भावों और मनोविकारों पर विचार करने की शुक्लजी की अपनी विशिष्ट विवेचन और विश्लेषण पद्धति है। मूल विषय को अच्छी तरह समझा जा सकें उनमें विषय के वर्गीकरण और विश्लेषण की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है, साथ ही निबंध में वे आत्मभिव्यक्ति का समावेश करते हैं। जहाँ आवश्यकता होती है, वहाँ अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए व्यंग्य का सार्थक प्रयोग करते हैं। उनके निबंधों में समास और व्यास शैलियों का प्रयोग इसी दृष्टि से किया गया है।
शुक्लजी की भाषा टकसाली हिन्दी है, जिसमें संस्कृत, उर्दू और लोकभाषा का सहज समावेश होता है। उनके भाव और मनोविकार संबंधी निबंधों का आधार मनोविज्ञान है। किन्तु शुक्लजी निबंध में मनोविज्ञान से यथोचित सामग्री को स्थान देकर, उसका विश्लेषण लोकदृष्टि से करते हैं।वे लोकमंगल की भावना के पक्षधर है। शास्त्रीय विषय लेकर भी वे उसको व्यापक रूप में साहित्य की अवधारणाओं के माध्यम से संप्रेषित करते हैं। उनके निबंधों में शास्त्रीयता, अनुभव और व्यंग्य-विनोद का अनुपम समन्वय है। उनका शिल्प व्यास और समास शैली का समन्वय है। उनका चिंतन भारतीय अवधारणा के अनुकूल समन्वयधर्मी चिंतन है।
शुक्लजी विषय की गहराई तक पहुँचते हैं और फिर अपने लेखन को शास्त्र, अनुभव और व्यंग्य-विनोद के माध्यम से भाषा के कलेवर में प्रस्तुत करते हैं। शास्त्र उन्हें परिभाषा, वर्गीकरण और व्याख्या प्रदान करता है, अनुभव उन्हें लोकमंगल की अवधारणा प्रदान करता है और चिंतन मनन उनके निबंधों को मूल्य प्रदान करता है तथा उनकी वैयक्तिकता और व्यंग्य-विनोद उनके निबंध को ग्राह्य और सरस बनाते हैं। शुक्लजी की वैयक्तिक संस्पर्श अर्थ से इति तक निबंधों में परिव्याप्त है। लोभ और प्रीति निबंध के संदर्भ में जब हम बिन्दु पर विचार करते हैं कि उनका यह स्पर्श यदा-कदा उनके भावुक विवरणों में अथवा लोकमंगल की भावनाओं में दिखाई पड़ता है। लोकमंगल की भावनाओं के साथ वे प्रायः व्यंग्य-विनोद का आश्रय लेते हैं।
उदाहरण के लिए, देश-प्रेम को व्याख्यायित करते हुए, प्रकृति के प्रति अनुराग को अभिव्यक्त करते हैं यह बात हम पहले भी लिख चुके हैं। शुक्लजी के निबंधों में वैयक्तिक स्पर्श जहाँ एक ओर गुरु गंभीर विषय को रोचकता प्रदान करता है वहीं तयुगीन स्थितियों से आमना-सामना भी कराता है। शुक्लजी के निबंध गंभीर निबंध है और पूरी गंभीरता से उनकी सरंचना की गई है किन्तु ये शुष्क नहीं है, शुक्लजी का वैयक्तिक संस्पर्श इन निबंधों को शुष्क होने से बचाता है और रमणीयता प्रदान करता है। यह संस्पर्श भाषा को प्रवाह देता है और भावक का झकझोरता है। संभवतः ज्ञान प्राप्ति के साथ-साथ विचारों की उत्तेजना प्रदान करना इन निबंधों का लक्ष्य है और शुक्लजी के निबंध इस लक्ष्य की सिद्धि करने में समर्थ है। शुक्लजी के यहाँ व्यंग्य विनोद का प्रयोग सप्रयोजन है।
व्यंग्य विनोद से पाठक को गंभीरता के बीच एक सुखद अनुभव की प्रतीति होती है। यह सुखद प्रतीति केवल सुखद ही नहीं रहती है, यह तयुगीन दशा-दिशा को भी प्रस्तुत करती है। यह दशा-दिशा पाठक को जीवन दिशा का ज्ञान कराती है, कर्म के लिए प्रेरित करती है, एक उत्तेजना प्रदान करती है और खिलखिलाहट से भर देती है। पं. रामचन्द्र शुक्ल निबंधकार संसार की किसी भी भाषा के लिए गौरव हैं उनके निबंधों विवेचना और सर्जना का समन्वय है। आत्माभिव्यक्ति तथा व्यंग्य-विनोद इनके निबंधों को हल्का-फुल्का नहीं बनाते, वरन् पाठक का भावक की आँख में उंगली गड़ा कर सत्य का निदर्शन कराते हैं। वे रुचि भी जाग्रत करते हैं और चिंतन को भी गति प्रदान करते है। हिन्दी जगत को जो अनुदान शुक्लजी ने दिया वह अतुलनीय है।
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