आगरा मुगलकालीन नगरों में एक प्रसिद्ध नगर था। 1506 ई. में सिकन्दर लोदी ने राजपूतों ओर मेवातियों के आक्रमण से सुरक्षा के लिए दिल्ली को छोड़कर आगरा को अपनी राजधानी बनाया और यहां एक किले का भी निर्माण करवाया। आगरा 100 वर्षों से अधिक समय मुगल सम्राटों की राजधानी रहा। इस बीच केवल 15 वर्षों के लिए फतेहपुर-सीकरी अकबर की राजधानी रही। 1648 ई. में शाहजहाँ ने अपनी राजधानी शाहजहानाबाद में स्थापित की। समय के साथ आगरा उत्तरी भारत के प्रमुख व्यावसायिक केन्द्र के रूप में उभरने लगा। आगरा होकर नदी मार्ग बहुत महत्त्वपूर्ण था। पेल्मा उल्लेख करता है कि असंख्य व्यापारिक वस्तुएं इस नदी मार्ग से आगरा-सीकरी से भेजी और लाई जाती थीं। शहर का जीवन व्यापारियों, महाजनों और सर्राफों के गतिविधियों का केन्द्र बन गया।
यूरोपियों के लिए सबसे प्रतिष्ठित वस्तु नील थी। 1543 में सिर्फ डचों ने ही आगरा से 7000 मन नील की मांग की। नदियों के किनारे अनेक व्यापारिक घाट बने थे, जिसमें हाथीघाट प्रसिद्ध था। आगरा बाबर की भी राजधानी रही। हुमायूँ का राज्याभिषेक आगरा की जामा मस्जिद में हुआ था और ऐसा कहा जाता है कि उसने एक महल, एक उद्यान और मस्जिद का निर्माण करवाया। अकबर ने भी एक विशाल किला बनवाया। इस किले में अनेक संरचनाओं का निर्माण करवाया गया। शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया ताजमहल इस शहर की सबसे खूबसूरत इमारत है। आगरे का लाल किला यमुना नदी के पश्चिमी तट पर ऊपरी भूमि पर स्थित था। इसकी ऊंची दीवारें, प्रमुख द्वार, बुर्ज और किले की दीवार चारों ओर खाई से घिरी हुई थी।
इस किले में उत्कृष्ट महल, हरम उद्यान, चौक और मस्जिद थे। किले के सामने नक्खास था। इसके बाद किले के बाहर खुर्रम, मान सिंह आदि के आवास थे। इस शहर की कोई पूर्ण निर्धारित योजना नहीं थी। आगरा एक विस्तृत शहर था। फादर मॉन्सरैट ने इसे 4 मील लम्बा और 2 मील चौड़ा बताया। यहां तक कि मानुकी ने इसे 24 मील लम्बा बताया है। यहां की आबादी भी बहुत घनी थी। आगरा शहर के बाहर की बड़ी हवेलियों और महलों के कारण यूरोपियों द्वारा सराहा गया है। आगरा शहर को साधारण, परंतु कुशल जल निकासी प्रणाली के साथ विकसित किया गया था, जिसका श्रेय अकबर को दिया जाता है। पूरे वर्ष जल की उपलब्धता के लिए कई हौजों का निर्माण किया गया था। इसके साथ अनेक कुएं और बावलियां थीं।
आगरा एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र भी था, इसलिए वहां अनेक सरायें बनाई गई थीं। सराय में आश्रय, भोजन व्यवस्था के साथ सामान भण्डारण व्यवस्था थी। उद्यान शहरी परिदृश्य के प्रमुख स्थल माने जाते थे। एब्बा कॉक के अनुसार मुगलों का शहर आगरा मुख्यत: उद्यानों का शहर था। सभी मुगल सम्राटों ने उद्यान बनवाये थे। शाही संरचनाओं के अलावा निर्माण के क्षेत्र में कुलीन और अमीर वर्ग भी निर्माण कार्य में शामिल था। इस शहर की एक अन्य विशेषता धर्म या जाति के आधार पर कोई भौतिक या स्थानिक अलगाव नहीं था। पेल्सर्ट के अनुसार संपूर्ण शहर के घर एक-दूसरे के निकट बने हुए थे। हिन्दू व मुसलमान और गरीब-अमीर सभी समान भाव से रह रहे थे।
फतेहपुर सीकरी
फतेहपुर सीकरी शहर का निर्माण अकबर ने करवाया। आर.नाथन का कहना है कि यह अकबर का सिर्फ आवासीय मुख्यालय था और 1571 में अकबर आगरा में राजधानी का दर्जा हटाए बगैर यहां आ गया था। नदीम रिजावी के अनुसार यह अकबर की राजधानी और आधिकारिक शहर था। यहाँ शहर घराने के लोग, अमीर और नौकरशाहों के आवास थे। अकबर से पहले सीकरी यहां रहने वाले सीकरवार राजपूतों के नाम पर सीकरी नाम पड़ा। बाबर ने 1527 ई. इसको खानवा युद्ध के बाद जीता था और कई निर्माण कार्य करवाया
अकबर की सीकरी पेटूस्सिओली का कहना है कि सीकरी एक योजनाबद्ध शहर था। अन्य इसे ऐसा नहीं मानते। कंधारी के अनुसार इसका निर्माण तीन प्रमुख चरणों में हुआ
(i) 1571 में (ii) 1573-74 में (iii) 1576-77 में
1580 तक पूरे महल का निर्माण कर लिया गया। महल परिसर की योजना पहले ही बना ली गई थी। पानी की आपूर्ति करने के लिए एक विशाल झील बनाई गयी थी। मुख्य रिज पर शहर बनाए गए, जबकि रिज के नीचे के किनारे सामान्य लोगों के लिए आवंटित किए गए थे और अमीरों को रहने के लिए यमुना के किनारे स्थान दिया गया। शहर में आठ दरवाजे थे। रिज में तीन प्रमुख परिसर शामिल थे पवित्र इमारतें, शाही महल और आम लोगों के घर। ) महल-ए-इलाही अकबर का कार्यात्मक और आनुष्ठानिक परिसर था। बैठकखाने में अकबर संगीतकारों और कवियों आदि से मिला करता था।
शाही कुतुबखाना शाही पुस्तकालय के रूप में कार्य करता था। पूरा सीकरी शहर ग्रिड योजना पर आधारित था, जिसे चहारबाग पद्धति पर विकसित किया गया सीकरी में पांच अकबरी बाजार और चार सरायें थीं। मुख्य बाजार क्षेत्र और वाणिज्यिक क्षेत्र शहर की दीवारों के भीतर पूर्व दिशा की ओर स्थित था। औद्योगिक क्षेत्र और कारीगरों का आवास शाही आवासों से दूर था। जोगीपुरा और वेश्यालय (शैतानपुरा) भी शहर की दीवारों के बाहर बसे हुए थे। किले का मुख्य द्वार हाथी पोल था, जो 800 मीटर लंबी पटरीनुमा सड़क थी, जिसके दोनों ओर दुकानें थीं और आधा रास्ता चहारसुक पर जाकर खत्म होता था।
फतेहपुर सीकरी और देशज परम्पराएं
सीकरी में स्थानीय और इस्लामी परम्पराओं का अद्भुत मिश्रण था। अकबर और उसके कारीगरों ने सीकरी के निर्माण के लिए कलात्मक नवीनताओं के साथ स्थानीय और स्वदेशी परम्पराओं से गहन रूप ग्रहण किया, जो अकबर के कॉस्मोपॉलिटन दृष्टिकोण और उसके उदारवादी व्यक्तित्व को दर्शाता है। अधिकांश इमारतों के मुख्य द्वार को शिल्पशास्त्र के अनुसार सबसे अनुकूल दिशाओं- उत्तर और पूर्व में रखा गया था। ज्योतिष शास्त्र और खगोल शास्त्र के शुभ और अशुभ प्रभावों का समान रूप से निर्माण में ध्यान रखा गया।
फतेहपुर सीकरी की एक अन्य विशेषता मुगल शिविरों की धारणा से प्रेरित होना था। इमारतों में बड़े पैमाने पर पत्थरों का प्रयोग किया गया। शिविर तथा नगर दोनों पब्लिक से प्राइवेट क्षेत्र की दिशा में पदानक्रम में योजनाबद्ध थे। सीकरी निर्माण में कई प्रकार के स्तम्भ का प्रयोग किया गया। मेहराब का इस्तेमाल केवल उन पवित्र परिसरों में किया गया, जो अधिकतर आलंकारिक तौर पर बिना प्रमुख डाट पत्थर के इस्तेमाल किए जाते थे। झरोखे की खिड़कियां और छतरियां अन्य देशज शैली थी, जिसका सीकरी में बड़े पैमाने पर प्रयोग किया गया। प्रायः सभी मुगल सम्राटों ने शहरी निर्माण के लिए उद्यान बनवाया।
शाहजहानाबाद
शाहजहानाबाद दिल्ली में मुगलों का प्राचीन शहर था। दिल्ली की एक भौगोलिक श्रेष्ठता थी। यह यमुना के तट पर अरावली की पहाड़ियों में मध्य जलवायु और घने जंगल के साथ एक सुरम्य परिदृश्य प्रदान करता है। आगरा की अपेक्षा यह विस्तृत क्षेत्र था। यहां धार्मिक संतों का भी निवास था। 1639 में शाहजहाँ ने अपनी राजधानी शाहजहानाबाद स्थानान्तरित करने का निर्णय किया। आगरा में जलवायु प्रतिकूल और पानी की कमी के कारण राजधानी को बदलना पड़ा। नई राजधानी के लिए वह स्थान चुना गया, जो नूरपुर और फिरोजशाह कोटला के मध्य था। शहर दीवारों से घिरा था, जो प्रारम्भ में मिट्टी से बना था। आगे चलकर शाहजहाँ ने शासन काल के 26वें वर्ष में पत्थर और मोर्टार की दीवार बनवायी गई, जो कश्मीरी गेट से शुरू होकर मोरी गेट पर खत्म होती थी, जिसमें 11 विशाल द्वार थे।
इस किले में अनेक सुंदर इमारतें थीं; जैसे नक्कारखाना, दीवान-ए-आम, रंगमहल और शीशमहल। किले के चारों ओर 10 गज गहरी और 20 गज चौड़ी खाई थी। किले की सुरक्षा के लिए अनेक प्रकार के सैनिक थे। इसके अलाबा किला नदी की ओर उद्यानों से घिरा था। किले के आसपास एक बड़ी संरचना जामा मस्जिद और अन्य मस्जिदें थीं। शाहजहानाबाद शहर की योजना इंडो इस्लमिक विचारों से प्रभावित थी। इस शहर की योजना ‘मनसारा’ नामक शिल्पशास्त्र से प्रभावित थी। यहां महल और किला बनाया गया था।महलकिला का मंह पश्चिम में मक्का की ओर था।
शाहजहानाबाद में सुन्दर बाजार, राजकुमारों एवं कुलीन अमीरों की हवेलियां थीं। सालेह कांबो का कहना है कि शहरों में हबली के अलावा हिन्दू और आर्मेनियन व्यवसायियों के घर 6-7 मंजिल ऊंचे थे। शहर में यात्रियों के लिए शानदार सरायें थीं; जैसे बेगम, सराय, जहाँआरा की सराय आदि। शहर की दो प्रमुख सड़कें थीं। एक लाहौरी गेट के फतेहपुरी मजिस्द तक और दूसरी लाहौरी गेट के अकबराबादी गेट तक आती थी। नहर-ए-बहिस्ता सड़क के बीच से गुजरती थी, जिसमें पेड़ और मेहराबहार खुले स्थान थे। शहर में पानी की आपूर्ति नहर-ए-बहिस्ता के द्वारा प्रदान की गई थी। शहर के कई उद्यान थे; जैसे करोल उद्यान, शालीमार उद्यान इसमें फलों की दुर्लभ किस्मों के पेड़ थे। उपनगरीय क्षेत्रों में शाही शिकारगाह के मैदान और स्थल फैले हुए थे।
शाहजहाँ की शिकारगाह नांगलोई जेल में थी, जिसमें एक शिकारगाह, एक हस्तसाल और एक पोलखाना था। कश्मीरी गेट के पास कुदसिया बेगम ने कुदसिया उद्यान, एक महल और एक मस्जिद बनवायी। ये उपनगर शहर के मुख्य मार्ग थे और प्रमुख व्यापारिक केन्द्र और आपूर्ति के मुख्य केन्द्र थे। धार्मिक गतिविधियों के भी अनेक केन्द्र थे। शाहजहानाबाद के उत्तर में सब्जी मंडी और इसके पास घोड़ों का बाजार (नक्खास) था। दिल्ली में निर्यातक केन्द्र भी थे। इस शहर में कई प्रकार के आध्यात्मिक स्थल थे; जैसे खानकाह, दरगाह और मजार आदि। शेख निजामुद्दीन औलिया की दरगाह सूफी गतिविधि का मुख्य केन्द्र थी। शाहजहानाबाद को केवल राजधानी का दर्जा हासिल नहीं था, बल्कि यह बड़ा व्यापारिक केन्द्र था। सभी दरवाजों पर एक बाजार होता था। दूसरे देशों से भी लोग यहां पढ़ने आते थे। शहर की आबादी बहुत घनी था। सम्राट की उपस्थिति से आबादी अधिक बढ़ जाती थी।
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