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रंगभूमि' पर स्वाधीनता आंदोलन के प्रभाव को विश्लेषित कीजिए।

‘रंगभूमि प्रेमचन्द का ऐसा उपन्यास है जिसका आरंभ औद्योगीकरण बनाम ग्रामीण संस्कृति से हुआ है। इसके प्रारंभ को देखकर अनुमान कर पाना कठिन है कि इसका संबंध कुछ स्वाधीनता आंदोलन से भी हो सकता है।  वस्तुतः उपन्यास में दो धाराएँ समानान्तर बहती हैं। एक धारा तो औद्योगीकरण बनाम ग्रामीण संस्कृति के संघर्ष की धारा है, दूसरी स्वाधीनता आन्दोलन से संबंधित है। पहली धारा से सूरदास का संबंध है। दूसरी से कुंवर भरत सिंह के पुत्र विनय का उपन्यास के अन्त में दोनों धाराएँ मिल जाती है जिससे यह संघर्ष जनता बनाम अंग्रेजी सत्ता का संघर्ष जाता है।

• इसी क्रम में प्रेमचन्द ने स्वाधीनता आंदोलन के विभिन्न रूपों को उपन्यास में भी दिखाया है। जिस समय प्रेमचन्द ने रंगभूमि’ की रचना की उस समय यूँ तो गाँधीजी भारत के नेता के रूप में उमर चुके थे। 1920 को असयोग आंदोलन होकर 1922 में स्थापित भी हो चुका था लेकिन प्रेमचन्द ने अपने उपन्यास में स्वाधीनता के प्रारंभिक चरण से लेकर असहयोग के चरण को रेखांकित किया है।

प्रारंभ में जंब 1885 ए.ओ. ह्यूम के सहयोग से ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई थी, उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीति पत्र और प्रतिवेदन की थी। कांग्रेसी नेता भारत में हो रहे अन्याय को समझने तो लेकिन उनका मानना था कि यह सब सरकार के निचले तबके के कारियों के कारण है। अगर आवाज ऊपर तक पहुँचेगी तो सरकार जरूर न्याय करेगी। इसके लिए वे सरकार को उसकी नीतियों में बदलाव के लिए पत्र लिखा करते थे। प्रार्थना पत्र दिया करते थे और विभिन्न मुद्दे उठाकर सरकार के आगे अन्याय की गुहार लगाते थे लेकिन औपनिवेशिक सरकार ने उनकी एक न सुनी थी और न ही कोई न्याय किया।

कांग्रेस की इन नीतियों का प्रतिनिधित्व करने वाला न्याय किया। कांग्रेस की इन नीतियों का प्रतिनिधित्व करने वाला पात्र रंगभूमि’ में डॉ. गांगुली है जोकि एक सच्चा देशभक्त है लेकिन वह किसी भी संघर्ष के बनाए पत्र और प्रतिवेदन की नीति पर भरोसा करते हैं उन्हें प्रारंभिक कांग्रेसी नेताओं की तरह विश्वास है कि सरकार अच्छी है अगर उसके कानों तक बात पहुँचेगी तो वह न्याय अवश्य करेगी इसीलिए वे अंग्रेजों के द्वारा बनाई गई कौंसिलों में जोर-शोर से भाग लेते थे। कौंसिल में वे मि. क्लॉक के विरूद्ध भी आवाज उठाते हैं लेकिन वहाँ उनकी कोई सुनवाई नहीं होती अपितु उन्हें वहाँ से चले जाने के लिए कह दिया जाता है जिसके कारण उनका गोरों की सरकार के प्रति जो अच्छे’ होने का भ्रम होता है वह टूट जाता है।

डॉ. गांगुली अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं- “आप पशुबल से मुझे चुप करना चाहते हैं, इसीलिए भी आप में धर्म और न्याय का बल नहीं है। आज मेरे दिल से यह विश्वास उठ गया। जो गत चालीस वर्षों से जमा हुआ था कि गवर्नमेंट हमारे ऊपर न्याय-बल से शासन करना चाहती है। आज उस न्याय-बल की कलई खुल गई, हमारी आँखों से पर्दा उठ गया. और इस गवर्नमेंट को उसके नग्न, आवराहीन रूप में देख रहे हैं। अब हमें स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि केवल पीसकर तेल निकालने के लिए हमारा अस्तित्व मिटाने के लिए हमारी सभ्यता और हमारे मनुष्यत्व की हत्या करने के लिए हमारे ऊपर राज्य किया जा रहा है।”

वस्तुतः यह निष्कर्ष डॉ. गांगुली के माध्यम से प्रेमचन्द का ही है। वे स्वाधीनता आंदोलन के इस रूप को नकार कर अपनी असहमति व्यक्त करते हैं और लोगों को समझाना चाहते हैं कि इस नीति से काम नहीं चलने वाला। कांग्रेस की पत्र और प्रतिवेदन की नीतियों के चलते कांग्रेस के इस समय के नेताओं को उदारवादी कहा जाता था। उदारवाद की असफलता के चलते स्वाधीनता आंदोलन का एक और रूप सामने आया जिसे उग्रवाद कहा जाता था। इसमें वे लोग थे जो कांग्रेस की इस नीति का प्रतिकार कर आंदोलन को आक्रामक रूप देना चाहते थे। घरने देने आंदोलन चलाने बहिष्कार करना आदि नीतियों का पालन करने के पक्ष में थे।

इस वर्ग का प्रतिनिधित्व भारतीय परिदृश्य में बाल पाल और लाल कर रहे थे। ‘बाल’ से ‘बालगंगाधर तिलक जिन्होनें ‘स्वराज को अपना जन्मसिद्ध अधिकार माना, ‘पाल’ से विपिन चन्द्रपाल’ और ‘लाल’ से ‘लाला लाजपत राय थे। इसी समय भारतीय परिदृश्य में एक और आंदोलन का रूप समाने आया तो आंतकवाद के नाम से विख्यात हआ। देश के देशभक्तों ने इसमें यम की नीति को प्रमुखता दी। इसका प्रतिनिधित्व शहीद भगत सिंह जैसे लोगों ने किया ‘रंगभूमि में प्रेमचन्द ने आंदोलन के रूप को भी रूपायित किया है। 

उपन्यास में इसका नेतृत्व वीरपाल सिंह करता है वह उदयपुर रियासत के अन्याय के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करता है वह राज्य के अधिकारियों की हत्या से लेकर राजकोष को लूटने तक सभी कार्य करता है। वह अपना पूरा जीवन इसी प्रकार की नीतियों से देश की सेवा करता है। हालाँकि प्रेमचन्द को देशभक्तों से गहरी सहानुभूति है और उनके प्रति सच्चा स्नेह भी है। किन्तु वे आंदोलन की इस दिशा से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उनका मानना था कि बेगुनाह लोगों की हत्या से कभी भी आजादी की प्राप्ति नहीं हो सकती। चूँकि तोप का जवाब सरकार भी तोप से ही देती थी, जिससे मारे तो बेकसूर लोग जाते थे अतएव प्रेमचन्द ऐसे देशप्रेमियों को गुमराह मानते हैं। इस प्रकार स्वाधीनता आंदोलन के इस रूप के प्रति भी असहमत होते हैं उपन्यास में स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करने वाला पात्र विनय है जबकि जमींदार कुंवर भरत सिंह और रानी जाहनवी का पुत्र है। विनय सेवा समिति का संचालक है। सेवा समिति का मुख्य कार्य संरचनात्मक कार्य करना है। 

यथा- जहाँ कोई विपदा हो, मैले त्योहार हो, वहाँ लोगों की मदद करना। लोगों को , आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाना आदि। सेवा समिति के कार्यक्षेत्रों में गाँधी के संरचनात्मक कार्यों की झलक मिलती है जोकि उस युग में स्वाधीनता आंदोलन का ही अंग था। लोगों को जागरूक बनाया जाता था जिससे कि ये सक्रिय रूप से आंदोलन में भागीदारी निभायें विनय भी इसी तरह से कार्य कर रहा था। डॉ. गांगुली, सोफिया, प्रभुसेवक आदि उसके सहायक बनकर आते हैं और स्वाधीनता आंदोलन के इस रूप को और भी मुखर बनाते हैं।

यह सेवा समिति सत्ता की आँख की किरकिरी बनती जाती है लेकिन ये अपना कार्य करते हैं। समाज की सेवा के साथ-साथ लोगों को जागरूक बनाने में ये कोई कसर नहीं उठा रखते। प्रेमचन्द स्वाधीनता आंदोलन के इस पक्ष के साथ सहमत दिखाई देता है क्योंकि इससे लोगों में जागृति आती है। वह अपने कार्य स्वयं करने के लिए तत्पर होते हैं वे अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध एकजुट होना सीखते हैं। इस प्रकार वे संरचनात्मक कार्यक्रमों को स्वाधीनता |

• आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। इन सबसे बढ़कर ‘रंगभूमि’ उपन्यास में स्वाधीनता-अभिलन को प्रगति देने काल गाँधीजी के असहयोग, आंदोलन का स्पष्ट चित्रण हुआ है। हालांकि सूरदास औरमि, जॉनसेवक के बीच संघर्ष की शुरुआत निहायत ही व्यक्तिगत कारणों से होती है। मि. जॉनसेवक सिगरेट का कारखाना लगाने के लिए जमीन खरीदना चाहता है। सूरदास परंपरागत नैतिक पाण्डेपुर बस्ती के सभी लोगों को पूँजीवादी चातुर्य से अपने पक्ष में करने में सफल हो जाता है

लेकिन सूरवास, ऊँचा भिरखारी अकेले संघर्ष करने का निर्णय लेता है। वह हार जाता है, सत्ता के हस्तक्षेप से जमीन उसके हाथ से चली जाती है। मामला तब तूल पकड़ना है, जब पाण्डेपुर बस्ती को खाली करवाने की बारी आती है। मि. जॉनसेवक औपनिवेशिक सत्ता को अपना हथियार बनाकर उसकी आड़ में खड़ा हो जाता है। सूदास के सामने अब सरकार होती है। सूरदास संघर्ष के लिए तत्पर है वह अपना झोंपड़ा खाली नहीं करने का निर्णय लेता है नगर के सभी लोग, सेवा समिति के लोग, विनय, सोफिया, प्रभुसेवक, इन्दु आदि सूरवास के पक्ष में हैं। 

जनता सूरदास के पक्ष में है इस प्रकार संघर्ष आम जनता व सरकार का हो जाता है। सूरदास के व्यक्तित्व के प्रभाव में सरकार के सिपाही सरकार के साथ सहयोग करने से इंकार कर देते हैं। गोली चलाने से मना कर देते हैं। राजा साहब और ब्राउन दोनों खड़े देखते रह जाते हैं जिसे लेखक ने इन शब्दों में व्यक्त किया हैउनकी आँखों के सामने एक ऐसी घटना घटित हो रही थी, जो पुलिस के इतिहास में एक भूतन युग की सूचना दे रही थी, जो परंपरा के विरूद्ध मानव प्रकृति के विरुद्ध नीति के विरूद्ध थी। सरकार के वे पुराने सेवक, जिनमें से कितनों ही ने अपने जीवन का अधिकांश समय प्रजा का दमन करने ही में । व्यतीत किया था, यो अकड़ते हुए चले जायें अपना सर्वस्व यहाँ तक कि प्राणों को भी समर्पित करने को तैयार हो जाएँ।”

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