संदर्भ : यह गद्यांश रामचंद्र शुक्ल के निबंध ‘लोभ और प्रीति से लिया गया है। इस निबंध में शुक्ल जी ने ‘लोभ और प्रीति के मनोभावों का बारीकी से विश्लेषण किया है। किसी वस्तु के प्रति लगाव कब लोभ में परिणत हो जाता है, इसकी व्याख्या यहाँ की गई है।
व्याख्या : शुक्ल जी कहते हैं कि किसी वस्तु का हमें बहुत अच्छा लगना या उससे हमें सुख या प्रसन्नता प्राप्त होना ही उसके प्रति हमारे लोभ को प्रमाणित नहीं करता था। केवल किसी वस्तु का पाना और उससे आनंद मिलना हमारी उसके प्रति लोभ की अभिव्यक्ति नहीं है। लोभ तब होता है, जब हमारे हृदय में उस वस्तु के प्रति गहरी आसंक्ति हो, लगाव हो। हमारे हृदय में यह इच्छा उत्पन्न हो कि वह वस्तु हमें प्राप्त हो, हमेशा हमारे ही पास रहे, कभी हमसे दूर न हो और वह कभी भी नष्ट न हो तो उस वस्तु के प्रति ऐसी भावना हमारे ‘लोभ’ का कारण होगी ।
किसी को पाने की अपनाने की इच्छा ‘लोभ और प्रीति’ दोनों का ही आवश्यक अंग है। शुक्ल जी आगे इस बिन्दु को व्याख्यायित करते हुए कहते हैं कि यदि किसी को कोई बहुत अच्छा लगता है या उसे आता है और प्रिय लगता है तो कहा जाएगा कि वह उसे ‘चाहता’ है। इसके दो अर्थ हैं- पहला यह कि वह उसे ‘प्रेम’ करता है और दूसरा यह कि वह उसे चाहने की कामना या इच्छा रखता है। लेखक के अनुसार यही चाहना ‘लोभ और प्रीति है।
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