(ग) एक सु तीरथ डोलत है इक बार हजार पुराने बके हैं।
एक लगे जप
में तप में इक सिद्ध समाधिन में अटके हैं।
चेत जु
देखत हौ रसखान सु मूढ़ महा सिगरे भटके हैं।
साँचहि वे जिन आपुनपौ यह स्याम
गुपाल पै वारि दके हैं।।4।।
उत्तर - व्याख्या
रसखान ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण को महत्वपूर्ण मानते है, बाह॒याडंबर को नहीं। इस सवैये में वे कहते हैं कि कोई तीर्थस्थानों में
धूम रहा है; कोई हजारों बार पुराण की कथा कहता है, उसका पाठ करता है; कोई जप कर रहा है; कोई सिद्ध है पर समाधि में अटका हुआ है। रसखान कहते हैं अगर सचेत होकर
देखा जाए तो सारे नासमझ हैं और भटक रहे हैं। सत्य को वही पाता है जो स्वयं को
कृष्ण पर न्यौछावर कर देता है। उनके प्रेम रूपी नीर को पीकर मस्त है।
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