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शोध से आप क्‍या समझते हैं? सामाजिक विज्ञान में विभिन्‍न प्रकार के शोध का वर्णन कीजिए।

 अधिकांश मानव विज्ञानी क्षेत्र में जाकर और क्षेत्र कार्य करके अपने शोध का संचालन करते हैं, जो कि जहाँ भी लोग और संस्कृतियाँ हैं, प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से उनकी संस्कृति या किसी भी समस्या के बारे में अध्ययन करना होता है।

शोध दिलचस्प हो सकता है क्योंकि इसमे आप जो कुछ भी सीखते हैं, वह उस पर उस पर नियंत्रण और स्वायत्तता का मापदंड सुझाता है। यह आपको किसी विषय या आपकी रुचि के प्रकरण संबंधी नए आयामों की पुष्टि करने, उन्हें स्पष्ट करने, उनका अनुसरण करने अथवा यहा तक कि उन्हें खोज पाने का अवसर देता है। कोई भी व्यक्ति जो किसी वस्तु के अन्वेषण में रुचि रखता हो, शोध कर सकता है।

शोध जाँच और अन्वेषण की एक प्रक्रिया है; यह व्यवस्थित, पद्धतिबद्ध और नीतिपरक होती है; शोध व्यावहारिक समस्याओं को हल करने और ज्ञान वृद्धि करने में मदद कर सकता है। शोध में कई प्रश्न शामिल होते हैं; उदाहरण के लिए,

· समस्या क्या है?

· समस्या क्यों होती है?

· समस्या कब आती है?

· समस्या कहाँ होती है?

· समस्या को कैसे हल किया जा सकता है?

इस प्रकार के प्रश्न ‘जिज्ञासा‘ से जन्म लेते हैं, जो कि मनुष्य के मौलिक गुणों मे एक है। जब ऐसी खोज या जाँच सुव्यवस्थित तरीके से की जाती है तो यह एक वैज्ञानिक शोध बन जाती है। वैज्ञानिक शोध किसी भी शोधकर्ता को एक नयी संकल्पना या कोई अवधारणा विकसित करने में मदद करता है, जिसके परिणामस्वरूप अंततः नये नियमों एवं सिद्धांतों की खोज होती है या फिर पहले से प्रचलित नियमो एवं सिद्धांतों में सुधार या संशोधन में किया जाता है।

विद्वानो ने कई तरीकों से शोध को परिभाषित किया है। शोध की कुछ परिभाषाओं पर नीचे चर्चा की गई है-

· रेडमैन एंड मॉरी (1993) के अनुसार शोध नया ज्ञान प्राप्त करने का एक व्यवस्थित प्रयास है।

· कर्लिंगर (1986) ने शोध को प्राकृतिक परिघटनाओं के बीच काल्पनिक संबंधो के एक व्यवस्थित, नियंत्रित, अनुभवजन्य और महत्वपूर्ण जाँच के रूप में परिभाषित किया।

· इमोरी (कैलिवान, 2014) के अनुसार, शोध कोई भी संयोजित जाँच है जो कि किसी समस्या के समाधान हेतु जानकारी प्रदान करने के लिए अभिकल्पित एवं संचालित की जाती है।

· अल्बर्ट सजेंट-ग्योर्गी (1937) के अनुसार, शोध वह देखने के लिए किया जाता है जो हर किसी ने देखा है, और वह सोचने के लिए भी जो किसी और ने न सोचा हो।

क्रेसवेल (2008) के अनुसार, शोध किसी प्रकरण या मुद्दे संबंधी हमारी समझ बढ़ाने के लिए जानकारी एकत्र कर उसका विश्लेषण करने हेतु एक चरणबद्ध प्रक्रिया है। उपर्युक्त परिभाषाएँ किसी शोध की निम्नलिखित विशेषताओं को उजागर करती हैं -

· यह किसी परिघटना का सुव्यवस्थित और निर्णायक अन्वेषण होता है।

· यह किसी परिघटना की विवेचना और व्याख्या किए जाने पर अभिलक्षित होता है।

· यह वैज्ञानिक विधि अपनाता है तथा अनुभवजन्य साक्ष्य और अवलोकनीय अनुभव पर आधारित होता है।

· यह नय सामान्यीकरण, नियम अथवा सिद्धांत प्रस्तुत करता है।

· यह प्रश्नों के उत्तर और समस्याओं के समाधान तलाश करने की दिशा में काम करता है।

अध्ययन के विषय के अनुसार हर शोध के अलग-अलग लक्ष्य और उद्देश्य होते हैं। आम तौर पर शोध का उद्देश्य वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के अनुप्रयोग से प्रश्नों के उत्तर तलाश करना होता है। शोध का मुख्य लक्ष्य उस सत्य/तथ्य का पता लगाना होता है जो कि छिपा हुआ है और जिसे अभी तक खोजा नहीं गया है। शोध करते समय शोधकर्ता शोध किए जाने के कौशल और क्षमता से सम्पन्न होना चाहिए। वह किसी अच्छे विषय का चयन करे और उस विषय के अनुसार उपयुक्त एवं विशिष्ट उपकरण व तकनीकें चुने। शोध में संरचनात्मक प्रक्रियाओं और नियमों का पालन करना आवश्यक होता है, जिसे ‘कार्य प्रणाली‘ कहा जाता है। वैज्ञानिक शोध करने के लिए आपको उचित कार्य प्रणाली का पालन करना चाहिए। वैज्ञानिक शोध को ज्ञान की उन्नति के लिए निर्देशित मानव गतिविधि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जहाँ ज्ञान दो मोटे तौर पर अलग-अलग प्रकार का होता है - प्रतिलिपि प्रस्तुत करने योग्य प्रयोग (आमतौर पर मात्रात्मक आँकड़े, लेकिन हमेशा नहीं) और सिद्धांतों या तथ्यों के बीच संबंधो में देखे गए आँकड़े (आमतौर पर समीकरण, लेकिन हमेशा नहीं) (नेल्सन, 1959)।

शोध के प्रकार

सामाजिक विज्ञान में विभिन्‍न प्रकार के शोध देखे जाते हैं। आइए, इनमें से प्रत्येक पर संक्षेप में चर्चा करें।

मूलभूत शोध : मूलमूत शोध या शुद्ध शोध अपने निमित्त ही झान प्राप्ति के उद्देश्य से किया जाता है। शुद्ध शोघकर्ता नई-नई अवधारणाएँ और संकल्पनाएँ सुझाते हैं, जो कि प्रचलित सिद्धातों में अपने समावेश से उन्हें सुधार सकती हैं अथवा नए सिद्धांतों की ओर अग्रसर कर सकती हैं। दूसरे शब्दों में, स्वभावत: मूलमूत नई अवधारणाओं का नवोन्मेष और साथ ही, पुराने सिद्धांतों को एकाएक प्रस्तुत किया जाना शुद्ध शोधकर्ताओं को वास्तव में ऐसे सिद्धांतों के किसी भी प्रत्यक्ष परिणाम अथवा प्रभाव या फिर व्यावष्टारिक प्रयोग की अपेक्षा किए बिना ही प्रधुरता से ज्ञान में वृद्धि करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

अनुफ्रकुक्त शोध : अनुप्रयुक्त शोध या व्यावहारिक शोध अभ्यास सिद्ध अनुप्रयोग अथवा प्रयोग के लिए जानकारी एकत्र करने की आयश्यकता पर आधारित होता है। इस प्रकार के शोध से जुडे समाजशास्त्री, उदाहरण के लिए, स्वयं को आतंकवाद, मानव तस्करी, बच्चे और नशीली दवाएँ, बाल अपराध, वैवाहिक विवाद तथा परिवारों के बीच संपत्ति विवाद जैसी विभिन्‍न सामाजिक समस्याओं के अध्ययन में लगा सकते हैं। शुद्ध शोध से मिन्‍न, व्यावहारिक शोध सामाजिक समस्याओं का अध्ययन कर समाधान पाने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य सामाजिक समस्याओं से निपटने के लिए शोध परिणाम लागू करना होता है।

अन्वेषबणात्मक शोध : अन्येषणात्मक शोध या परक शोध विशिष्ट रूप से किसी नए अथवा अपेक्षाकृत अल्प-अन्वेषित प्रतिवेश, समूह अथवा परिघटना का “पता लगाने” उससे संबंधित हमारी समझ को बढ़ाने के लिए करवाया जाता है। इसका प्रयोग किसी शोध विषय पर परिज्ञान प्राप्ति के लिए किया जाता है। परिणामतः अन्येषणात्मक शोध उन अध्ययनार्थ व्यक्तियों का अपेक्षाकृत छोटा नमूना ही प्रयोग में लाता है जिनसे शोधार्थी प्रत्यक्ष सूचना प्राप्त कर पाए। विषय की गहरी समझ विकसित करने के लिए शोधार्थी को प्रत्येक के लिए अलग-अलग गहन साक्षात्कार आयोजित करने होते हैं।

प्रकोगात्मक शौध : प्रयोगात्मक शोध या प्रायोगिक शोध शोधार्थियों का उत्कृष्ट विकल्प तब होता है जब हम किसी विशिष्ट समस्‍या का कारण और प्रभाव ज्ञात करना चाहते हों। विशेष रूप से, किसी दी गई दशा में समस्या की व्याख्या उपलब्ध कराने के लिए इस शोधार्थी यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि “»" ही “8” का कारण है अथवा “8” का परिणाम केवल “&" ही होता है। ये प्रयोग प्राकृतिक / वास्तविक दशाओं की बजाय प्रयोगशाला प्रतिवेश में किसी निर्मित / स्थापित दशा में होते हैं अथवा किए जाते हैं। ऐसे प्रयोग पूर्व-निर्धारित दशाओं के तहत स्वतंत्र चरों में हेर-फेर करके किए जाते हैं।

वर्णनात्मक शोध : वर्णनात्मक शोध किसी सामाजिक स्थिति - सामाजिक प्राधार की किसी घटना का वर्णन करता है। इस प्रकार के शोध में शोधार्थी जो ज्ञात करते हैं अथवा जो ये देखते हैं उसका यथासंभव सही-सही विवरण प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए किसी बाजार के वर्णनात्मक अध्ययन को लें। यहाँ शोधार्थियों से अपेक्षा होती है कि कुछ लोगों का साक्षात्कार करने के बाद जो वे देखते हैं और जो पाते हैं उसका वर्णन करें।विश्लेषणात्मक शोध : विश्लेषणात्मक शोध में शोधार्थी उस घटना से कहीं आगे जाकर विश्लेषण करता है जो वह देखता है। इस प्रकार का शोध उस घटना अथवा सामाजिक स्थिति के संदर्भ को समझकर ही किया जाता है जिसका वह अध्ययन कर रहा होता है। यहाँ वह यह मानकर चलता है कि वह जो देख जा रहा है, उससे अधिक भी कुछ होता है। प्रायः शोधार्थी उस घटना अथवा सामाजिक दशा के संदर्भ, कारणों और निहितार्थों की खोज करता है।

मूल्यांकन शोध : मूल्यांकन शोध किसी सामाजिक कार्यक्रम अथवा नीति के गुणों अथवा प्रभावों का आकलन करने का प्रयास करता है। इस प्रकार का शोध किसी विशिष्ट कार्यक्रम अथवा नीति के “निष्कर्ष” अथवा परिणाम जानने में रुचि रखता है। मूल्यांकन शोध के महत्वपूर्ण मूलभूत तत्वों में शामिल हैं - कार्यक्रम की प्रभावशीलता, उसकी प्रभावकारिता (लागत लाभ के लिहाज से) और क्‍यों,” क्या कार्यक्रम को जारी रखा जाए? यह शोध आमतौर पर सामाजिक-आर्थिक विकास कार्यक्रमों और उनके समग्र निष्पादन एवं प्रभाव से सरोकार रखता है। शोधकर्ता किसी भी कार्यक्रम का मूल्यांकन करते समय आचार-विचार एवं मूल्यों का कार्यक्रम में सदा समावेश करे और अपने सहयोगियों को सबसे आगे रखे।

सहभागी कार्रवाई शोध : सहमागी कार्रवाई शोध या भागीदारी कार्रवाई शोध में किसी समुदाय के सदस्य शोध प्रक्रिया में शामिल किए जाते हैं। इस प्रकार के शोध का उद्देश्य उस समुदाय के जीवन में परिवर्तन लाना होता है जिसका शोधार्थी अध्ययन कर रहे होते हैं। तब स्वाभाविक रूप से समुदाय के ही सदस्यों को शामिल किया जाना उचित होता है। इसका निहितार्थ होता है - शोधार्थी और स्थानीय लोगों के बीच संयुक्त प्रयास और घनिष्ठ सहयोग।

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