ में रखकर देखते हैं तो पता चलेगा कि भारत का विभाजन क्यों हुआ, जबकि पाकिस्तानी परिप्रेक्ष्य से इसकी अलग जानकारी प्राप्त होती है अर्थात किस प्रकार विभाजन कराया गया। कुल मिलाकर देखा जाए तो इतिहास को सैद्धांतिक मतारोपण के साधन के रूप में देखा जाता है। निस्संदेह, राष्ट्र राज्य द्वारा नागरिकता की प्रखर स्थिति को भी महत्त्व दिया जाता है तथा यह राष्ट्र निर्माण परियोजना के सातत्य के लिए अत्यावश्यक है।

राष्ट्र निर्माण की अवधारणा के स्थायित्व के लिए नागरिकों में देशभक्ति की भावना जाग्रत करना आवश्यक है। राष्ट्र राज्य का अस्तित्व समान नागरिकता के विचार पर अवस्थित होता है। यह सांगीकरण, अल्पसंख्यक संस्कृति एवं उनके अधिकारों को अपने अधीन कर लेता है। देश के सम्मान तथा अखंडता के लिए अल्पसंख्यकों की संस्कृति और उनके अधिकारों की उपेक्षा की जाती है। महाजन के अनुसार, “राष्ट्र राज्य प्रबल वर्गों की संस्कृति को अपनाता है और अल्पसंख्यक संस्कृतियों को उपेक्षित एवं दरकिनार कर देता है। अल्पसंख्यक संस्कृति राष्ट्र के राजनीतिक रूप से सशक्त व्यक्ति जीवन पर निर्भर करती है जो कि विस्तृत रूप से एक व्यक्ति समान नागरिकता के उदारवादी आदर्श में विश्वास रखती है।

अल्पसंख्यक समुदाय उदारवादी राष्ट्र राज्यों में भी सांस्कृतिक रूप से उपेक्षित रहता है। राज्य की समांगी (homogenizing) प्रवृत्तियाँ सभी संस्कृतियों के पक्ष में नहीं होतीं तथा ये समाज के प्रभुतासंपन्न वर्गों के ही अनुकूल होती हैं। उदाहरणस्वरूप, नौकरी प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को राष्ट्रभाषा का ज्ञान होना जरूरी है। भारत में बहुत से मामलों में समुदायों को दरकिनार किया जाता है लेकिन छोटा परंतु प्रबल अल्पसंख्यक समुदाय राष्ट्रीय संसाधनों को नियंत्रित करता है। यह आधुनिक एवं आधुनिक बनने वाले कुलीन वर्गों की नई किस्म की अल्पसंख्यक गति है जो राष्ट्रीय जीवन पर आधिपत्य कायम करती है और जो अल्पसंख्यकों की संस्कृति को न केवल कम महत्त्व देकर बल्कि उन्हें समान अवसरों से दरकिनार करके और उपलब्ध संसाधनों तक उनकी पहुँच को कठिन बनाकर जनसंख्या के बड़े वर्ग को नुकसान पहुँचाती है।

केवल सांस्कृतिक पहचान ही नहीं है, जो इस स्थिति में संकटग्रस्त है, बल्कि इससे सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से भी अल्पसंख्यकों को नुकसान पहुँचाती है। राष्ट्र निर्माण योजना के दौरान ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती कि अल्पसंख्यक पहचान, राष्ट्रीय पहचान के व्याप्त विचार के विरुद्ध हो। “राष्ट्रीय पहचान” स्वयं को बहुसंख्यकों के राजनीतिकसांस्कृतिक लोकाचार के माध्यम से अभिव्यक्त करती है और जो राष्ट्र राज्य की आधुनिकीकरण एवं विकास संबंधी बृहत विचारधारा में दबी रहती है।

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