चुनावी राजनीति में जाति की भूमिका
भारतीय राजनीति में जाति सबसे महत्वपूर्ण
कारक बन गयी हैं। जाति चेतना एवं जातिगत संगठनों के उदय ने मारतीय राजनीतिक
व्यवस्था को बदल दिया है। सार्दईभौम वयस्क मताधिकार के लागू होने के बाद सभी
बर्गों की राजनीति में भागीदारी बढ़ी है तश्ना ये वर्ग बहुल मजबूत ताकत बनकर उमरे
हैं। जैसा कि आप इकाई 12 में पढ़ेंगे, जाति एवं राजनीति का अंत:संबंध है। इस संदर्भ में, हमें
यह समझने की जरूरत है कि भारत की चुनावी राजनीति में जाति के दो पहलू हैं: पहला,
जाति के आधार पर प्रतिनिधी चुने जाते है, या जाति
के आधार राजनीतिक दल टिकटों का बंटवारा करते हैं, तथा दूसरा
पहलू यह है कि राजनीतिक दलों का आधार, जातियों का समर्थन
होता है। प्रथम पहलू यह दर्शाता है जबकि दूसरा यह दर्शाता है कि चुनावी सफलता में
जातियों की भूमिका अधिक बढ़ गयी है। प्रथम पहलू यह दर्शाता है कि जातियों को
विधायी निकायों में शामिल किया जा रहा है जबकि दूसरा यह है कि चुनावी सफलता में
जातियों की भूमिका अधिक बढ़ गयी है।
दूसरे पहलू में हम इस तरह भी समझ सकते हैं कि अब
जातियों को रोजगार, स्वास्थ्य शिक्षा,
एवं शासन में अधिक महत्य दिया जा रहा है। इन सब पहलुओं के आधार पर
यह कह सकते हैं कि जाति राजनीति का प्रमुख कारक बन गयी है। हालांकि, अन्य कारक भी राजनीति को प्रमावित करते हैं लेकिन जाति इनमें से एक है।
वास्तव में कुछ राजनीतिक दलों के समर्थन का आधार ही जाति बन गयी है। उदाहरण के तौर
पर बहुजन समाज पार्टी का दलित वर्ग सबसे प्रमुख समर्थन का आधार है। 1980 तक
काँग्रेस पार्टी का आधार भी दलित वर्ग ही प्रमुख था, इसके
अलावा पिछड़े वर्ग एय उच्च जातियाँ भी इसमें थी। पॉल ब्रास ने इसे "जातियों
का महागठबंधन” कहा था। इन रणनीतियों के आधार पर विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव लड़ने
के लिये जातियों के आधार पर टिकट तय करती है। यहाँ तक कि वोट देने याले भी जाति के
आधार पर ही योट डालते हैं। कई शोध कार्यों से यह पता चलता है कि जातियों ने
राजनीति में भागीदारी के कारण लोगों को मजबूत किया है खासकर जो वर्ग पिछड़े हैं
उनको अधिक सशक्त बनाया है। इन अध्ययनों में शामिल है, जैफरलों
एवं कुमार (सं.) की पुस्तक (2011) राइज ऑफ प्लेनियनूस? जिसके
अनुसार भारतीय विधान सभाओं का चरित्र अब पूरी तरह बदल गया है। इसका चरित्र यह
दर्शाता है कि स्वतंत्रता प्राती के बाद दलितों, पिछड़े
वर्गों तथा कमजोर वर्गों का प्रतिनिधित्व इन निकायों में बढ़ा है। अपनी पुस्तक “हू
वांटस् डेमोक्रेसी"? में जावेद आलम यह सुझाव देते हैं
कि, निम्न जातियाँ जाति को अपने सशस्तीकरण के लिये एक
महत्वपूर्ण औजार मानती है। प्रताप भानू मेहता ने “बर्डन ऑफ डेमोक्रेसी” में यह
दलील दी कि, लोकतंत्र ने अशिक्षित तथा गरीब लोगों के लिए
अवसर प्रदान किए। और प्रतिनिधित्व परन्तु असमानताओं के कारण एवं उत्तरदायित्व के
बीच काफी अंतर है। राज्य की ओर माँग अधिक बढ़ रही है, इससे
राज्य की तरफ लोगों का गुस्सा अधिक हैं एवं शासन के सिद्धांत पूरी तरह बिखर गये है
या टूट गये है। योगेन्द्र यादव ने लोकतांत्रिक उथल-पुथल के संदर्भ में विभिन्न सामाजिक
समूहों की बदलती मागीदारी का अवलोकन किया। वे इस उथल-पुथथल को दो चरणों में
विभाजित करते हैं:- प्रथम लोकतांत्रिक उठान, इसमें 1960 से
1970 के दशक में पिछड़े वर्ग उमर कर सामने आये जबकि दूसरा लोकतांत्रिक उठान जब
दलितों की भागेदारी बढ़ी। इसका प्रमुख कारण जातिगत संगठनों की प्रमावी मभिका रही
है।
इस संदर्म
में, रजनी कोठारी का यह मानना है कि 'राजनीति में जातिवाद' जाति के राजनीतिकरण से ना कम
है या ज्यादा है। अन्य शब्दों में, राजनीति पर जाति का
प्रभाव अधिक नहीं पड़ा है बल्कि जाति का राजनीतिकरण हुआ है। जाति भारत में सामाजिक
एवं राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पहलू है। सामाजिक संस्था के रूप में, यह वृष्ठत मजबूती के साथ खड़ी है और आधुनिकीकरण के युग में भी जाति अभी
विद्यमान है। यद्यपि जातिके अंदर बहुत परिवर्तन आ गया है फिर भी यह राजनीति एवं
राजनीतिक दलों के साथ पूरी तरह से घुल मिल गयी है एवं कोई भी राजनीतिक दल इसकी
अनदेखी नहीं कर सकता।
गैर
चुनावी राजनीति में जाति की भूमिका -
जाति
व्यवस्था बदली परिस्थितियों में अपनी मूमिका को नये सिरे से व्यवस्थित करने का प्रयास कर रही है। औद्यौगीकरण, शहरीकरण, सामाजिक-धार्मिक
सुधार, व्यावसाथिक गतिशीलता, बाजारी
अर्थव्यवस्था में वृद्धि का जाति व्यवस्था पर बहुत अधिक प्रमाव पढ़ा है। इन कारकों के प्रभाव के कारण हमें जाति में आये परिवर्तन को भी समझना
पड़ेगा। जैसा कि हम धर्चा कर चुके हैं, जाति ने देश की
राजनीति में जबरदस्त भूमिका निभाई है, तथा यह भी सत्य है कि जाति ने गैर-घुनावी क्षेत्र में भूमिका निभाई है।
यह अपेक्षा की जाती है कि शिक्षा के प्रसार से लोग उदार, तर्कशील एवं विस्तृत सोध के बनेंगे। इसी प्रकार मारत में साक्षरता दर में वृद्धि ने लोगों की सोच में परिवर्तन आएगा। इसके कारण जातिवाद एयं जाति की मानसिकता में भी परिवर्तन आएगा। लेकिन साक्षरता में वृद्धि से जातियों में चेतना का भी विकास हुआ है। इससे सभी जातियाँ अपने हितों की रक्षा करना चाहती है। इसी के आधार पर जातियाँ संगठित हो रही है एवं संघ एवं दबाव समूह बना रही है। ये समूह मुरधय रूप से शिक्ता के मुद॒दे. स्वास्थ्य एवं धार्मिक मुद्दों को उठाते हैं। ये संगठन हॉस्टल एवं हास्पीटल, स्कूल एवं कॉलेज, धर्मशाला और मंदिर भी चलाते है। ये जातिवादी संगठन अपने सदस्यों को नेतृत्व दिलाने के लिए भी प्रयत्न करते हैं और उन्हें अपनी जाति का प्रवक्ता भी बनाते हैं। जाति संगठन अपने सदस्यों के प्रति वफादारी निमाते हैं और उनकी जातिगत पहचान को मजबूत बनाते हैं।
यद्यपि, जाति पंचायतों
की भूमिका में कमी हो रही हैं परन्तु जाति संगठन बढ़ रहे हैं। इनमें से कुछ संगठनों का अपना लिखित संविधान भी है तथा प्रबंध समिति भी है
जिससे वे जाति के विषय एवं प्रथा को बनाये रखते है।
कुछ जाति संगठनों के अपने अखबार, समाधार बुलेटिन, पत्रिकाएँ, इत्यादि भी
होते हैं, जिनके माध्यम से अपने सदस्यों को संगठन की गतिविधियों एवं
कार्यक्रमों की जानकारी देते हैं। जातियों के बीध एकता या एकीकरण करने के कई प्रयास किये गये हैं इनमें जाति आधारित ट्रस्टों की स्थापना या
इकाई भी शामिल है। ये ट्रस्ट वार्षिक सम्मेलन, मिलन समारोह, वार्षिक डिनर, या त्यौहारों
का मी आयोजन करते हैं। ये गरीब बच्चों को
छात्रवृत्तियों भी प्रदान कराते हैं। इनमें कुछ टूस्ट अपने स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल, इत्यादि भी
चलाते हैं। ये संगठन अपने सदस्यों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए
सामूहिक क्रेडिट सोसाइटी एवं औद्यौगिक सोसाइटी भी स्थापित करते हैं।
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