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क्या 18वीं शताब्दी एक “अंधकार का युग (डार्क एज)” थी? विभिन्‍न इतिहासकारों के विचारों के संदर्भ में चर्चा करें।

अभी हाल तक 18वीं सदी को एक अन्धकारमय युग के रूप चित्रित किया गया, क्योंकि उस समय अव्यवस्था तथा अराजकता का शासन था। मुगल साम्राज्य धराशायी हो गया, क्षेत्रीय शक्तियां साम्राज्य को स्थापित करने में असफल रहीं तथा 18वीं सदी के अन्त में ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित हो जाने के साथ ही स्थायित्व कायम हो पाया।

   भारतीय इतिहास पर काम करने वाले केम्ब्रिज स्वूफल के इतिहासकारों और उनके समर्थक भारतीय इतिहासकारों ने 18वीं शताब्दी को अन्धकारमय युग कहा तथा इसकी तुलना में भारत में ब्रिटिश शासन को एक वरदान बताया।

   इस प्रकार के विचारों को स्वीकार करने में कई समस्याएं हैं। मुगल साम्राज्य का प्रभाव न तो इतना गहरा था और न इतना व्यापक जितना कि इसको माना जाता है। भारत का एक काफी बड़ा भाग विशेषकर उत्तर पूर्वी तथा दक्षिणी भाग इसके बाहर था और इसी भांति बहुत से सामाजिक समूह भी इसके प्रभाव से बाहर रहे। इसलिये अखिल भारतीय स्तर पर होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषण करने के लिये मुगल साम्राज्य के पतन को उचित आधर नहीं माना जा सकता। हाल ही में कुछ विद्वानों का मत है कि अखिल भारतीय साम्राज्यों के उत्थान तथा पतन की तुलना में क्षेत्रीय राजनैतिक शक्तियों की स्थापना 18वीं सदी की ज्यादा महत्वपूर्ण विशेषता थी। मध्यकालीन भारत के अग्रणीय इतिहासकार प्रो. सतीश चन्द्र के अनुसार, 18वीं सदी के इतिहास को पूर्व-ब्रिटिश व ब्रिटिस दो भागों में देखने के स्थान पर उसे इसकी निरंतरता तथा समग्रता में देखा जाना चाहिए।

   औरंगजेब की गलत नीतियों ने मुगलों की स्थायी राजनैतिक व्यवस्था को कमजोर किया। परन्तु मुगल साम्राज्य के दो मुख्य स्तम्भ सेना तथा प्रशासन 1707 ई. तक पूर्णतः स्रिफय थे। उत्ताराधिकार के युद्धों तथा कमजोर शासकों के कारण 1707 से 1719 तक दिल्‍ली में अव्यवस्था फैल गई। मोहम्मद शाह का 1719 से 1748 तक का लम्बा शासन काल साम्राज्य के भाग्य को पुनः स्थापित करने वेफ लिये पर्याप्त था परन्तु सम्राट की पूर्ण अयोग्यता ने इस संभावना को भी समाप्त कर दिया।

   निजामुल-मुल्क ने इस सम्राट के शासन के दौरान वजीर के पद से त्यागपत्र देकर 1724 में हैदरावाद के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। बंगाल, अवध और पंजाब ने भी इस पथ का अनुसरण किया और साम्राज्य का उत्ताराधिकारी राज्यों में विभाजन हो गया। छोटे सरदारों ने इसे विद्रोह का सूचक समझा और मराठों ने अपने साम्राज्य की स्थापना को साकार करने के लिये पुरजोर प्रयासों को प्रारंभ कर दिया। ईरान के सम्राट नादिरशाह ने 1738-39 में भारत पर आक्रमण किया। उसने शीघ्र की लाहौर पर विजय प्राप्त कर ली तथा 13 पफरवरी 1939 को करनाल में मुगल सेना को पराजित कर दिया। इस अपमानजनक पराजय को और पूरा करने के लिये मुगल सम्राट मोहम्मद शाह को पकड़ लिया गया तथा दिल्‍ली को लूटा गया। उस समय के कवियों मीर तथा शौदा ने दिल्ली के नष्ट होने संबंधी विलाप गीत का वर्णन अपनी रचनाओं में किया है। परन्तु नादिरशाह के आक्रमण का दिल्ली पर इतना व्यापक प्रभाव नहीं हुआ जितना कि सामान्यतः माना जाता है। अब्दाली के आक्रमण का दिल्‍ली पर अधिक भयंकर प्रभाव हुआ। परन्तु 1772 तक स्थिति पुनः सुधर चुकी थी।

   यह स्पष्ट हो चुका है कि 18वीं सदी को अब एक मूलतः अन्धकारमय, अराजकतावादी युग नहीं माना जा सकता। मुगल साम्राज्य का पतन ही इस श्षतान्वी की एक मात्र प्रमुख विशेषता नहीं थी। श्ेत्रीय शक्तियों का उदय 18वीं सदी के मध्य की लगभग-उतनी ही महत्वपूर्ण घटना थी। 18वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश शक्ति का उदय तीसरी महत्वपूर्ण घटना थी।

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