इस संवेगात्मक आत्म जागरूकता को विभिन्न तरीकों से विकसित किया जा सकता है।
a) संवेगों की स्वरूप, प्रकार और उनके प्रभाव के विषय में जानना।
b) संवेगों की भौतिक अभिव्यक्तियों पर ध्यान देना जैसे शरीर-क्रियात्मक परिवर्तन जैसे तेजी से दिल धड़कना, तेज सांस लेना, पसीना आना, रक्तचाप में वृद्धि, चेहरे का बदलाव, हंसना, मुस्कराना, आराम महसूस करना आदि।
c) ध्यान साधना आपके आंतरिक आत्म पर अपना ध्यान केद्रित करने और स्वयं को समझने में सहायता करेगा।
d) शरीर का अवलोकन करना और यह पता लगाना कि क्या शारीरिक परिवर्तन और विचार प्रक्रिया चल रहे हैं।
e) दूसरे व्यक्तियों का भी आकलन करना कि हमारे स्वयं के संवेगात्मक स्थिति के वजह से उनकी शारीरिक हाव-भाव और व्यवहार में क्या परिवर्तन आते हैं।
2) वर्तान सवेयात्मक स्थिति के लिए उत्तरदायी कारणों का निर्धारण करना
जब हम उस संवेगात्मक स्थिति पर ध्यान केंन्द्रित करते हैं जिसे हम अनुभव कर रहें है, तो अगला चरण यह पत्ता करना होता है कि हम इनका अनुभव क्यों कर रहे हैं। यह संवेगों के कारण का पता लगाने के लिए कदम को पीछे लेने जैसा है
3) सवेगात्मक स्थिति पर नियंत्रण के उपाय अपनाना
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