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धर्म पर आधारित दर्खिम के दृष्टिकोण की जाँच कीजिए।

 समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य के रूप में प्रकार्यवाद- प्रकार्यवाद् अत्यंत प्राचीन एवं उपयोगी सिद्धांत है। समाजशास्त्र का यह विश्लेषण जीव विज्ञान एवं शरीर विज्ञान पर आधारित एक वैज्ञानिक पद्धति है, जिसमें समाज को एकजुट करने वाले कारकों का अध्ययन किया जाता है। इसके विश्लेषण के तरीकों में सर्वथा वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ स्वरूप को महत्त्व दिया जाता है, अतः यह एक वैज्ञानिक विधि है। प्रकार्यवाद समाज की व्यवस्था को बनाए रखने वाले उपागमों के अंतर्संबंधों को ध्यान में रखता है तथा समाज को एक जटिल व्यवस्था मानता है जो आंतरिक स्तर पर जटिल और व्यवस्थित होता है।

प्रकार्यवाद समाज की आंतरिक संरचना में योगदान देने वाली संस्थाओं-परिवार, धर्म, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, राजनीति आदि की क्रियाशीलता पर ध्यान देता है। अतः प्रकार्यवादी विचारकों का उद्देश्य समाज की संरचना को बनाए रखना, उसके स्थायित्व को बनाए रखना तथा एकीकरण करना था। 

दुर्खिम्वादि प्रकार्यवाद- संरचनात्मक प्रकार्यवाद को संरक्षण देने वाले इमाइल दुर्खिम ने सामाजिक एकता को बनाए रखने वाले उपागमों पर अधिक ध्यान दिया है। दुर्खिमने सामाजिक संगठन में सामाजिक तथ्यों, सामाजिक संरचनाओं, सांस्कृतिक मूल्यों तथा प्रतिमानों को महत्त्व दिया तथा समाज की उस अंतर्व्यवस्था को जानने का प्रयास किया जो उसे आपस में संबद्ध करती थी। 

इसके लिए दुर्खिमने सावयवी सुदृढ़ता तथा सामूहिक चेतना की सहायता ली। दुर्खिम की अवधारणा सामाजिक एकता के संदर्भ में कुछ विशिष्ट है। ‘वे सामूहिक चेतना’ की बात करते हैं तथा उसे ‘सामूहिक जागरूकता’ अथवा ‘सामान्य समझ’ कहते हैं।  उन्होंने टोटम की अवधारणा को बतलाते हुए टोटम द्वारा समाज के प्रकटीकरण को आरंभिक स्वरूप कहा तथा धर्म ने उस पर अपनी मुहर लगाकर उसे तर्कपूर्ण बना दिया। अत: टोटम भी एक सामूहिक प्रक्रिया है जो सामाज द्वारा स्वीकृत है।

धर्म : एक प्रकार्यात्मक परिप्रेक्ष्य-धर्म एक सामूहिक प्रक्रिया है, जिसमें आस्था और विश्वास के साथ संगठित क्रियाकलाप होता है। प्रकार्यवादियों ने धर्म को सांगठनिक रूप में देखकर ही विश्लेषित किया तथा धर्म के उसी रूप का अध्ययन प्रस्तुत किया जो सामूहिक एकीकरण में सहायक हो। अतः इन्होंने धर्म को प्रकार्यात्मक माना है जो सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ व सुनिश्चित अस्तित्व प्रदान करता है।

यह समाज को अथवा विभिन्न समाजों को विशिष्ट भावनात्मक संबंध के द्वारा आपस में जोड़ता है जो वचनबद्धता एवं विश्वास के रूप में स्थायित्व प्रदान करता है। धर्म सामूहिक चेतना है, जो केन्द्रीय मूल्य-व्यवस्था के रूप में उपस्थित है। अतः समाज का धर्म के साथ गहरा रिश्ता है।

दुर्खिम तथा धार्मिक जीवन का प्रारंभिक स्वरूप:-

दुर्खिम ने धर्म पर अध्ययन करते समय सभी समाजों के धर्म के मौलिक स्वरूप की खोज की। इनकी खोज ‘दी एलीमेन्ट्री फॉर्म ऑफ रिलीजियस लाइफ’ नामक पुस्तक में विस्तार से विवेचित है। इमाइल दुर्खिम ने अपनी खोज के लिए ऑस्ट्रेलिया की अरूण्टा जनजाति को चुना, जिसके पीछे उन जनजातियों में धार्मिक मौलिकता का सुरक्षित होना था, जिसे दुर्थीम “आज तक का ज्ञात सबसे सरल तथा सबसे प्राचीन धर्म” कहते हैं।  इस अध्ययन के अंतर्गत अरूण्टा जाति के गोत्र, टोटम आदि का समावेश है। दुर्खिमने वर्तमान में उपस्थित धर्म की अत्यधिक संवेदनशीलता और समाज पर इसके अनुषंगी प्रभाव के कारण धर्म के प्रारंभिक स्वरूप की खोज शुरू कर दी, जिसके द्वारा वर्तमान धर्म को समझा जा सकेगा।

दुर्खिम की विशेषता है कि उन्होंने पूर्व परंपरा से आ रही अध्ययन पद्धति के विपरीत प्रत्यक्ष विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में धर्म का परीक्षण | किया, जिसके पीछे धर्म का उद्देश्य धर्म के आधारभूत तत्त्वों तक पहुंचना था। इस खोज से सभी धर्म के जड़ों तक पहुंचा जा सकता है। | धर्म को सामूहिक घटना के रूप में देखते हुए दुर्खिम ने धार्मिक घटनाओं को सामूहिक माना है, व्यक्तिगत नहीं। उनका मानना है कि धर्म के अभाव में व्यक्ति और मनुष्य लम्बे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकेंगे। धर्म संबंधी कर्मकांड सामाजिक अवधारणा की अभिव्यक्ति होते हैं। दुर्खिम ने धर्म को वास्तविक तथा समाज की अभिव्यक्ति माना है तथा ऐसा कोई समाज नहीं है, जहां धर्म नहीं है। धर्म एक सामूहिक चेतना का प्रकटीकरण है, जो वैयक्तिक चेतना का संयोजन है।

दुर्खिम की धर्म की प्रत्यक्ष परिभाषा :

प्रत्यक्ष परंपरा में अपने आप को रखकर दुर्खिम ने वस्तुनिष्ठ एवं समुचित वैज्ञानिक परंपरा के अनुरूप धर्म की परिभाजा दी है। धर्म के विषय में दुर्खिम ने खोज और वैज्ञानिक दृष्टि को अत्यधिक महत्त्व दिया। कुल मिलाकर दुर्खिम जिस प्रत्यक्ष परंपरा से आते हैं उसका अर्थ अवलोकित वस्तु से है, जिनके आधार पर धर्म को स्पष्ट किया जा सके, न कि काल्पनिक रूप से परिपुष्ट करना। साथ ही यह ध्यान देने योग्य बात है कि यह प्रक्रिया वैज्ञानिकता एवं तथ्यात्मकता से परिपूर्ण है। उनकी धर्म की परिभाषा द्रष्टव्य है “धर्म पवित्र वस्तुओं से संबंधित विश्वासों तथा रिवाजों की एकीकृत व्यवस्था के रूप में है, जिसका अर्थ है वे पापपूर्ण चीजें जो अलग रखी जाती हैं तथा जो मना हैं … ये विश्वास तथा रिवाज जो एक नैतिक समुदाय से जोड़ते हैं जो उन रिवाजों को मानते हैं, जिसे गिरजाघर कहते हैं।”

इमाइल दुर्खिम ने चर्च अथवा धार्मिक स्थल को एक सामूहिक संचालक के रूप में माना, जहां नियमित रूप से विशिष्ट अनुयायी उपस्थित होते हैं।  यह एक सार्वभौमिक परिभाषा है, जिसमें दुर्खिम ने एक तो सभी धर्मों को विश्वास तथा रीति-रिवाजों की क्रियात्मक व्यवस्था के रूप में माना है तथा दूसरे धर्मों में पवित्र तथा अपवित्र संबंधी अवधारणा होती है, जो विश्व को दो वर्गों में विभक्त करती

पवित्र तथा अपवित्र:

दुर्खिम ने पवित्र तथा अपवित्र को अत्यधिक महत्त्व देते हुए इन्हीं के आधार पर धार्मिक घटना की उत्पत्ति को स्वीकारा है। दुर्खिम ने इस संदर्भ में धर्म को तीन क्रियाओं से संबद्ध माना है

(क) पवित्र-अपवित्र के बीच भेद।
(ख) आस्था के रूप में व्यवस्था
(ग) नियमादि की व्यवस्था।

दुर्खिमके अनुसार अपवित्र तथा पवित्र को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है

(i) अपवित्र उपयोगिता से संबंधित क्षेत्र में सन्निहित है, जबकि पवित्रता की संकल्पना उच्चादर्शों तथा असामान्य से जुड़ी है।

(ii) पवित्रता तथा अपवित्रता मानव द्वारा मान्य मूल्यों पर निर्भर हैं।

(iii) चूंकि यह धार्मिक जीवन का मूल है, अत: इसकी विशिष्टता सर्वमान्य होनी चाहिए।

इस प्रकार दुर्खिमने सभी धर्मों पर पवित्रता-अपवित्रता के लक्षणों के समान वितरण को स्वीकारा है, किंतु अलौकिक क्षेत्रों के संदर्भ में विश्वास अलग-अलग स्वीकृत हैं।

अत: व्यावहारिक रूप में देखा जाए तो नैतिक एवं आध्यात्मिक पक्षों को पवित्र तथा शेष जिनका धार्मिक प्रकार्य से संबंध नहीं होता, अपवित्र मानी जाएंगी। उदाहरण के रूप में मंदिर, मस्जिद या गिरजाघर के चिह्नों, यथा-त्रिशूल, ध्वज, क्रॉस, चांद-तारा, 786, ऊँ, आदि ये सभी पवित्र प्रतीक हैं। अपवित्र का सम्मान भी कम है तथा अंतर्मन में इसके प्रति संकोच भी बना रहता है। अपवित्रता सदैव पवित्रता को दूषित करने की कोशिश में रहती है।

टोटमवाद : धर्म का प्रारंभिक स्वरूप

टोटमवाद को धर्म का आरंभिक स्वरूप और धर्म का केंद्रीय बिंदु मानते हुए दुर्थीम ने टोटम संबंधी विश्वासों तथा टोटमवाद की संरचना की समाजशास्त्रीय खोज की है।

दुर्खिमके अनुसार टोटमवाद की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं

(i) टोटमवाद का गहरा संबंध सांगठनिक गोत्र व्यवस्था से है।

(ii) टोटम में सम्मिलित जन एक ही गोत्र के होते हैं जो आपसी रिश्तों को मजबूत बनाने में एवं संगठन की संकल्पना को मजबूत करने में महत्वपर्ण भमिका निभाते है।

(iiI) टोटम के माध्यम से निषिद्ध कार्य का प्रायश्चित किया जाता है, जिसके प्रति समूह जिम्मेवार होता है।

(iv) टोटम पवित्र तथा अपवित्र के अंतर की प्राथमिक इकाई है।

(v) टोटम एक विश्वास है, जिसमें रीति-रिवाजों के साथ-साथ प्रतीक चिह्नों का प्रयोग किया जाता है जो समूह को दर्शाता है।

(vi) पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों के साथ आत्मा के तादात्म्य को टोटम द्वारा फलीभूत करते हैं।

तः टोटमवाद एक धर्म है जो वस्तुओं के तीन वर्गों पर संधान करता है
(i) प्रतीक,

(ii) टोटम (पशु-पक्षी),

(iii) गोत्र। 

ये पवित्र माने जाते हैं।

गोत्र , टोटम तथा सृष्टिशास्त्र- दुर्थीम समाज को व्यवस्थित तथा एकीकृत करने में विश्वास रखते थे। धर्म विचारों की एक व्यवस्थित इकाई है। ये सिद्धांत ऑस्ट्रेलिया की जनजातियों पर किए गए शोध के परिणाम हैं।

धर्म में टोटम को निर्धारक मानते हुए दुर्खिमने टोटम को वर्गीकरण की प्रारंभिक पद्धति माना है जो प्रकृति के विभाजन का भी मुख्य आधार है। गोत्र इसी टोटम की एक सामूहिक व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत एक टोटम होता है। टोटमवाद को प्रकृति को भी वर्गों में विभाजित करने का श्रेय जाता है, यथा-सूर्य, चंद्रमा, तारे, पृथ्वी आदि को गोत्र में बांटता है। एक गोत्र में समान टोटम एवं गुण होते हैं जो एक ही मांस से बने माने जाते हैं। यह साहचर्य वर्गभेद के साथ एकीकृत रूप में ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

दुर्खिम का धार्मिक संगठन सिद्धांत एक सामूहिक संगठन का आदर्श प्रस्तुत करता है जो सृष्टि को वर्गीकृत करने का भरसक प्रथम प्रयास है। चूंकि प्राकृतिक तथा सामाजिक जानकारियां हमें धार्मिक विचारों में ढूंढ़ने से मिल जाती हैं, जिनमें कुछ प्रक्षिप्त अंश भी हैं, किंतु इससे पता चलता है कि संगठन की संरचना और धर्म के बीच गहरा रिश्ता है।

टोटम तथा समाज- टोटम गोत्र का चिह्न है, प्रतीक है उस संगठन का जो एक मांस से बने हैं। अतः टोटम ही सामाजिक संगठन का आधार बनता है।

इसमें भौतिक वस्तुओं को प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। टोटम पवित्र शक्ति तथा गोत्र की पहचान है, अतः टोटम एक ही समय में गोत्र अथवा समुदाय अथवा समाज का प्रतिनिधित्व करता है तथा पवित्र शक्ति अथवा ईश्वर का भी।  इस प्रकार ईश्वर और समाज एक ही हैं जिनकी पूजा आरंभ से ही होती आ रही है।

धार्मिक रीति-रिवाजों की श्रेणियां तथा उनके सामाजिक प्रकार्य :-

रीति-रिवाज सभी धर्मों की एक खास विशेषता है जो धार्मिक पहलू के रूप में कार्य करते हैं। आस्था भी धर्म का एक महत्त्वपूर्ण अंग है जो उन रीति-रिवाजों तथा वस्तुओं के प्रति होती है जो धर्म में मान्य हैं।

दुर्खिम ने धार्मिक रीति-रिवाजों को चार श्रेणियों में बांटा है

(क) बलि प्रथा- बलि के रूप में दीक्षा को भी माना जाता है तथा चढ़ावा, अर्पण या दान देना भी कह सकते हैं। बलिदान, समाज में टोटम के रूप में सेवार्थ उपयोगी वस्तुओं का दिया जाता है, जो जीवनदायक भी हो सकती हैं, जैसे-अनाज, धन, पशु आदि।

यह दरअसल एक अनुष्ठान है जिसमें सामूहिक सहभागिता के द्वारा पवित्र होने की अवधारणा सम्मिलित होती है।

(ख) मुखौटा, रंग-लेपन अथवा अनुकरणशील अनुष्ठान-इस अनुष्ठान में सामूहिक रूप से सदस्य विभिन्न पशुओं की आकृति एवं गुणों की नकल करते हैं तथा मुखौटे या रंग-रोगन के लेप का प्रयोग भी करते हैं।

इसके द्वारा वे अनुकरणीय पशु की आत्मा व गुण को समुदाय के सदस्यों में प्रवेश करवाते हैं। यह नवीन उत्पादन का बोधक भी है, जो प्रजनन का प्रतीक है।

(ग) स्मृति अनुष्ठान-इस अनुष्ठान को परंपरा का स्थानांतरण या नयी पीढ़ी को इतिहास का ज्ञान कराना भी कहते हैं। इसमें अपने पूर्वजों के पौराणिक इतिहास का स्वांग किया जाता है।

यह अपनी परंपरागत ज्ञान की जानकारी से समाज द्वारा समाज को जोड़ने का कार्य है।

(घ) पापनाशक अनुष्ठान-यह अनुष्ठान जीवन में घटित घटनाओं; जैसे–मृत्यु, आपदा, दुर्भाग्य आदि के नाश अथवा शमन के लिए किया जाता है। इसमें अंतिम संस्कार की क्रिया आदि शामिल हैं।

धर्म तथा ज्ञान का निर्माण:- 

धर्म की उत्पत्ति को विचारों से उत्पन्न मानते हुए दुर्थीम ने विचार अथवा ज्ञान एवं धर्म को संबंधित किया है। धार्मिक विचार प्रकृति तथा सामाजिक संरचना को श्रेणियों में विभक्त करते हैं। अत: ब्रह्माण्ड की व्याख्या आदि ज्ञान विचारों की श्रेणियों से ही प्राप्य हैं, जो सामाजिक हैं। अतः मानव के आकाशीय, कालवाचक तथा अन्य विचार सामाजिक हैं। दुर्खिम ने समय और स्थान को केन्द्रीय रूप में मानते हुए व्याख्या प्रस्तुत की है। इस प्रकार वर्गीकरण को सामाजिक अनुष्ठानों से जोड़ते हुए एक उदाहरण देखा जा सकता है

काल के निर्धारण में वर्ष, महीने, सप्ताह आदि को अनुष्ठान, भोज, समारोहों के आधार पर वर्गीकृत करना। अतः कैलेण्डर सामूहिक क्रियाओं के तालमेल से ही निर्मित है।

दुर्खिम के धर्म के समाजशास्त्र पर आलोचनात्मक टिप्पणी:-

इमाइल दुर्खिम की महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘दी एलीमेन्ट्री फार्स ऑफ रिलीजियस लाइफ’ एक युग प्रवर्तनकारी समाजशास्त्रीय ग्रंथ होने के बावजूद आलोच्य है

(i) धर्म को वर्गीकरण का आधार मानते हुए दुर्खिम ने धर्म के प्रणेताओं की अनदेखी की है तथा इसमें वैयक्तिक सक्रियता पर चर्चा नहीं की है। साथ ही शक्ति के असमान वितरण के कारणों की अनदेखी की है।

(ii) सामूहिक चेतना के संदर्भ में अल्प चर्चा। 

(ii) दुर्खिमका धर्म विश्लेषण एक जनजाति पर आधारित है जो सार्वभौमिक सत्य नहीं हो सकता।

(iv) ऑस्ट्रेलिया के टोटमवाद को दुर्खिम ने सर्वाधिक प्राचीन कहा जो कि साक्ष्य के अभाव में संदेहपूर्ण है।

(v) दुर्खिम के धर्म के समाजशास्त्र के साथ-साथ उनके इस तर्क का भी खंडन किया गया जिसमें “मानव विचारों की सबसे आधारभूत श्रेणी की उत्पत्ति सामाजिक अनुभव से हुई है” बताया गया है।

(vi) इनके द्वारा बताए गए टोटमवाद के अनुरूप सभी जनजातियों में टोटम गोत्र होना चाहिए, किंतु कुछ में बिना टोटम के गोत्र हैं। अतः इमाइल दुर्खिम की आलोचना के बावजूद यह अनुसंधान सर्वथा धर्म की उत्पत्ति के कई संदर्भो को खोलता है जो दुर्खिम के मौलिक चिंतन की देन है।।

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