कुबेरनाथ राय का यह निबंध कहानी और निबंध का मिश्रण है। कल्पना और विचार का समन्वय है। तथ्य और वायवीयता का मिला-जुला रूप है। इस निबंध के प्रारंभ में मेघ का आगमन होता है। यह मेघ कामरूपी यायावर मेघ है। यह मेघ ही पाठकों को मणिपुर के संबंध में जानकारी देता है। कुछ कहानी कहता है, कुछ संस्मरण सुनाता है। कुछ इतिहास, मिथक और भूगोल में घुमाता है। इतना तो स्पष्ट है कि मेघ धरती को, मणिपुर को, मणिपुर के इतिहास-भूगोल को ऊपर से उड़ता हुआ देखता है। वह स्वयं भी पल-पल परिवर्तित होता रहता है।
निबंध जहाँ कहानी का रूप धारण करता है, वहाँ हमारे सामने दो पात्र आते हैं- एक मेघ, जो कहानी कहता है और दूसरा काबुई कन्या, जिसका नामकरण मेघ दामिनी के रूप में करता है “मैं क्या हूँ, मैं कह नहीं सकता”, इस अनिश्चयात्मक वाक्य से निबंध का प्रारम्भ होता है। वह बताता है कि इस नीले आकाश में वह निरंतर अपनी आकृति बदलते हुए चल रहा है अपनी ही आकृति बदलना सरल कार्य नहीं है, परन्तु गुप्तचरों की तरह मेघ यह काम आसानी से कर लेता है।
“कभी डोर कटी पतंग जैसी कभी रुई के छूह या पर्वत शिखर जैसी, कभी पूँछ कटे-सिंह जैसी तो कभी हाथी-ऊँट जैसी तरह-तरह की आकृति मेघ बना लेता है। वह कहीं का कहीं चल देता है। अभी वह उज्जैन में महाकाल की आरती देख रहा था, फिर वह घूमता हुआ मणिपुर पहुँच जाता है। यहाँ पर नदी के जल में अपना मुँह धोती हुई काबुई कन्या दिखाई देती है। आसमान में बादल हैं। नीचे नदी के जल में मुँह धोती हुई उस काबुई कन्या का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। थोड़ी देर में मेघ और प्रतिबिंब मिल जाते हैं और तब वह मेघ मानुष तन धारण करके नीचे उतर जाता है। यहाँ से ये दोनों पात्र साथ-साथ रहते हैं।
‘काबुई मणिपुर की उस जाति की कन्या है जो चारणों और भाटों की तरह गीतों और कथाओं को अपने कण्ठ में बसा लेती है। उसके सौन्दर्य पर मुग्ध मेघ कहता है कि उसकी “अंग कांति शुद्ध पिघले स्वर्ण की तरह थी, जिसका रूप तीक्ष्ण तलवार जैसा तरंगित था, जिसकी भंगिमा काल-प्रवाह पर दृष्टि शासन करने वाली रानियों जैसी थी।’ ऐसी अद्भुत-अपूर्व-काल्पनिक काबुई कन्या बादल के साथ है। अब “मैं उसी के साथ चल रहा हूँ अगरु वनों की शांत श्यामल छाया में। शाखाओं के अग्रभाग जड़ीभूत हो गए है और उनसे काला गुरु मह-मह फूट रहा है। इसी वृक्ष की छालों पर प्राचीन मणिपुरी पुराण लिखे गए हैं
वह मणिपुर के “अगरुवनों, चन्दन वनों में ईश्वर के गुप्तचर की तरह भटक रहा है। जहाँ उसकी भेंट उस कन्या से होती है, जिस कन्या के “चेहरे को सन्ध्या का आलोक और अधिक मनोरम” बना रहा था। शायद इसी कारण मणिपुर में इरा आलोक को ‘कन्या आलोक’ कहते हैं। इरा काबुई कन्या को वह नया नाग देता है-‘दागिनी । अब “गेघ और दागिनी सारी रात भटकते रहे। गणिपुर उपत्यका के अगरुवन, चंदनवन, देवदारु वन के चीच।” यह दामिनी मेघ को मणिपुर के मिथकों की जानकारी देती है। उसके इतिहास को नए ढंग से प्रस्तुत करती है। निबंध में लेखक इसी के हवाले से बहुत सी विश्वरानीय और अविश्वसनीय बातें पाठकों को बताते चलते हैं।
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