एकांकी के तत्व-तत्व उन मूल पदार्थों या अंगों को कहते हैं जिससे किसी वस्तु का निर्माण होता है। एकांकी के शिल्पगत अंगों का समावेश उसके तत्वों में होता है। संस्कृत नाट्यशास्त्र में नाटक के तीन मूल तत्व माने गए हैं-वस्तु, नेता और रस। पाश्चात्य नाट्यशास्त्र के विचारकों के अनुसार नाटक के मूल तत्व की संख्या छह मानी गयी है -
(1) कथानक (2) सम्वाद (3) पात्र (4) देशकाल (5) शैली और (6) उद्देश्य
पाश्चात्य विचारकों के मत का खंडन रामगोपाल चौहान ने किया है कि नाटक के ये छह तत्व, जो आज माने जाते हैं, भ्रामक हैं। वस्तुत: नाटक के तीन तत्व हैं
(i) कथावस्तु (ii) सम्वाद और (iii) दृश्यविधान।
बाकी सभी तत्व इन तीन आधारभूत तत्वों के अन्तर्गत समाहित हो सकते हैं। नाटक मूलतः दृश्य होता है। अर्थात उसका अभिनयात्मक होना आवश्यक है, अत: इन तीनों तत्वों का आधारभूत गुण अभिनयात्मक होना चाहिए।”
उनका यह मत उचित ही जाना गया वह कहते हैं कि, “किसी भी रचना के मूल तत्व होने का गौरव वही तत्व प्राप्त कर सकते हैं, जिनकी अवहेलना रचनाकार किसी भी दशा में न कर सके और अन्य रचना विधानों से उसके पार्थक्य हो स्पष्ट कर दें।” उनके विचारों को रेखाचित्र द्वारा इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है
अन्य एकांकीकारों ने कथा में चरित्र’ चित्रण, उद्देश्य को समाविष्ट न कर उन्हें स्वतंत्र तत्व कहा है। वैसे ही सम्वाद और भाषा-शैली को भी अलग तत्व माना है। इसलिए एकांकी के मूल तत्व हैं
(क) कथानक (ख) पात्र (ग) सम्वाद (घ) उद्देश्य (ङ) देश-काल (च) भाषा-शैली और (छ) रंग-संकेत।
एकांकी के लक्षण-किसी भी विधा की अपनी विशेषता होती है। उन विशेषताओं के कारण ही उस विधा का स्वतंत्र अस्तित्व होता है। एकांकी विधा की भी कुछ विशेषताएँ हैं जिन्हें हम एकांकी के लक्षण कह सकते हैं। निम्नलिखित विशेषताएँ ही एकांकी के लक्षण हैं
(1) एकांकी में केवल एक अंक, एक घटना एवं एक परिस्थिति होनी चाहिए।
(2) एकांकी का लक्ष्य सुनिश्चित हो।
(3) कथानक में संक्षिप्तता, गति में तीव्रता, विकास में आकस्मिकता और एकाग्रता होनी चाहिए।
(4) अतिरंजकता को स्थान ना देते हुए इनमें स्वाभाविक यथार्थवादी चित्रण की अपेक्षा की जाती है।
(5) पात्रों की भरमान नहीं होती, पात्र आवश्यकता के अनुसार ही होते हैं।
(6) पात्र जीते-जागते पाणी तथा उसके समान लगने वाले ही होने चाहिए।
(7) संवाद प्रभावी और चरित्र को स्पष्ट करने वाले होने चाहिए।
(8) संकलन-त्रय और रंगमंचीय गुणों से युक्त होना चाहिए। ताकि सफल रंगमंचीय प्रयोग हो सके।
(9) कौतूहल एवं मनोरंजकता आरंभ से अंत तक बनी रहे जिससे पाठक या सामुहिक को रसानुभूति हो।
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