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रेडियो की शक्ति, क्षमता और प्रभाव पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

 रेडियो की शक्ति

रेडियो जनसंचार का एक ऐसा माध्यम है जिसका प्रवेश घर-घर में और हर तबके तक है। इसलिए रेडियो पर कही एक बात सैकड़ों, लाखों और करोड़ों लोगों तक पहुँचती हैं। इससे करोड़ों लोग प्रभावित हो रहे हैं। उसकी ताकत का अनुमान आप खुद कर सकते हैं।

रेडियो : क्षमता.और प्रभाव

रेडियो की क्षमताओं और प्रभाव को जानने के लिए आवश्यक है कि हम जानें कि लोग रेडियो क्‍यों सुनते हैं ?

श्रोताओं के लिए रेडियो की भूमिका बहुआयामी है। अधिकांश लोगों के लिए वह मनोरंजन का सस्ता साधन है। कुछ सूचना प्राप्ति के लिए उसे सुनते हैं। शिक्षा के लिए भी रेडियो सुना जाता है। क्या रेडियो के इतने ही उपयोग हैं? जनसंचार विशेषज्ञों की राय में रेडियो कई अन्य कारणों से भी सुना जाता है।

क्‍या आप जानते हैं कि कुछ लोग “नेपथ्य शोर" - (बैंक ग्राउंड नॉइज ) के लिए रेडियो सुनते हैं ? सन्‍नाटे में हम रह ही नहीं सकते। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि खामोशी और अंधकार आदमी को उबाते हैं। इसीलिए आदमी को शोर चाहिए। "नेपथ्य शोर" उसे आत्मबल प्रदान करता है। लगता है वह अकेला नहीं है। रात की पाली में काम करने वाले लोग रातभर रेडियो सुनते हैं। देर रात तक पढ़ाई करते छात्रों का साथी भी रेडियो ही है। गृहणियों के लिए रेडियो एक सुखद साथी है। बड़े -बूढ़ों और दृष्टिहीनों का सहारा भी रेडियो है।

लोग सिर्फ गानों के लिए रेडियो नहीं सुनते | गाने तो सीडी प्लेयर या एमपी-3 प्लेयर पर भी सुने जा सकते हैं। सीडी बार-बार बदलना पड़ता है। रेडियो यह काम अपने आप करता है। वह गानों के बीच-बीच में रोचक सूचनाएं भी देता है। समाचार भी सुनाता है।

रेडियो दिन भर की गतिविधियों के साथ घड़कता है। ऋतु और मौसम के साथ खिलता और मुरझाता है। सुबह होते ही यह श्रोताओं को इस बात के लिए मानसिक रुप से तैयार करता है कि दिन कैसा बीतेगा? वह सचेतक का काम करता है। रात्रिकालीन रेडियो समान्यतः आश्वस्त करने वाला और शांति प्रदायक होता है।

रेडियो अच्छा "साथी" भी है। वह बिना बहस के बहस करता है। वह सामान्य चर्चा से पैदा होने वाली बोझिलता और सामाजिक अकेलेपन की भावना को घटाता है। वह खुद ही सवाल करता है और उत्तर भी देता है।

रेडियो श्रोताओं के "मूड" का ध्यान रखता है। वह 'मूड' को बदल भी सकता है। अच्छा संगीत मन को शांति देता है। काम करते सनय थिरकन भरा संगीत मूड बनाता है। वह अंग-अंग को थिरकाता है। अध्ययन, मनन और चिंतन में भी संगीत का असर अच्छा होता है।

रेडियो सोशल लुब्नीकेंट (सामाजिक स्नेहक) का काम भी करता है। वह जड़ता को तोड़ता है। बातचीत का मसाला प्रदान करता है। रेडियों लोगों को घटनाओं में सहभागी बनने का मौका देता है। चर्चा और टीका-टिप्पणी के लिए प्रेरणा देता है।

रेडियो का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरह का हो सकता है। सकारात्मक प्रभाव के रूप में रेडियो ने कृषि, स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, शिक्षा और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की प्रगति में योगदान देने के लिए लोगों को प्रेरित किया है। शब्ट्रीय विकास की सूचना देकर उसके लोगों का ध्यान परिवर्तन की आवश्यकता पर केन्द्रित किया है। विकास की प्रक्रिया में सहभागी बनने की प्रेरणा दी है। रेडियो ने लोगों को विकास के लिए आवश्यक कौशल और तकनीकों को सिखाने को प्रयास भी किया है।

रेडियो का नकारात्मक प्रभाव भला क्‍या हो सकता है ? जर्मनी के प्रो. होल्जमर की राय में रेडियो व्यक्ति के केवल एक संवेदी अंग - कान को सक्रिय बनाता है। इसके दो विपरीत प्रभाव हो सकते हैं! पहला, व्यक्ति निरंतर उद्दीपनों के कारण सतही हो जाता है। दूसरा, श्रोताओं को एक लयबद्ध चाबुक की जरूरत महसूस होती है। उन्हें लगता है कि वे उसके बिना तन्‍्मयता से काम नहीं कर पाते।

रेडियो से जुड़े लोगों का यह दायित्व होता है कि वे लोगों में रेडियो का सकारात्मक प्रभाव पैदा करने वाले कार्यक्रम तैयार करें और राष्ट्र के विकास में योगदान दें।

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