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वापसी' का कथासार

 ‘वापसी’ नयी कहानी दौर की एक महत्वपूर्ण कहानी है। इस कहानी की रचयिता उषा प्रियंवदा की संभवतः सबसे चर्चित कहानी। कहानी एक सेवानिवृत्त व्यक्ति गजाधर बाबू को केन्द्र में रखकर लिखी गयी है। अपनी रेलवे की पैंतीस साल की नौकरी से रिटायर्ड होकर वे अपने घर आते हैं। अपने बीबी और बच्चों के बीच। बच्चे जो अब जवान हो गये हैं। बड़े बेटे और बड़ी बेटी की शादी हो गयी है। छोटा बेटा और बेटी कॉलेज में पढ़ते हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि उनका घर लौटना उनके लिए एक सुखद अनुभव होगा। उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अकेलेपन से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन ऐसा नहीं होता। उनकी अनुपस्थिति में उनकी पारिवारिक दुनिया बहुत बदल गयी है।

रिश्तों की जिस आँच को वे अभी भी अपने अंदर महसूस करते हैं, परिवार के अन्य सदस्य नहीं महसूस करते। यही वजह है कि उनके बीच एक दूरी कायम हो गयी है। बच्चे ही नहीं वे अपनी पत्नी के साथ भी अपने को नहीं जोड़ पाते। उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उनके लौटने की किसी की खुशी नहीं है बल्कि वे घर में अवांछित मेहमान की तरह है। उनकी मौजूदगी ने उनके सहज जीवन को असहज बना दिया है।यह भावना उनमें इतनी बलवती हो जाती है। कि वे उसी जगह  लौट जाते हैं जहाँ से वे गये थे। कहानी का शीर्षक ‘वापसी’ इसीलिए रखा गया है। अपने ही घर परिवार से इस तरह दूर हो जाने का कारण क्या है, इस बारे में कहानी कुछ नहीं कहती।

पाठक को ही कहानी पढ़कर यह समझना होता है कि गजाधर बाबू और उनके परिवार के बीच कायम दूरी का कारण क्या है और इसके लिए कौन दोषी है। क्या दोष उन परिस्थितियों का है जिनके बचे सभी पात्र जीते हैं। या उन नये जीवन मूल्यों का जिसे न समझ पाने के कारण गजाधर बाबू अपने को परिवार के साथ जोड़ नहीं पाते। गजाधर बाबू और उनकी पत्नी में मूल्यगत भेद नहीं है। दोनों ही बच्चों के व्यवहार को उचित नहीं मानते। लेकिन पत्नी अपनी असंतुष्टि को अपनी बड़बड़ाहट और पति से शिकायत के पीछे छुपा लेती हैं।

बच्चों से टकराने से बचती हैं लेकिन गजाधर बाबू को जो उचित नहीं लगता उसे स्वीकार नहीं कर पाते और बच्चों को टोकते हैं, उनकी आलोचना करते हैं और क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह बताते हैं। इस तरह गजाधर बाबू की मौजूदगी बच्चों के सहज जीवन में अवरोध बन जाती है। इसीलिए वे अपनी माँ से अपने पिता की आलोचना करते हैं। माँ को इस टकराहट में घर की शांति भंग हो जाने का अंदेशा महसूस होता है। यही वजह है कि बच्चों की आलोचना करते हुए भी वह बात का समर्थन नहीं करती कि गजाधर बाबू बच्चे के जीवन में दखलंदाजी करे। घर से दूर रहने के कारण गजाधर बाबू यह नहीं सोच पाते कि दुनिया बहुत बदल गयी है। लड़कियों की प्राथमिकता अब चुल्हा चौकी नहीं बल्कि पढ़ना-लिखना है।

इसी तरह बेटे-बहू भी घर-परिवार में स्वतंत्रता और समानता दोनों चाहते हैं। उन्हें यह पसन्द नहीं है कि उनकी निजी दुनिया में कोई दखल दे, भले ही वह पिता ही क्यों न हो। यदि गजाधर बाबू इस बात को समझ पाते, तो उन्हें बच्चों के व्यवहार से न तो आघात लगता और न ही वे अपने को इतना अकेला महसूस करते। कहानी की सीमा यह है कि वह गजाधर बाबू के नजरिए को तो सहानुभूति के साथ प्रस्तुत करती है लेकिन दूसरे दृष्टिकोणों को समझने का प्रयत्न उसमें नहीं है। दोनों को (गजाधर बाबू और परिवार के शेष सदस्य) अपनी-अपनी आत्मगत दुनिया में बाँध दिया गया है। उनके बीच गजाधर बाबू की पत्नी पुल बन सकती थी, लेकिन बाबू अपनी पत्नी से भी संवाद कायम करने में नाकामयाब रहते हैं।

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