मीरा के जीवन से परिचित होने तथा उनकी रचनाओं का ध्यानपूर्वक अध्ययन करने के उपरांत स्पष्ट हो जाता है कि मीरा को किसी भक्ति-सम्प्रदाय या दर्शन ने भक्त-कवयित्री नहीं बनाया ।
जीवन की विषम परिस्थितियों के फलस्वरूप उनके हृदय में सहज रूप में भक्ति-भावना का अजम्न प्रवाह उमड़ता रहा ।
उपास्य का स्वरूप जहां तक उनके उपास्य का संबंध है उसके संबंध में विद्वानों में भले ही मतभेद हो परन्तु उनके प्रारंभिक जीवन का वातावरण और बाद की घटनाएं स्पष्ट संकेत देती हैं कि उनके आराध्य गिरधर गोपाल, नटनागर, कृष्ण थे।
जिन पितामह राव दूदाजी की स्नेहछाया और संरक्षण में मातृविहीना बचपन में पली थीं वह परम वैष्णव भक्त थे, उन्हीं के वैष्णव संस्कारों से मीरा के व्यक्तित्व का निर्माण और विकास हुआ।
भक्ति-पद्धति-डा0 पीताम्बर दत्त बड़श्वाल जैसे कुछ विद्वान मीरा को निर्गुण-निराकार ब्रह्म की उपासिका मानते हैं । यह सत्य है कि मीरा के समय में संत मत का पर्याप्त प्रचार और प्रभाव था और मीरा पर भी उसका थोड़ा-सा प्रभाव दिखाई देता है ।
कुछ पदों में उन्होंने अपने उपास्य को सर्वशक्तिमान, अनिर्वचनीय बताया है, गुरु की महिमा भी स्वीकार की है, अपने उपास्य के साथ एक हो जाने की इच्छा व्यक्त की है, उसके रंग में रंग जाने की बात कही है, कुछ पदों में संत काव्य की शब्दावली-जोगी, जोगिया, निर्गुण का सुरमा, प्रेमहठी का तेल, मनसा की बाती. सुरत निरत का दिवला, अगम का देस, गगन मंडल, त्रिकुटी, निरंजन, अनहद नाद आदि का भी प्रयोग किया है परन्तु कृष्णभक्त परिवार में जन्म और पालन पोषण ग्णभक्त परिवार में विवाह तथा उनके पदों में कष्ण-भक्ति का स्वर, कृष्ण के गुणानुवाद, अवतार रूप में उनकी लीलाओं का वर्णन-यह सब सिद्ध करता है कि उन्होंने ईश्वर के सगुण स्वरूप श्रीकृष्ण को ही अपना आराध्य बनाकर उनके प्रति अपना अविचल प्रेम, सूर्ण समर्पण भाव प्रकट किया था
मीरा को पति की मृत्यु के बाद लौकिक विरह झेलना पड़ा और जब उन्होंने अपनी प्रणय-भावना को उदात्त बनाकर लौकिक प्रिय के स्थान पर कृष्ण को अपना सर्वस्व, अपना पति मान लिया तो उनकी विरह भावना अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंच गयी।
मीरा प्रियतम कृष्ण की प्रेम पीड़ा रात दिन झेलती हैं, वह अपना दर्द किसी से कह भी नहीं सकतीं, अतः प्रेम दीवानी हो जाती है
हों री! मैं तो दरद दिवानी मेरो दरद न जाने कोय घायल की गति घायल जानै की जिन लाई होय।
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