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तुकाराम के काव्य में अभिव्यक्त सामाजिक और दार्शनिक पक्ष की विवेच्नना कीजिए।

वारकरी संप्रदाय में श्रेष्ठ भक्त कवि तुकाराम और चोखामेव्ठा दोनों का समावेश है। तुकाराम वारकरी संप्रदाय के शिखर माने जाते हैं। धार्मिक कर्मकांड और सांसारिक जीवन से पलायन जैसी ब्राह्मण धर्म की परंपराओं के विरोध में एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में वारकरियों के भक्ति आंदोलन की शुरुआत हुई। महाराष्ट्र में उस समय जाति-व्यवस्था का जो रूप मौजूद था, वह अत्यंत घृणापूर्ण था। समाज का सबसे बड़ा उत्पादक वर्ग, शूद्रों का जीवन व्यतीत कर रहा था। वारकरी संप्रदाय ने जनसाधारण के लिए भक्त का द्वार खोल दिया था। तुकाराम ने धार्मिक आडंबर, जाति व्यवस्था, ऊंच-नीच के भेदभाव को नष्ट करने का प्रयास किया। संस्कृत भाषा के स्थान पर जनसामान्य की भाषा का प्रयोग करना, यह भी भक्ति आंदोलन का महत्त्वपूर्ण लक्ष्य था, जिसे 'तुकाराम' और “चोखामेव्ठा' ने अपने काव्य में पूर किया। तुकाराम के काव्य में सगुण-निर्गुण धारा का महाराष्ट्र भक्ति धारा में अभाव हे। 'तुकाराम' वारकरी संप्रदाय के शिखर माने जाते हैं। उनका भक्ति काव्य वारकरी संप्रदाय की भक्ति भावना का अत्यंत परिष्कृत रूप हेै।

तुकाराम का जीवन परिचय और रचनाएं

जीवन परिच्य-तुकाराम का जन्म 1608 ई. में, पूना जिले के 'देहू' नामक गांव में हुआ था। वे शूद्र जाति के थे। इनके पिता का नाम बोल्हाजी और माता का नाम कनकाई था। इनके दो भाई थे। इनके माता-पिता विट्ठल के भक्त थे। तुकाराम के शूद्र जाति के होने के कारण, उन्हें वेदों का ज्ञान नहीं था, परंतु उन्होंने प्रयास करके इनका ज्ञान प्राप्त कर लिया। इनके दो विवाह हुए थे। पहला विवाह रखुमाई और दूसरा विवाह जीजाबाई के साथ हुआ था। 17 वर्ष की आयु में इनके माता-पिता की मृत्यु हो गई। सन 1629 में महाराष्ट्र में भयंकर अकाल पड़ा और उसमें अन्न के अभाव के कारण उनकी पहली पत्नी और पुत्र की मृत्यु हो गई। तुकाराम संसार के प्रति विरक्‍्त होने लगे और भक्ति पथ की ओर आगे बढ़ने लगे। तुकाराम को स्वप्न में गुरु ने उपदेश दिए, जिससे उनमें काव्य रचना करने की प्रतिभा जाग्रत हुई। तुकाराम ने समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों का विरोध किया तथा जाति-पांति, ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी को मिटाने के लिए काव्य रचना को। इनकी मृत्यु सन 1649 में हुई।

रचनाएं-तुकाराम की मृत्यु के बाद उनके द्वारा लिखित अभंगों की मूल प्रतियां उनके शिष्यों को सौंप दी गईं और उन शिष्यों ने उनकी अनेक प्रतियां बनाईं। उनकी मूल प्रतियों से नकल करके अनेक पांडुलिपियां बनायी गईं। तुकाराम के अभंगों का पहला संकलन 1867 ई. में प्रकाशित किया गया जो “अभंग गाथा' के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

तुकाराम काव्य का सामाजिक पक्ष

तुकाराम जिस वारकरी संप्रदाय के अनुयायी थे, उस संप्रदाय का प्रमुख उद्देश्य सामाजिक बुराइयों को दूर करना था। उन संतों का यह प्रयास रहा कि ऐसा समाज निर्मित किया जाए, जिसमें वंश, समूह, जाति, वर्ण, संप्रदाय, धार्मिक कट्टरता समाप्त हो ओर कर्मकांडों को नष्ट किया जाए। इसी आधार पर तुकाराम ने आध्यात्मिक विचार और सामाजिक प्रश्नों को एक-साथ जोड़कर प्रस्तुत किया और भक्ति आंदोलन ने एक विशाल सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया।

धार्मिक बाह्याचार का विरोध-शूद्रों को वेदाध्ययन का अधिकार नहीं था ओर तुकाराम ने शूद्र होते हुए भी वेदों का अध्ययन किया। उन पर और सामान्यजनों में उस ज्ञान को बांटने का आरोप लगाया गया, परंतु इस विरोध के बाद भी तुकाराम अपनी निस्पृह सेवा-भावना से अपने लेखन कार्य में निमग्न रहे ओर शिष्य संप्रदाय तथा मठ स्थापना को इन्होंने महत्त्व नहीं दिया। तुकाराम ने कहा है कि भक्ति के लिए संसार को त्यागने की कोई आवश्यकता नहीं है।

जाति प्रथा, छुआछूत का विरोध-तुकाराम ने जिस जाति में जन्म लिया था, उसे बदलने का उन्हें कोई अधिकार नहीं था। इस्लाम धर्म, जो प्रत्येक व्यक्ति, जाति को अपने में समाहित कर रहा था, इसमें सबसे अधिक आकर्षण था-इस्लाम धर्म के बंधुत्व और एकेश्वरवाद जैसे प्रगतिशील तत्त्व। इन्होंने महाराष्ट्र में ब्राह्यणजाद की दासता को अस्वीकार करके संतों द्वारा कर्मकांड का निषेध किया और एक देवता के रूप में पंढरपुर के “विट्ठल” की उपासना की और संतों द्वारा लोगों को एकता के सूत्र में बांधकर ईश्वर भक्ति के लिए प्रेरित किया। तुकाराम को इन सभी परिवारिक-सामाजिक विरोधों तथा अहंकार पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा।

तुकाराम काव्य का दार्शनिक पक्ष

तुकाराम ने अपने अभंगो में आध्यात्मिक की अपेक्षा दार्शनिक पक्ष को ज्यादा महत्त्व दिया है। तुकाराम के शूद्र जाति के होने के कारण उन्हें वेदों का ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। उन्होंने वेदों के अध्ययन ओर ईश्वर ज्ञान के संबंध को नकारा तथा वेदाध्ययन करने वाले मूढ़ ब्राह्मणों की कड़ी आलोचना की।

निर्गुण-निराकार ईश्वर-तुकाराम ने ईश्वर के निर्गुण-निराकार रूप को माना है और इनमें कोई भेद नहीं किया है। वे द्वेत-अद्बैत को निश्चित नहीं कर पाते हैं। वे कहते हैं कि जो निर्गुण है वही सगुण है। तुकाराम ने एक मंजीरे की उपमा देकर कहा है कि मजीरें दो होते हैं, लेकिन उनकी जो ध्वनि होती हे वह एक-सी होती हे, वे दोनों एक समान हैं। उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता हे; जैसे-नदी, सरोवर और कुंड के नामों में भेद होते हुए भी सभी में जल तो एक-सा ही है, उसी तरह ईश्वर भी एक है, लेकिन उसके रूप अलग-अलग हें।

गुरु परंपरा का विरोध-तुकाराम ने गुरु परम्परा का विरोध किया और ईश्वर की भक्ति तथा उसके नाम संकीर्तन पर अधिक बल दिया।

तुकाराम की भक्ति भावना

तुकाराम एक निर्गुण भक्त कवि थे, जिन्होंने ईश्वर को अभेद, अनंत, अरूप और अजन्मा मानते हुए सगुण-निर्गुण के भेद को अस्वीकारा है। उन्होंने ज्ञान मार्ग, योग मार्ग से भक्ति मार्ग को श्रेष्ठ माना और यहीं वे कबीर की भक्ति पद्धति से भिन्न दिखाई पड़ते हैं। अतः भक्ति को ही प्रधान तत्त्व मानते हुए तुकाराम ने दया, क्षमा, शांति आदि गुणों को प्राप्त करने के माध्यम के रूप में ईश-भक्ति को समर्थ माना हे। नाम महिमा-अन्य निर्गुण भक्त कवियों की भाँति तुकाराम ने भी नाम स्मरण के महत्त्व को स्वीकारा है। 'राम से बड़ा राम का नाम' की अवधारणा को सार्थक करते हुए भक्त तुकाराम ने हरि के नाम का गुणगान किया हे।

सांप्रदायिकता की समस्या के संदर्भ में तुकाराम का काव्य प्रासंगिक है। तुकाराम के समय सारा समाज वर्ण, जाति, संप्रदाय, धार्मिक कट्टरता के कारण आपस में लड़-झगड़ रहा था। सभी एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए थे। अतः उन्होंने अपनी सर्वहितकारी एक नई पद्धति को रचना की जिससे मनुष्य का लोकिक एवं आध्यात्मिक जीवन सुधर सके। उन्होंने सामाजिक बाह्याडंबरों का विरोध किया। शास्त्रज्ञान का विरोध किया। अपने पदों में वर्णित किया कि सभी मनुष्य ईश्वर के द्वारा बनाएं गए हैं, सभी समान हें, कोई छोटा-बड़ा या ऊंच-नीच नहीं हे। उन्होंने कहा कि बहुदेववाद से समाज में अनेक संप्रदायों का जन्म होता है। सभी संप्रदाय एक-दूसरे को हीन प्रदर्शित करते है, इसलिए एकमात्र कृष्ण की पूजा ही उचित हे, वही परमात्मा है एवं परमेश्वर है। उन्हीं से सभी देवताओं की पूजा हो जाती है। उनकी भक्ति के लिए किसी शास्त्रीय ज्ञान एवं ढोंग की आवश्यकता नहीं है। उनकी भक्ति सभी कर सकते हें। उनके लिए सभी समान हें। तुकाराम की उदार एवं समानतावादी विचारधारा ने कट्टर हिंदुओं एवं मुसलमानों को उदार बना दिया। दाराशिकोह, कबीर तथा शेख मुहम्मद आदि हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने में लगे थे, जिससे समाज में भाईचारे की भावना, सहानुभूति एवं सहयोग की भावना बढ़ने लगी थी।

“तुकाराम' एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते थे जिसमें वर्ण-व्यवस्था, जाति-पांति, वंश-समूह तथा धार्मिक कट्टरता न हो। जिसमें सामाजिक समानता हो, परस्पर भाईचारे की भावना हो, लोग परस्पर ईर्ष्या-द्वेष न करते हों। वे एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते थे जिसमें किसी प्रकार की कोई विषमता न हो, तनाव का वातावरण न हो, जिसमें धार्मिक पाखंड तथा कर्मकांड बिल्कुल न हो। सभी सबके सहायक हों, शुभचिंतक हों मित्र हों, भाई हों, किसी के मन में किसी के लिए वैमनस्यता न हो। सभी एक-दूसरे के उन्‍नयन की सोचें। न कोई शोषक हो और न कोई शोषित। वे एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते थे, जिसमें केवल सौहार्द ही सौहार्द हो।

संत तुकाराम ने इस्लाम धर्म से निम्नलिखित प्रगतिशील तत्त्वों को ग्रहण किया-

1. इस्लाम धर्म की उदारता-इससे हिंदू धर्म में वर्ण, जाति, ऊंच-नीच की भावना नष्ट हो सकती थी।

2. एकेश्वरवाद-इससे संपूर्ण समाज एक ही ईश्वर का उपासक बनकर एक प्रकार की सोच धारण कर सकता था।

3. बन्धुत्व की भावना-मुस्लिम धर्म में जाति-पांति का भेद न होकर परस्पर भाईचारे की भावना पर जोर दिया गया है। वहां कोई छोटा-बड़ा नहीं है, अतः इससे समाज में समानता की भावना बढ़ती है।

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