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रिपोर्ताज लेखन की विशेषताएँ बताइए।

 रिपोर्ताज लेखन की विशेषताएँ

i) कथात्मक प्रस्तुति

रिपोर्ताज में एक या उससे अधिक घटनाओं का चित्रण होता है। घटनाओं को कथात्मक रूप में प्रस्तुत करना इस विधा की एक प्रमुख विशेषता मानी जाती है। रिपोर्ताज में कोई न कोई कहानी अवश्य होती है। रिपोर्ताज को मर्मस्पर्शी बनाने में कथातत्य का योगदान महत्वपूर्ण होता है। ध्यान देने की बात यह है कि इसमें वर्णित कहानी वास्तविक तो होती है लेकिन वह न तो किसी समस्या को उठाती है और न ही कोई समाधान प्रस्तुत करती है। बल्कि वह एक ऐसा चित्र प्रस्तुत करती है जिसके द्वारा पाठक जीवन में चेतना भरने वाले मानवीय मूल्यों के संबंध में विचार करने लगता है।

ii) ऐतिहासिकता

घटनाओं की प्रस्तुति द्वारा अपने युग के इतिहास को प्रस्तुत करने के कारण रिपोर्ताज का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं है। इसमें किसी घटना के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक आयामों को कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। रिपोर्ताज में वर्णित घटना स्वयं लेखक द्वारा देखी गई होती है इसलिए वह उस घटना के सभी पहलुओं से अच्छी तरह अवगत होता है। लेखक घटनाचक्र में फँसे व्यक्ति की वीरता, साहस और संकल्प की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करता है कि पाठक की संवेदना जाग उठती है। ऐसी घटना विशेष का संपूर्ण इतिहास रिपोर्ताज में निहित होता है, इसीलिए उसे अपने युग का जीवंत कलात्मक इतिहास माना जाता है।

iii) चित्रात्मकता

चित्रात्मकता रिपोर्ताज की महत्वपूर्ण विशेषता है। इसी विशेषता के कारण रिपोर्ताज रेखाचित्र के निकट खड़ा हो जाता है। प्रभावपूर्ण चित्रों के रूप में छोटी-छोटी घटनाएँ आकार ग्रहण करती हैं और पाठक के मन में चित्र अंकित कर देती हैं। इस तरह समूची घटना चित्रपट की भाँति आँखों के सामने घूमने लगती है। भाव और संवेदना चित्रात्मकता को और अधिक सजीव एवं प्रभावशाली बना देते हैं।

iv) विश्वसनीयता

घटनाओं का लेखक से साक्षात्कार होने के कारण रिपोर्ताज में विश्वसनीयता अधिक होती है। इसे प्रसंग-चित्र भी कहते हैं। किसी घटना, युद्ध, भूचाल अथवा मनोरंजक वृत्तांत का रिपोर्ताज तैयार करते समय लेखक का अपना दृष्टिकोण प्रधान रहता है। एक साधारण समाचार को कलात्मक रूप देने से रिपोर्ताज की सृष्टि होती है, यह बहुत ही रोचक तथ्य है। इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह है कि पाठक को रचना (रिपोर्ताज) से वह संतुष्टि या आनंद मिलना चाहिए जिसे घटना को देखते समय लेखक ने खुद महसूस किया हो। ऐसी अनुभूति रिपोर्ताज को विश्वसनीय बनाती है। कहना न होगा कि लेखक की सह्ृदयता रिपोर्ताज को विश्वसनीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

v) शैली

घटना की तत्कालीन प्रतिक्रिया के रूप में लिखे जाने के कारण रिप्रोर्ताज की शैली सामान्यतः भावावेश प्रधान होती है। इसके अलावा रिपोर्ताज निबंध शैली अथवा पत्र एवं डायरी शैलियों में भी लिखे जाते हैं। यह लेखक पर निर्भर करता है। जिस शैली में वह अपने को समर्थ रूप में अभिव्यक्त कर पाता है, उसी को वह अपना लेता है। असली चीज़ है घटना की प्रामाणिक और आत्मीय अभिव्यक्ति। इसके आकार की कोई सीमा नहीं होती। यह गद्यगीत की तरह छोटा भी हो सकता है और कहानी-उपन्यास की तरह बड़ा भी। लेखक की संवेदना का प्रसार ही इसकी सीमा का निर्धारण करता है। रिपोर्ताज में आत्मकथा की भाँति व्यक्ति के जीवन-संघर्ष की भावनात्मक प्रस्तुति नहीं मिलती। यह एक बहिर्मुखी विधा है जो वाह्म घटना पर आधारित होती है। इसकी सफलता परिस्थिति के सूक्ष्म अध्ययन एवं लेखकीय तल्लीनता में निहित रहती है।

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