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हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध साहित्य

 द्विवेदी जी के सारे निबंध चिंतन के केंद्र में मनुष्य है । उनकी दृष्टि में मानव समाज को सुन्दर बनाने की साधना ही साहित्य’ है । उनके निबंध इस कसौटी पर पूरे ही नहीं उतरते अपितु इस संबंध में आदर्श रूप भी स्थापित करते हैं । निबंधों में समूचे मानव मूल्यों को स्थान एवं प्रवेश देने का प्रयास किया गया है। अपने निबंध साहित्य में उन्होंने प्राचीनकाल के अप्रासंगिक एवं निरर्थक हो चुके मूल्यों पर जोर दिया है।विचार एवं व्यक्तित्व का जैसा सहभाव दविवेदी जी के निबंध लेखन में दृष्टिगोचर होता है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है । मस्ती और फक्कड़पन अनेक निबंधों में मिलता  ही है चाहे निबंध का विषय जो भी हो ।

विरोधी विचारधाराओं का समावेश उनके चिंतन और लेखन की विशेषता है-“आदर्शवाद के धरातल पर विरोधी विचारधाराओं, परम्परा तथा प्रयोग, संस्कृति तथा सभ्यता, समाज तथा व्यक्ति, धर्म तथा विज्ञान, मानववाद तथा मानवतावाद, गाँधी तथा मार्स, प्राचीन तथा नवीन जीवन बोध में सामाजस्य एवं समन्वय स्थापित कर रखा है द्विवेदी जी ने विविध विषयों, विचारों पर विभिन्न कोणों, शैलियों से लिख कर हिंदी निबंध-विधा को समृद्ध एवं पुष्ट और परिपक्व किया है । द्विवेदी जी के निबंधों में भारतीय संस्कृति के प्रति अनन्य स्नेह और संपृक्ति दिखाई देती है । उनके निबंध भारतीय संस्कृति के पर्याय हैं ।

इनमें मानव प्रेम, देश प्रेम, अध्यात्मिकता, उदारता, समर्पण-भावना, कर्तव्य-भावना, मानसिक संयम, असीम श्रद्धा और अगाध विश्वास आदि तत्व विदयमान हैं । इनका कदाचित ही ऐसा कोई निबंध हो जिसके केंद्र में भारतीय संस्कृति एवं मानव की बात न करते हों”मनुष्य की मनुष्यता यही है कि वह दुःख-सुख को सहानुभूति के साथ देखता है । यह आत्म निर्मित्त बंधन ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है । अहिंसा, सत्य और अक्रोधमूलक धर्म का मूल उत्स यही है ।” यद्यपि द्विवेदी जी के मनोविज्ञान को लेकर कहीं बात नहीं की गई है, पर मनोभावों की सूक्ष्म पकड़ होने के कारण उनके निबंध मनोविज्ञान के प्रभाव से युक्त लगते हैं । समीक्षक श्यामनंद किशोर इस संबंध में लिखते हैं- “साहित्य सृष्ठा दविवेदी जी के मनोविश्लेषण के लिए उनका निबंध साहित्य अत्यधिक उपयुक्त है । प्रसंग गर्भत्व विवेदी जी के निबंधों को वृहतर आयाम प्रदान करता है ।

प्राचीन काल के अनेक प्रसंग और श्लोक, अर्वाचीन साहित्य के अनेक विवरण उनके निबंधों को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान करते हैं । वे किसी सीधे-साधे शब्द या वाक्य को इतने निश्छल ढंग से निबंध में प्रयुक्त करते हैं कि उससे अर्थवत्ता निःसृत हो जाती है । चिरपरिचित शब्दों के अछूते प्रयोग द्विवेदी जी की लोक-संस्कृति से भिन्न है ।” द्विवेदी जी की मनोवैज्ञानिक सी सूक्ष्म दृष्टि, विषयविवेचन, भाषा, शैली सभी अदभुत और विलक्षण है । अपनी सहज आत्मीयता एवं विनोद-प्रियता के कारण । पाठकों से उनका संवाद शीघ्र ही स्थापित हो जाता है । वक्तृव्य प्रधान शैली के कारण निबंधों में कथात्मकता, रक्षात्मकता और रोचकता की वृद्धि होती है ।

उनके निबंध सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ ज्ञान की असंख्य आलोक किरणों से सहज ही बौद्धिक दीप्ति प्रदान करते हैं। द्विवेदी जी ललित निबंध के प्रवर्तक माने जाते हैं ललित निबंध निबंधकला की दृष्टि से श्रेष्ठतम हैं । इनमें भावनात्मकता एवं अनुभूति की त्रिवेणी प्रवाहित होती रहती है, जो गहन संवेदना से परिपूर्ण है । इसमें भावुकता एवं सहृदयता का ज्वार-भाटा सा उठ पड़ता है ।पाण्डित्य से युक्त गवेषणात्मक निबंध लेखन के अलावा उन्होंने ललित निबंध लेखन में भी विलक्षण कौशल प्रदर्शित किया है । ललित निबंध की कोटि में प्राचीन एवं अर्वाचीन विषयों पर विभिन्न निबंध लिखे हैं । इनमें भारतीय धर्म, संस्कृति और साहित्य आदि को निरुपित किया गया है। अशोक के फूल’, ‘शिरीष के फूल’, ‘कटज’, ‘मेरी जन्म भूमि’, ‘क्या आपने मेरी रचना पढ़ी’, ‘आम किर बौरा गए’, ‘बसंत आ गया’, ‘नाखून क्यों बढ़ते है?’ आदि इसी कोटि के निबंध हैं ।

इन निबंधों में छोटी सी बात को लेकर द्विवेदी जी उनके संबंध में आदि से अंत का वर्णन बहुत ही सहजता एवं मधुरता से करते है । डॉ अर्जुन देव शर्मा के शब्दों में-“आम फिर बौरा गए, शीर्षक मात्र से ऐसा प्रतीत होता है कि मानों इन आम बौरों की शोभा से लेखक आत्मविभोर की स्थिति गृहण कर अपने शब्दों में उच्छवासित कर रहा है । “8 आचार्य द्विवेदी जी ने हिंदी निबंध साहित्य को व्यापक तथा समृद्ध बनाने का महान कार्य किया है । इनके निबंधों की एक विशेषता उनके व्यंग्य का नुकीलापन है जो इतना सूक्ष्म और सौम्य है कि चुभते हुए कष्ट भी नहीं देता । यह डॉक्टर के इंजेक्शन की भांति बारीक से बारीक सुई है ।‘संस्कृत  और साहित्य’ नामक निबंध में वे कहते हैं- “नई शिक्षा के परिचय से विश्वास भी ढीला होता जाता है । कम से कम शहरों में बसी जनता उनके अर्थहीन आचार-विचार के जंजालों से नहीं दबी है, जितने उनके ग्रामीण पूर्वज थे ।”

डॉ .प्रभाकर माचवे उनके निबंधों की दोनों विशेषताओं सहजता एवं व्यंग्य की ओर विशेष ध्यान आकर्षित करते हए इन शब्दों में संकेत करते हैं- “निबंध की शैली में वही सहजता है जैसे गपशप कर रहे हैं, बात-बार में बात निकली जा रही है | कभी कोई पुरानी स्मृति का टुकड़ा उज्ज्वल हो रहा है, कोई एक दम अनूठी एक नयी उद्भावना सामने आ रही है तथा उनके निबंधों में चुहल है, व्यंग्य है, करारी सामाजिक आलोचना है, वाग-वैदग्ध्य है, संस्मरणों का सिलसिलेवार काफिला है । सचित रत्नाकर और सुभाषित रत्न भण्डागार के असंख्य उद्धरण मणि हैं ।” आपके । निबंधों के बारे में डॉ बच्चन सिंह का कथन है- “उनके निबंध न तो गंभीरता का तेवर छोड़ते हैं और न सहजता का बाना ।”

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