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भारतीय जाति-व्यवस्था के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए डॉ. आंबेडकर के विचारों का मूल्यांकन करें।

 डॉ. आंबेडकर के अनुसार हर समाज का वर्गीकरण और उप-वर्गीकरण होता है लेकिन परेशानी की बात यह है कि इस वर्गीकरण के चलते वह ऐसे साँचों में फ़िट हो जाता है कि एक-दूसरे वर्ग के लोग इसमें न अन्दर जा सकते हैं और न बाहर आ सकते हैं। यही जाति का शिकंजा है और इसे ख़त्म किए बिना कोई तरक़्क़ी नहीं हो सकती। सच्ची बात यह है कि शुरू में अन्य समाजों की तरह। हिन्दू समाज भी चार वर्गों में बँटा हुआ था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ।

यह वर्गीकरण मूल रूप से जन्म के आधार पर नहीं था, यह कर्म के आधार पर था। एक वर्ग से दूसरे वर्ग में आवाजाही थी लेकिन हज़ारों वर्षों की निहित स्वार्थों कोशिश के बाद इसे जन्म के आधार पर कर दिया गया और एक-दूसरे वर्ग में आने-जाने की रीति ख़त्म हो गई। और यही जाति की संस्था के रूप में बाद के युगों में पहचाना जाने लगा। अगर आर्थिक विकास की गति को तेज़ किया जाए और उसमें सार्थक हस्तक्षेप करके कामकाज के बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जाएँ तो जाति व्यवस्था को जिंदा रख पाना बहुत ही मुश्किल होगा। और जाति के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था का बच पाना बहुत ही मुश्किल होगा। अगर ऐसा हुआ तो जाति के विनाश के ज्योतिराव फुले, डॉ. राममनोहर लोहिया और डॉ. आंबेडकर की राजनीतिक और सामाजिक सोच और दर्शन का मकसद हासिल किया जा सकेगा।

डॉ० भीमराव अम्बेडकर एक ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने समाज में पिछड़ों, मूलनिवास और शोषितों की मूकता को आवाज दी। बचपन से ही डॉ० अम्बेडकर ने जातिवाद की आड़ में फैलाए जा रहे जहर को महसूस किया और उस जहर को समाज से उखाड़ फेंकने की सोची।  एक ऐसे समय में जब मूलनिवासी को देखते ही लोग अपवित्र हो जाने के भय से रास्ता बदल लेते थे, डॉ अम्बेडकर ने उस दौरान बैरिस्टरी पास कर तमाम आयोगों के सामने मूलनिवासी वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। वे गाँधी जी के ‘हरिजन’ शब्द से नफरत करते थे क्योंकि मूलनिवासी की स्थिति सुधारे बिना धर्म की चाशनी में उन्हें ईश्वर के बन्दे कहकर मूल समस्याओं की ओर से ध्यान मोड़ने का गाँधी जी का यह नापाक नुस्खा उन्हें कभी नहीं भाया। उन्होंने गाँधी जी के इस कदम पर सवाल भी उठाया कि- “सिर्फ अछत या शूद्र या अवर्ण ही हरिजन हुए, अन्य वर्गों के लोग हरिजन क्यों नहीं हुए? क्या अछूत हरिजन घोषित करने से अछूत नहीं रहेगा?

क्या मैला नहीं उठायेगा? क्या झाडू नहीं लगाएगा? क्या अन्य वर्ण वाले उसे गले लगा लेंगे? क्या हिन्दू समाज उसे सवर्ण मान लेगा? क्या उसे सामाजिक समता का अधिकार मिल जायेगा? हरिजन तो सभी हैं, लेकिन गाँधी ने हरिजन को भी भंगी बना डाला। क्या किसी सवर्ण ने अछूतों को हरिजन माना? सभी ने भंगी, मेहतर माना। जिस प्रकार कोई राष्ट्र अपनी स्वाधीनता खोकर धन्यवाद नहीं दे सकता, कोई नारी अपना शील भंग होने पर धन्यवाद नहीं देती फिर अछूत कैसे केवल नाम के लिए हरिजन कहलाने पर गाँधी को धन्यवाद कर सकता है। यह सोचना फरेब है कि ओस की बूंदों से” किसी की प्यास बुझ सकती है।”

वस्तुतः डॉ अम्बेडकर यह अच्छी तरह समझते थे कि जाति व्यवस्था ही भारत में सभी कुरीतियों की जड़ है एवं बिना इसके उन्मूलन के देश और समाज का सतत् विकास सम्भव नहीं। यही कारण था कि जहाँ मूलनिवासी के उद्धार का दम्भ भरने वाले तमाम लोगों का प्रथम एजेण्डा औपनिवेशिक साम्राज्यशाही के खिलाफ युद्ध रहा और उनकी मान्यता थी कि स्वतंत्रता पश्चात कानून बनाकर न केवल छुआछूत को खत्म किया जा सकता है अपितु मूलनिवासी को कानूनी तौर पर अधिकार देकर उन्हें आगे भी बढ़ाया जा सकता है पर डॉ० अम्बेडकर इन सवर्ण नेताओं की बातों पर विश्वास नहीं करते थे वरन मूलनिवासी का सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में तत्काल समचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहते थे। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप ही वर्ष 1919 के अधिनियम में पहली बार मूलनिवासी जातियों के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकारते हुये गर्वनर जनरल द्वारा केन्द्रीय धारा सभा के नामित 14 नॉन-ऑफिशियल सदस्यों में एक मूलनिवासी के नाम का भी समावेश किया गया।

इसी प्रकार सेन्ट्रल प्रॉविन्सेंज से प्रान्तीय सभाओं में भी चार मूलनिवासी को प्रतिनिधित्व दिया गया। इसे डॉ० अम्बेडकर की प्रथम जीत माना जा सकता है। डॉ० अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था कि व्यापक अर्थों में हिन्दुत्व की रक्षा तभी सम्भव है जब ब्राह्मणवाद का खात्मा कर दिया जाय, क्योंकि ब्राह्मणवाद की आड़ में ही लोकतांत्रिक मूल्यों-समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व का गला घोंटा जा रहा है। अपने एक लेख ‘हिन्दू एण्ड वाण्ट ऑफ पब्लिक कांसस’ में डॉ अमबेडकर लिखते हैं कि दूसरे देशों में जाति की वयवसथा सामाजिक और आर्थिक कसौटियों पर टिकी हुई है। गुलामी और दमन को धार्मिक आधार नहीं प्रदान किया गया है, किन्तु हिन्दू धर्म में छुआछूत के रूप में उत्पन्न गुलामी को धार्मिक स्वीकृति प्राप्त है। ऐसे में गुलामी खत्म भी हो जाये तो छुआछूत नहीं खत्म होगा। यह तभी खत्म होगा जब समग्र हिन्द्र सामाजिक व्यवस्था विश्लेषकर जाति व्यवस्था को भस्म कर दिया जाये। प्रत्येक संस्था को कोई-न-कोई धार्मिक स्वीकृति मिली हई है और इस प्रकार वह एक पवित्र व्यवस्था बन जाती है। यह स्थापित व्यवस्था मात्र इसलिए चल रही है क्योंकि उसे सवर्ण अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त है। उनका सिद्धान्त सभी को समान न्याय का वितरण नहीं है अपितु स्थापित ।

मान्यता के अनुसार न्याय वितरण है।” यही कारण था कि 1935 में नासिक में आयोजित एक सम्मलेन में डॉ0 अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को त्याग देने की घोषणा कर दी। अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि सभी धर्मों का निकट से अध्ययन करने के पश्चात हिन्दू धर्म में उनकी आस्था समाप्त हो गई।  वह धर्म, जो अपने में आस्था रखने वाले दो व्यक्तियों में भेदभाव करे तथा अपने करोड़ों समर्थकों को कुत्ते और अपराधी से बद्तर समझे, अपने ही अनुयायियों को घृणित जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर करे, वह धर्म नहीं है। धर्म तो आध्यात्मिक शक्ति है जो व्यक्ति और काल से ऊपर उठकर निरन्तर भाव से सभी पर, सभी नस्लों और देशों में शाश्वत रूप से एक जैसा रमा रहे। धर्म नियमों पर नहीं, वरन् सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिये।” यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि डॉ० अम्बेडकर ने आखिर बौद्ध धर्म ही क्यों चुना? वस्तुतः यह एक विवादित तथ्य भी रहा है कि क्या जीवन के लिए धर्म जरूरी है?

डॉ० अम्बेडकर ने धर्म को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा था। उनका मानना था कि धर्म का तात्त्विक आधार जो भी हो, नैतिक सिद्धान्त और सामाजिक व्यवहार ही उसकी सही नींव होते हैं। यद्यपि बौद्ध धर्म अपनाने से पूर्व उन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म में भी सम्भावनाओं को टटोला पर अन्ततः उन्होंने बौद्ध धर्म को ही अपनाया क्योंकि यह एक ऐसा धर्म है जो मानव को मानव के रूप में देखता है किसी जाति के खाँचे में नहीं। एक ऐसा धर्म जो धम्म अर्थात नैतिक आधारों पर अवलम्बित है न कि किन्हीं पौराणिक मान्यताओं और अन्धविश्वास पर डॉ० अम्बेडकर बौद्ध धर्म के आत्मदीपोभव’ से काफी प्रभावित थे और मूलनिवासी व अछूतों की प्रगति के लिये इसे जरूरी समझते थे। स्वयं भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं०. जवाहरलाल नेहरू ने डॉ० अम्बेडकर के निधन पश्चात उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि -“डॉ0 अम्बेडकर हमारे संविधान निर्माताओं में से एक थे। इस बात में कोई संदेह नहीं कि संविधान को बनाने में उन्होंने जितना कष्ट उठाया और ध्यान दिया उतना किसी अन्य ने नहीं दिया।

वे हिन्दू समाज के सभी दमनात्मक संकेतों के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक थे। बहुत मामलों में उनके जबरदस्त दबाव बनाने तथा मजबूत विरोध खड़ा करने से हम मजबूरन उन चीजों के प्रति जागरूक और सावधान हो जाते थे तथा सदियों से दमित वर्ग की उन्नति के लिये तैयार हो जाते थे।” यहाँ पर उपरोक्त सभी बातों को दर्शाने का तात्पर्य मात्र इतना है कि डॉ० अम्बेडकर समाज की रूढ़िवादी विचारधारा एवं ब्राह्मणवाद को कभी भी स्वीकार नहीं कर पाये और उनके विचार पुंज भी कहीं ब्राह्मणवादी व्यवस्था का समर्थन करते नजर नहीं आते। यही कारण था कि डॉ० अम्बेडकर के निधन पश्चात ब्राह्मणवादी व्यवस्था के पक्षधर नेताओं, विचारकों, साहित्यकारों और इतिहासकारों ने जानबूझकर उन्हें इस कदर भुला दिया कि जैसे वे कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं थे। इसके विपरीत द्विजवादी नेतृत्व को बढ़ा-चढ़ाकर उभारा गया, जैसे वे ईश्वर के अवतार हों। यह द्विजवादियों की मानसिक बेईमानी ही कही जायेगी।

कुछ लोगों ने तो डॉ० अम्बेडकर के साहित्य को न्यायालय में घसीटकर उसे प्रतिबंधित कराने का प्रयास भी किया। इन सब के पीछे मानसिकता यही रही कि डॉ० अम्बेडकर को भुला दिया जाय। द्विजवादियों की यह पुरानी मानसिकता है कि गाँधीवाद को जरूरत अम्बेडकर को भुला दिया जाय। द्विजवादियों की यह पुरानी मानसिकता है कि गाँधीवाद को जरूरत से ज्यादा फैलाव मिले जबकि अम्बेडकरवाद को जरूरत से ज्यादा कतर दिया जाए। मण्डल को दबाने के लिये कमण्डल (मंदिर) मुद्दा जरूरत से ज्यादा उछाल दो, जिससे कि ब्राह्मणवादियों का निहित स्वार्थ सुरक्षित रहे। यही नहीं स्वतन्त्रता पश्चात तमाम लोगों ने डॉ अम्बेडकर पर किताबें लिखकर, लेख लिखकर और विभिन्न विचार गोष्ठियों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि डॉ० अम्बेडकर एक सामान्य व्यक्ति थे और अंग्रेजों ने उनको बरगलाकर गाँधी जी के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास किया था। यही नहीं संविधान निर्माण में भी उनकी भूमिका को महत्वहीन घोषित करने का प्रयास किया जाता रहा पर 1990 दशक की राजनीति ने बहुत कुछ बदल दिया।

राजनैतिक क्षितिज पर अपने विचारों के साथ तेजी से उभरती बहुजन समाज पार्टी और भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मायावती की मुख्यमंत्री रूप में ताजपोशी ने मानो मूलनिवासी में चेतना की ज्वाला पैदा कर दी हो। कल तक बूथों पर मूलनिवासी के नाम पर लाठियों की बदौलत, फर्जी वोट डालने वाले रंगबाजों का जलवा अचानक दरकता नजर आया। बैलगाड़ियों और ट्रैक्टरों पर नीली झण्डयों के बीच मूलनिवासी पुरुष और महिलायें बूथों तथा बसपा की रैलियों में ऐसे नजर आते मानो किसी त्यौहार में भाग लेने जा रहे हों।

यह एक दिन उत्तर प्रदेश जैसे सामन्तवादी राज्य में ऐसा होता है जिस दिन कोई मूलनिवासी किसी की मजदूरी नहीं करता, किसी के खेत पर नहीं जाता। प्रतीकात्मक रूप में इस चीज का बहुत महत्व है और इसे समाज के तथाकथित ब्राह्मणवादियों ने भी गहराई से महसूस किया। ऐसा नहीं है कि इसकी काट के लिए प्रयास नहीं किये गए। अयोध्या में राम मन्दिर की आड़ में लोगों की भावनाएँ भड़काकर भाजपा द्वारा यह दर्शाया गया कि या तो आप हिन्दू हो सकते हैं या मुसलमान पर वे यह भूल जाते हैं कि यह उसी राम की बात हो रही है, जिनके रामराज्य के बारे में तुलसीदास ने लिखा है कि- ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी ॥

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