हमें यह सहजतापूर्वक स्वीकारने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि किसी भी युग के साहित्य के मूल्य उसके अपने समाज की वास्तविकता से ही प्रमाणित होते हैं । यही कारण है कि साहित्य के सामाजिक मूल्य और उसकी कलात्मक व्याख्या की पूर्णता के लिए समाज की गतिविधि गायों का यथेष्ट ज्ञान अपेक्षित ही नहीं, अपितु अनिवार्य भी है। अतएव साहित्य के सत्ता, समाज, आर्थिक गतिविधियों धार्मिक विचारों और दर्शनों के साथ है। आंतरिक सम्बन्धों का लेखा-जोखा भी बहुत ही आवश्यक है । हिन्दी भाषा के प्राचीन रूप का आरम्भ अपभ्रंश साहित्य बाद से माना जाता है । यह निर्धारित करना कठिन है कि हिन्दी साहित्य का आरम्भ किस तिथि वर्ष से हुआ? अधिकांश विद्वान् इस बात से सहमत हैं कि जिस बिन्दु में अपभ्रंश के प्रभाव से सहमत होकर जिस बिन्दु पर अपभ्रंश के विद्वान् से मुक्त होकर हिन्दी साहित्य का अपना अलग रूप निश्चित हुआ, वही हिन्दी साहित्य की आरम्भिक तिथि थी।
सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि दसवीं शताब्दी के पूर्व का साहित्य अपनी भाषागत विभिन्नताओं के कारण हिन्दी साहित्य से बिल्कुल भिन्न जान पड़ता है। अतः दसवीं शताब्दी के बाद का ही साहित्य हिन्दी साहित्य के अन्तर्गत आएगा । पं० रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल का आरम्भ सं० 1050 (993) से माना है, जबकि डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे 1000 तक माना है। शुक्लजी इसकी सीमा सं० 1375 (1318) तक मानते हैं, जबकि द्विवेदीर्ज इसे 1400 ई० तक माना है। हिन्दी साहित्य के इस आरम्भिक काल को हिन्दी विद्वानों ने भी अलग-अलग नाम दिये हैं। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसे ‘बीजवपन काल’ । कहा है, जबकि पं० रामचन्द्र शुक्ल ने वीरगाथा काल, राहुल सांकृत्यायन ने सिद्ध सामन्त युग, डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल तथा रामकुमार वर्मा ने चारण काल की संज्ञा दी है।
इस काल में धर्म, नीति, शृंगार तथा वीर रस प्रधान सभी प्रकार की रचनाएँ उपलब्ध होती हैं। इस युग में भारतवर्ष पूर्णतः हिन्दू देश था। इसी काल में मुसलमानों के आक्रमण हुए थे, जिसके परिणामस्वरूप अनेक प्रकार की साहित्यिक प्रवृत्तियों का जन्म हुआ। राज्यों के आश्रित चारण कवियों ने अपने-अपने आश्रयदाताओं के परिश्रमपूर्ण चरित्रों तथा गाथाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करना आरम्भ किया। मुसलमानों के आक्रमण चरित्रों तथा गाथाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करना आरम्भ किया। मुसलमानों के आक्रमण चरित्रों तथा गाथाओं का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करना आरम्भ किया। मुसलमानों के आक्रमण के परिणामस्वरूप जनता का अधिकांश जीवन युद्धमय वातावरण के बीच ही बीतता था । आदिकाल का साहित्य अधिकांशतया वीररसात्मक काव्यों का युग है, जिसके परिणाम ‘रासो ग्रन्थ’ हैं। इतिहास बताता है कि हिन्दी साहित्य है के आदिकाल के समय उत्तर भारत की दशा अत्यंत दयनीय हो गई थी ।
हिन्दी-साहित्य के इतिहास में यह एक ऐसा समय था, जब केन्द्रीय सत्ता का पतन हो चुका था। सम्राट् हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् सम्पूर्ण राष्ट्र छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो चुका था। इस युग में राजा अपने वैयक्तिक | लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए वीर योद्धाओं का प्रयोग करते थे। इस काल में सर्वाधिक साहित्य रचना राजस्थान में हुई, इस कारण साहित्य की भाषा डिंगल-पिंगल ही रही। इस युग में ऐसा साहित्य भी काफी मात्रा में लिखा गया, जिसमें अपभ्रंश भाषा का परिष्कृत रूप दिखाई पड़ता है। इस युग की मुख्य परिस्थितियां निम्नलिखित हैंराजनीतिक पृष्ठभूमि-यह युग राजनीतिक दुरावस्था, अस्त-व्यस्तता और गृहकलह का युग था। एक ओर विदेशी आक्रमण की निरन्तर चलने वाली भीषण आंधियाँ थीं, तो दूसरी ओर राजाओं एवं सामन्तों की आपसी फूट तथा शत्रुता देश को खोखला कर रही थी।
मुसलमानों ने भारतीय राजाओं की आपसी कलह का लाभ उठाया। 19वीं शताब्दी तक मुसलमान सिन्ध से आगे भारत में प्रवेश नहीं कर सके थे। 10वीं शताब्दी में गजनी के सुलतान महमूद गजनवी ने भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमान्त के राज्यों पर विजय प्राप्त की। उसने मथुरा, कन्नौज, ग्वालियर, कालिंजर को जीतकर सोमनाथ के मन्दिर की अपार धनराशि लूट ली थी। दक्षिण के चोलवंशीय राजा राजेन्द्र ने महमूद गजनवी को उखाड़ने में अन्य राजाओं को कोई सहयोग नहीं दिया। 11वीं-12वीं शती में अजमेर में चौहान, दिल्ली में तोमर तथा कन्नौज में गहउवाल राजाओं का शासन था। अजमेर के बीसलदेव चौहान ने सीमान्त उत्तर-पश्चिमी भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया था। इसी समय मोहम्मद गौरी ने भारत-विजय के सपने देखे।
उसने भारत पर कई आक्रमण किए। अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान ने गौरी को अनेक बार पराजित किया। किन्तु जब पृथ्वीराज जागरूक न रहा तथा वह राजा परमार के साथ युद्ध में उलझ गया तथा कन्नौज के राजा जयचन्द से शत्रुता रखने लगा, तो मोहम्मद गौरी ने अचानक आक्रमण करके पृथ्वीराज चौहान को पराजित कर दिया। पृथ्वीराज की पराजय के साथ ही भारत में मुस्लिम साम्राज्य की नींव पड़ गई। मोहम्मद गौरी ने अपने राज्य का विस्तार किया और धीरे-धीरे मुस्लिम साम्राज्य की पताका समस्त उत्तर भारत में फहराने लगी । आदिकाल की राजनीतिक परिस्थितियों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उस समय के राजपूत | राजा अपने छोटे-से प्रान्त को ही राष्ट्र समझते थे तथा वे उसी की रक्षा करना अपना धर्म समझते थे।
संकुचित राष्ट्रीयता के कारण मुसलमानों ने लगभग सम्पूर्ण भारत पर आधिपत्य जमा लिया था । यदि उस समय सभी राजपूत राजा मिलकर मुस्लिम आक्रमणकारियों से युद्ध करते, तो आज हमारे देश का मानचित्र कुछ और ही होता। सामाजिक पृष्ठभूमि-किसी भी देश की राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियों का उसकी सामाजिक परिस्थितियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जिस समय देश की धार्मिक एवं राजनीतिक परिस्थिति शोचनीय हो, उस समय उच्च सामाजिकता की आशा नहीं की सकती 10वीं-11वीं शती तथा इससे कुछ पहले ही भारतीय समाज वर्ण के आधार पर जातियों की कठोर व्यवस्था में जकड़ा जा चुका था। इस समय कर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जाति के आधार पर व्यक्ति को श्रेष्ठ अथवा निकृष्ट समझा जाता था। जातियों का वर्ग-भेद बढ़ता जा रहा था। समाज में छुआछूत की दुर्गन्ध बहुत अधिक मात्रा में फैल चुकी थी।
हिन्दू समाज से बहिष्कृत लोग पुनः अपना धर्म नहीं अपना सकते थे। समाज विभिन्न प्रकार की रूढ़ियों से ग्रस्त था। सामन्तों की वीरता का दंभ समाज की छाती पर , भयंकर विषधर बनकर लहराने लगा था। इस समय राजपूत वंश में स्वयंवर प्रथा प्रचलित थी। स्वयंवरों के अवसर पर वीरता और सम्मान के नाम पर अपहरण काण्ड होते थे। इसी कारण ऐसे अवसरों पर रक्त की नदियां बह जाना एक सामान्य बात थी। इस समय के राजपूत सामन्त वीर, दृढ़व्रती तथा सत्यनिष्ठ थे । वे अपने स्वामी के गौरव की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान करने में संकोच नहीं करते थे।
इस समय एक ओर तो कर्तव्यनिष्ठा एवं वीरता का अजस् प्रवाह था तथा दूसरी ओर भोग-विलास और रंगरेलियों की भरमार थी। समाज में क्षत्रियों का प्राधान्य हो चला था। अधिकांश क्षत्रियों में राष्ट्रीयता की भावना का अभाव था। इस समय की राजपूत स्त्रियों में भी वीरता तथा साहस का अभाव नहीं था। युद्ध क्षेत्र में पीठ दिखाने वाले पुरुषों को सर्वत्र अपमानित होना पड़ता था । स्त्रियां अपने पति की चिता पर जौहर करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करती थीं । राजा लोग युद्ध से लौटने पर अपनी रानियों के साथ रंगरेलियां मनाते थे। उस समय स्त्रियों को समाज में अधिक सम्मान नहीं मिलता था, बल्कि उन्हें भोग-विलास की सामग्री मात्र समझा जाता था
आर्थिक क्रिया – कलाप – आदिकालीन युग की अध्ययन-मनन के उपरान्त जब हम इसके आर्थिक क्रिया-कलाप पर दृष्टिपात करते हैं, तो हम यह पाते हैं कि इस काल का मुख्याधार कृषि ही थी। ऐसा इसलिए कि इससे ही सभी प्रकार की शासकीय व्यवस्था संचालित थी। यह लक्षितव्य है कि उस समय के पदाधिकारियों को नकद वेतन न देकर कोई न कोई उन्हें जागीर दी जाती थी। दूसरी बात यह कि किसानों की पैदावार में से आधा भाग तो राज्य का होता था । इस युग का समाज दो वर्गों में बँटा हुआ था उत्पादक |
उत्पादक वर्ग को समाज में उपेक्षा और अनादर की दृष्टि से देखा जाता था। यह इसलिए कि ये दूसरे के उत्पादन का लाभ न उठाकर स्वयं ही उत्पादन करके आत्मनिर्भर होने का निरंतर प्रयास करते थे। दूसरी ओर उपभोक्ता वर्ग उत्पादक वर्ग की गाढ़ी कमाई का लाभ उठाकर चैन की वंशी बजाया करते थे। इस प्रकार ये उच्च वर्ग से अपना सम्बन्ध रखते थे। इनकी प्रशंसा में कवि और चारण रचनाशील थे। धार्मिक स्थिति- इस युग में धर्म के क्षेत्र में अराजकता विद्यमान थी। उत्तर भारत में ब्राह्मण धर्म, बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म की प्रधानता थी । बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म में अनेक बुराइयों , का प्रवेश हो चुका था। शंकराचार्य के प्रयत्नों से बौद्ध धर्म क्षत-विक्षत हो चुका था। बौद्ध धर्म अनेक शाखाओं में बंट चुका था। वह हीनयान, महायान, वज्रयान, सहजयान, मन्त्रयान आदि विचित्र कर्मकाण्ड प्रधान सम्प्रदायों में विभक्त होकर इस देश में अन्तिम घड़ियां गिन रहा था।
बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा ने भ्रष्टाचार को बहुत अधिक बढ़ावा दिया। चमत्कार प्रदर्शन के नाम पर ये तथाकथित धार्मिक लोग भोली-भाली जनता को ठगते थे। निम्न वर्ग की स्त्रियों के साथ भोग-विलास एक साधारण-सी बात हो चुकी थी। अलौकिक शक्तियों और सिद्धियों की प्राप्ति के लिए बौद्धों के विभिन्न सम्प्रदाय गुप्त मन्त्रों का जाप, | नारी सम्भोग तथा सुरापान आदि करते थे। इस युग में धर्म की आड़ में अधर्म का पोषण हो रहा था। तन्त्र-मन्त्र द्वारा सिद्धि की इस परम्परा का जैन धर्म पर भी प्रभाव पड़ा। बौद्धों की देखादेखी वैष्णव सम्प्रदाय भी विकृति के शिकार होने लगा। पांच रात्र, शेव कापालिक कालमुख आदि सम्प्रदाय भी वाममार्ग से प्रभावित हो चुके थे। शाक्त सम्प्रदाय में तो सुरासुन्दरी के प्रति गहन आकर्षण व्याप्त हो चुका था। समाज का निम्न वर्ग कामाचारियों के चंगुल में अधिक उलझा हुआ था।
इसी काल में बौद्ध धर्म के विकृत रूप और शैव धर्म के सम्मिश्रण से नाथपंथ विकसित हुआ। इस युग में बौद्ध धर्म के पतन के कारण ब्राह्मण धर्म पुनः प्रतिष्ठित हुआ, परन्तु उसमें भी अनेक बुराइयों ने प्रवेश पा लिया था। ब्राह्मण धर्म दो भागों में विभक्त हो गया था शैव धर्म तथा वैष्णव धर्म । ब्राह्मण धर्म के पुनः प्रतिष्ठित होने से वर्ण-व्यवस्था फिर से जीवित हो उठी थी। हिन्दुओं में आचार-विचार, व्रत-पूजादि की भावना में वृद्धि हुई। हिन्दू समाज में धर्म के नाम पर आडम्बरों को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा। इस युग में ब्राह्मण अपने प्राचीन गौरव को खो बैठे थे। राजदरबार में अपने आश्रयदाता का गुणगान करने वाले कुछ ब्राह्मण आदर के पात्र समझे जाते थे।
नैष्ठिक हिन्दुओं में शिव तथा नारायण की उपासना लोकप्रिय होने लगी थी। इस युग के सिद्धनाथ साहित्य से तत्कालीन वाममार्गी सम्प्रदायों की विकृति का परिचय मिलता है। इसी समय इस्लाम धर्म भी तलवार के जोर पर पनपने लगा था, किन्तु आदिकालीन साहित्य पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ सका। मिश्रित सांस्कृतिक प्रक्रिया- यह काल राजनीतिक अराजकता एवं बाहरी आक्रमणों का युग था। इस युग में मुख्यतः मुसलमानों (महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी आदि) के आक्रमण हुए। मुसलमानों ने धीरे-धीरे हमारे देश के एक बहुत बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया। मुसलमानों के भारत में रहने से हिन्दू तथा मुस्लिम संस्कृतियों का एक-दूसरे पर प्रभाव पड़ा।
प्रारम्भ में मुसलमान भारतीय संस्कृति की ओर विशेष रूप से आकृष्ट हुए। उन्होंने संगीत, वास्तुकला, ज्योतिष, गणित तथा आयुर्वेद आदि का अध्ययन भी किया। यद्यपि मुसलमानों ने क्रूरता और अत्याचार का ही विशेष अवलम्ब लिया था, तो भी पारस्परिक आदान-प्रदान निरन्तर जारी रहा।सांस्कृतिक दृष्टि से मुसलमान हिन्दुओं पर | विजय न पा सके, बल्कि वे स्वयं भारतीय रंग में रंग गए। कुछ विद्वान् इस काल को हिन | मुसलमान संस्कृतियों का मिलन काल कहते हैं। हिन्दू-संस्कृति पर भी धीरे-धीरे मुस्लिम संस्कृति का प्रभाव दृष्टिगत होने लगा था। भारत में प्रचलित मुख्य मेलों, तीज-त्योहारों, वेश-भूषा, आहार-विहार तथा मनोरंजन आदि पर मुस्लिम संस्कृति का कुछ प्रभाव दिखाई देने लगा था। मुस्लिम राजाओं के प्रभाव से हिन्दू राजदरबारों में भी मुस्लिम कलाएं प्रवेश पाने लगी थीं।
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