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'लोभ और प्रीति' के भाव-पक्ष पर प्रकाश डालिए।

लोभ और प्रीति भावों की मनोवैज्ञानिक और व्यवहारपरक व्याख्या करना इसका उद्देश्य है, इसे समझने में हमें कोई कठिनाई नहीं होती। लेकिन इतना ही इसका उद्देश्य नहीं है। लोभ और प्रीति भावों पर विचार करते हुए वे अन्य बातों पर भी अपना मत व्यक्त करते हैं। कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि निबंध अवान्तर बातों को स्पष्ट करने के लिए ही लिखा गया है। शुक्लजी के निबंधों में उनकी जीवन दृष्टि और विश्व दृष्टि भी व्यक्त होती है, मसलन, लोभी और प्रीति की बात करते हुए वे देश प्रेम पर भी विस्तार से विचार करते हैं।

देश प्रेम पर यह विचार हमें इस बात को स्पष्ट करने से नहीं रोकता कि निबंध में यह विषय अनायास ही नहीं आ गया है वरन् लेखक सोद्देश्य इसकी चर्चा कर रहा है। इसी प्रकार प्रीति का व्याख्या करते हुए वे प्रेम के विभिन्न रूपों और स्तरों की व्याख्या करते है।भक्ति काव्य का उदाहरण देकर वे उस प्रेम की श्रेष्ठता बताते हैं जो लोकोन्मुख हो। स्वयं शुक्लजी के शब्दों में, उस  एकान्तिक प्रेम की अपेक्षा जो प्रेमी को एक घेरे में उसी प्रकार बन्द कर देता है जिस प्रकार कोई मर्ज मरीज को एक कोठरी में डाल देता है,

हम उस प्रेम का अधिक मान करते हैं जो एक संजीवन रस के रूप में प्रेमी के सारे जीवन पथ को रमणीय और सुन्दर कर देता है, उसके सारे कर्मक्षेत्र को अपनी ज्योति से जगमगा देता है जो प्रेम जीवन की नीरसता को हटाकर उसमें सरसता ला दे, वह प्रेम धन्य है। जीवन के प्रति अनुराग, कर्म पर बल और स्वदेश के प्रति प्रेम इन बातों को यदि एक साथ मिलाकर देखें तो हमें निबंध के उद्देश्य को समझने में कठिनाई नहीं होगी। लोभ और प्रीति के मनोभावों द्वारा वे जीवन और जगत् के प्रति एक सकारात्मक और विवेकपूर्ण दृष्टिपूर्ण विकसित करना चाहते हैं।

ऐसा दृष्टिकोण जो इन मनोभावों को असंयमित न होने दे और जो लोगों को कर्म की ओर प्रेरित करे। मनोभावों की जीवन में अहम् भूमिका होती है, लेकिन उनमें सन्तुलन भी होना जरूरी है। इस निबंध में शुक्लजी इस बात को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, “पर किसी मनोविकास की उचित सीमा का अतिक्रमण प्रायः वहाँ समझा जाता है जहाँ और मनोवृत्तियाँ दब जाती हैं या उनके लिए बहुत कम स्थान रह जाता है।” इस दृष्टि से विचार करने पर हम पाते हैं कि शुक्लजी की दृष्टि में सभी मनोविकारों की जीवन में थोड़ी-बहुत सकारात्मक भूमिका जरूर होती है। प्रीति को तो आमतौर पर सकारात्मक माना ही जाता है, लेकिन लोभ भी जीवन में अच्छी भूमिका निभा सकता है। यही नहीं लोभ का सकारात्मक पक्ष ही उसे प्रेम के रूप में परिणत करता है।

शुक्लजी का यह मानना है कि जीवन और जगत के प्रति हमारे मन में किसी तरह का आकर्षण नहीं होगा तो हममें स्वदेश के प्रति भी प्रेम जागृत नहीं होगा। प्रकृति के प्रति प्रेम, स्थान के प्रति प्रेम, वस्तुओं के प्रति प्रेम और लोगों के प्रति प्रेम के होने पर ही इंसान में अपने देश के प्रति प्रेम, जागृत होता है। इसी प्रक्रिया में प्रेम मनुष्य को सक्रिय बनाता है। उसे कर्मशील बनाता है। यहाँ कर्म पर शुक्लजी का इतना बल देना इसीलिए है क्योंकि उस युग में भारत पराधीन था। देश को पराधीनता से मुक्ति तभी प्राप्त हो सकती थी, जब लोगों में न सिर्फ स्वदेश के प्रति प्रेम हो बल्कि वह प्रेम उन्हें सक्रिय भी करे।

यह सक्रियता पराधीनता के विरुद्ध जन संघर्ष में भागीदारी के रूप में ही सामने आ सकती है। जिसके पनपने को वे उपयुक्त नहीं मानते! हमारा तात्पर्य धन के प्रति लोभ से है और जिसे वे अन्य स्थान पर व्यापारी प्रवृत्ति के बढ़ने के रूप में रेखांकित करते हैं। धन के प्रति लोभ को वे न तो व्यक्ति के लिए और न समाज के लिए हितकर मानते हैं। इसी बात को वे इस रूप में भी कहते हैं कि क्षात्र धर्म का ह्रास देश और समाज के लिए अनिष्टकारी है। इस प्रकार शुक्लजी लोभ और प्रीति निबंध के माध्यम से निबंध विधा में अपनी रचनात्मक कौशलता का ही परिचय नहीं देते बल्कि औपनिवेशिक पराधीनता के तत्कालीन दौर में लोगों के मन में स्वदेश प्रेम की भावना भरते हैं और इस दिशा में प्रयत्न करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

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