हिन्दी का दूसरा पत्र ‘बंगदूत’ का प्रकाशन 9 मई सन् 1829 को कलकत्ता में हुआ था। कलकत्ता से ही 1834 ई. में ‘प्रजामित्र’ नाम का तीसरा हिन्दी पत्र प्रकाशित हुआ। हिन्दी भाषी क्षेत्र से पहला समाचार पत्र 1844 में निकला था, इसका नाम ‘बनारस’ था और इसे राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ ने निकाला था। 1846 ई. में मौलवी नासिरूद्दीन के सम्पादकत्व में ‘मार्तण्ड’ नामक एक और पत्र प्रकाशित हुआ।
इस तरह 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में कई समाचार-पत्र प्रकाशित हुए। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में तो पत्र-पत्रिकाओं की संख्या काफी बढ़ गई। पत्र-पत्रिकाओं ने हिन्दी गद्य को विकसित और परिमार्जित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। फोर्ट विलियम कॉलेज-सन् 1800 में अंग्रेजों के प्रयास से कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई। सन् 1803 ई. में इस कॉलेज के हिन्दी-उर्दू अध्यापक जान गिलक्राइस्ट ने हिन्दी और उर्दू में पुस्तकें लिखाने का प्रयत्न किया। इन्होंने कई मुशियों की नियुक्ति की।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, “जॉन गिलक्राइस्ट प्रधान रूप से हिन्दुस्तानी या उर्दू के पक्षपाती थे, परन्तु वे जानते थे कि उस भाषा की आधारभूत भाषा हिन्दवी या हिन्दुई थी। इसी आधारभूत भाषा की जानकारी के लिए उन्होंने कुछ “भाषा मुंशियों की सहायता प्राप्त की।” भाषा मुंशियों में श्री लल्लूलालजी और पं. सदल मिश्र ने हिन्दी गद्य पुस्तकें लिखीं। मुंशी सदासुखलाल “नियाज* (1746-1824)- मुंशीजी उर्दू और फारसी के अच्छे लेखक और कवि थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार “इनकी भाषा कुछ निखरी हुई और सुव्यवस्थित है, पर तत्कालीन प्रचलित पंडिताऊ प्रयोग भी इनमें मिल जाते हैं।” ‘सुखसागर’ के अतिरिक्त ‘विष्णु पुराण’ के प्रसंगों के आधार पर आपने एक अपूर्ण ग्रंथ की भी रचना की थी।
सदासुखलाल जी की भाषा में सहजता और स्वाभाविकता है। इनकी भाषा का यह उदाहरण द्रष्टव्य है कि विद्या इस हेतु पढ़ते हैं कि तात्पर्य इसका जो सतोवृत्ति है वह प्राप्त हो और उससे निज स्वरूप में लय कीजिए। इस हेतु नहीं पढ़ते हैं कि चतुराई की बातें कहके लोगों को बहकाइए-फुसलाइए और सत्य छिपाइए, व्यभिचार कीजिए और सुरापान कीजिए और मन को, कि तमोवृत्ति से भर रहा है, निर्मल न कीजिए। मुंशी इंशाअल्ला खाँ (सन् 1756-1818)-इंशाअल्ला खाँ ने सन् 1798 और 1803 के बीच ‘उदयभान चरित या रानी केतकी की कहानी’ की रचना की थी।
कहानी लिखने का कारण स्पष्ट करते हुए मुंशीजी ने लिखा था, “एक दिन बैठे-बैठे बात अपने ध्यान में चढ़ी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिन्दवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गवारी कुछ उसके बीच में न हो। बस, भले लोग अच्छों से अच्छे आपस में बोलते-चालते हैं ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँव किसी की न हो। यह नहीं होने का।” लल्लूलाल जी (सन् 1763-1825)-फोर्ट विलियम कॉलेज से संबद्ध थे। इन्होंने भागवत के दशम स्कंध की कथा के आधार पर ‘प्रेमसागर’ की रचना की। इसकी भाषा पर ब्रजभाषा का प्रभाव है।
अरबी-फारसी के शब्द इसमें कही-कही आ गये हैं, किन्तु कोशिश इनसे बचने की है। द्विवेदी जी के शब्दों में “इस ब्रजरंजित खड़ी बोली में भी वह सहज प्रवाह नहीं है जो सदासुखलाल की भाषा में हैं।’ शुक्ल जी की दृष्टि में इसकी भाषा “नित्य व्यवहार के अनुकूल नहीं हैं।” पं. सदल मिश्र (सन् 1767-1768)-बिहार के रहने वाले थे और लल्लूलालजी की तरह फोर्ट विलियम कालेज से संबद्ध थे। इन्होंने ‘नासिकेतोपाख्यान’ की रचना की।
शुक्लजी ने लल्लूलालजी की भाषा से इनकी भाषा की तुलना करते हुए लिखा है कि “लल्लूलालजी के समान इनकी भाषा में न तो ब्रजभाषा के रूपों की वैसी भरमार है और न परम्परागत काव्य भाषा की पदावली का स्थान-स्थान पर समावेश। इनकी भाषा पर पूरबी बोली का स्पष्ट प्रभाव दिखायी देता है। आधुनिक हिन्दी गद्य का जो आभास सदासुखलाल और सदल मिश्र की भाषा में दिखायी देता है, उसी का आगे विकास हुआ है।
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