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भारत में स्त्रीवादी इतिहास लेखन पर एक टिप्पणी लिखिए।

महिलाओं के इतिहास की मुख्य प्रवृत्तियों की समीक्षा आज के समय के लिए उपयुक्त है। कामचलाऊ सूत्रीकरणों तथा सामान्य पुनर्पाठन से बहुत हद तक अब यह स्पष्ट हो चुका है कि कमजोर संस्थागत आधार के बावजूद महिलाओं के इतिहास की शुरुआत हुई। पिछले दशक के दौरान महिलाओं के इतिहास के क्षेत्र में कुछ अत्यंत उत्कृष्ट काम सामने आए, जिन्होंने मुख्यधारा के इतिहासकारों को इसे मान्यता प्रदान करने तथा कभी-कभी तो इन नारीवादी दिद्वानों द्वारा तैयार किए बाजार का लाभ उठाने के लिए मजबूर किया।

नारीवादी विद्वानों के द्वारा जो पहला महत्त्वपूर्ण काम किया गया, उनमें एक प्राचीन भारत में और विशेष रूप में वैदिक काल के समय हिन्दू नारीत्व के गौरव को जो राष्ट्रवादी आख्यान प्रस्तुत किया जाता था, उसे इन विद्वानों के द्वारा ध्वस्त किया गया है हिन्दू वैदिक नारी को आर्य तथा दासी नारी के रूप में विभाजित कर अलग-अलग सामाजिक स्थितियों के अनुसार अलग-अलग इतिहासों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण सुधार था, क्योंकि जहाँ समाज के स्तरीकरण की दृष्टि से लिंगभेद संबंधी तत्त्व को इसमें शामिल करना आवश्यक था, संभवत: उतना ही यह भी आवश्यक था कि खुद महिलाओं के स्तर पर जो वर्गीकरण किया गया है उसे भी सामने उपस्थित किया जाए। राष्ट्रवादियों के द्वारा हिन्दू/वैदिक या आर्य नारी का जो वर्गीकरण किया गया था और इस तरह वास्तविक विभेद को छिपाया गया था, वह प्रकट हो गया। इसके साथ ही महिलाओं के विशिष्ट सामाजिक इतिहासों की रूपरेखा कौ आवश्यकता को भी सामने लाया गया।

इस प्रकार हम पाते हैं कि इन प्रारम्भिक वर्षों में प्रमुख प्रवृत्ति इतिहास की मुख्यधारा के आख्यानों के साथ महिलाओं का पूरक इतिहास लिखने की थी। महिलाओं के इतिहास को विभिन्न क्षेत्रों में और संघर्ष विभिन्न रूपों में रखकर वर्ग के संदर्भ में महिलाओं के विशिष्ट अनुभवों को लिंगभेद संबंधी विश्लेषण के लिए प्रयोग में लाया गया।

महिलाओं का इतिहास लिखने के समय जो एक अन्य बात पर बल दिया गया, वह थी महिलाओं के लेखन को उजागर करना तथा इतिहास में से खोजकर उन लेखकों को संकलित करना, जो बहुत दुष्कर कार्य था। आम रूप में मुख्यधारा के इतिहास पर भरोसा किए जाने वाले स्त्रोतों में पुरुषवादी पूर्वाग्रह को ध्यान में रखें तथा वैकल्पिक स्रोतों को खोजने में नारीवादी इतिहासकारों द्वारा झेली गई कठिनाइयों पर ध्यान दें तो माना जाएगा कि इस तरह का संकलन तैयार करना बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके परिणामस्वरूप कुछ ऐसे स्रोतों को समाप्त करने की प्रथा समाप्त करने में मदद मिली, जिन्हें बहुत विश्वनीय नहीं मानते हुए भी आधिकारिक स्तर पर उन्हें इसलिए स्वीकृति मिलती थी, क्योंकि वे सत्ता के बहुत नजदीक थे। इसी के साथ एक महत्त्वपूर्ण समानांतर घटना यह हुई कि महिलाओं के लेखन से जो संबंधित कुछ अत्यन्त समृद्ध तथा संवेदनशील पाठ्य-सामग्री का प्रकाशन हुआ।

महिलाओं के इतिहास और नए लेखन से प्राप्त अंतर्दृष्टि पर एक नजर देने से प्रत्यक्ष रूप में यह पता चलता है कि भारत के इतिहास को कालक्रम के अनुसार प्राचीन, मध्यकालीन और अर्वाचीन के रूप में बाँटते समय लिंगभेद को आमरूप में सभी जगहों पर विश्लेषण के उपकरण के रूप में असमान रूप में प्रयोग किया गया। नए लेखन का बहुत बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक तथा उत्तर औपनिवेशिक भारत के लिए किया जाता रहा है तथा प्राचीन भारत के लिए बहुत ही कम तथा मध्यकालीन भारत के लिए तो और भी बहुत कम इस प्रकार का लेखन देखने को मिलता है। कुछ हद तक इसका एक कारण यह हो सकता है कि शास्त्रीय भाषाओं के ज्ञान की जरूरत जिनमें इस काल के दौरान उपलब्ध स्रोत लिखे गए हैं। लेकिन कुछ हद तक यह भी कारण हो सकता है, क्योंकि समकालीन सरोकार वही थे, जिन पर औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक भारतीय समाज पूर्ण रूप में केन्द्रित था। इसका अर्थ व्यवहार में यह है कि इस काल को उन्हीं भारतविदों पर छोड़ दिया जाता है, जिनका दृष्टिकोण बहुत ही शास्त्रीय था और जो यह मानने के लिए कतई तैयार नहीं थे कि कुछ दूसरे इतिहास भी हो सकते हैं।

लेकिन फिर भी कुछ ऐसे पथ प्रदर्शक कार्य किए गए, जिन्होंने एकाधिकार तरीकों से नई जमीन की तलाश की थी। प्राचीन भारत के राजतंत्र के अभ्युदय के विषय में कुमकुम राय द्वारा किया गया हाल का अध्ययन इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सिर्फ उन्हीं स्रोतों का इस्तेमाल किया गया है, जिन पर भारतविदों की निर्भरता थी अर्थात उस काल के प्रासंगिक ब्राह्मण ग्रंथ, लेकिन इनकी जाँच-पड़ताल में उन्होंने एकदम भिन्न तरीका अपनाया। इस अध्ययन में समाज के विभिन्न स्तरों के बीच आपसी संबंध की भी छानबीन की गई है, जिससे उन प्रक्रियाओं का पता लगाया जा सकता है, जिनके अध्ययन से श्रेणीबद्धता स्थापित की गई और ब्राह्मण ग्रंथों तथा रीति-रिवाजों का इस्तेमाल करते हुए इस श्रेणीबद्धता को वैधानिक रूप प्रदान किया गया है। एक बार यह संरचना तैयार हो जाने के बाद राजा को राज्य के उत्पादक तथा पुनरोत्पादक संसाधनों का वैध नियंत्रक माना गया। इसी के साथ यजमान को, जिसकी ओर से सारे कर्मकाण्ड किए जाते थे, यह स्वीकार किया गया कि वह परिवार की उत्पादक तथा पुनरुत्पादक संसाधनों का नियंत्रक है। कुमकुम राय के इस कार्य का अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इनके लिंगभेद आधारित इतिहास और मुख्यधारा के इतिहास के बीच के मुद्दे। लेकिन तत्काल काम-काज की दृष्टि से आवश्यक विभाजनों को तोड़ दिया। इसने प्रदर्शित किया कि अगर विश्लेषण की श्रेणी में लिंगभेद संबंधी पहलू को शामिल किया गया तब अतीत की हमारी समझ को किस तरह विस्तार मिल सकता है और इसे समृद्ध बनाया जा सकता है।

अवधारणा के स्तर पर जिन अन्य मुद्दों की खोजबीन की गई उनमें जाति, वर्ग, पितृसत्तात्मकता तथा राज्य के बीच संबंध तथा प्राचीन भारत में परिवार संस्था की गतिशीलता शामिल हैं। इस प्रकार के अध्ययनों के अतिरिक्त जिनमें अन्य संस्थाओं के संदर्भ में लिंगभेद के संबंधों के स्तर की खोज की गई है। कुछ ऐसे अध्ययन भी हैं, जिनमें मिथकों तथा अन्य आख्थानों, वेश्यावृत्ति, मातृत्व, कामगार महिलाएँ, संपत्ति संबंधों उपहार के रूप प्रदत्त महिलाएँ और शासकों के रूप में महिलाओं के अलग-अलग स्वरूपों का अध्ययन शामिल है। इन विवरणों के द्वारा कम-से-कम एक आधार का निर्माण किया गया, जिसने नई दृष्टि विकसित की तथा उस परिधि को समाप्त किया, जिसने प्राचीन भारत के संदर्भ में महिलाओं के इतिहास को चारों तरफ से घेर रखा था, हमारी समझ को सीमित करने वाला एक मुख्य दोष यह रहा है कि हम यह नहीं देख पाते हैं कि किसी विशिष्ट सामाजिक बनावट में किस तरह अन्य ढाँचे लिंगभेद को आकार देते हैं। 

प्राचीन भारतीय इतिहास के विषय में लिंगभेद आधारित रूपरेखा को अध्ययन के लिए काम में लाया गया, लेकिन मध्यकालीन भारतीय इतिहास के विश्लेषण में यह पद्धति नहीं अपनाई गई है। यहाँ तक कि महिलाओं का इतिहास जो मुख्यधारा के इतिहास के पूरक का काम करती है, कभी भी योजनाबद्ध ढंग से नहीं लिया गया है। ऐसा शायद इसलिए हुआ, क्योंकि जिन विद्वानों ने विश्लेषण के लिए लिंगभेद को एक उदाहरण के रूप में चुना उनकी फारसी पर महारत नहीं की जबकि मध्यकालीन भारतीय इतिहास के लिए उपलब्ध स्रोत मुख्य रूप में फारसी भाषा में ही थे। हाल के दिनों में बहुत धीमे स्तर पर एक शुरुआत हुई है, लेकिन जो काम किए गए हैं वह अवधारणात्मक न होकर काल के विशेष से संबंधित हैं। अमेरिका के दिद्वानों में जो लोग दक्षिण एशिया के विशेषज्ञ हैं, उन्होंने इस दिशा में कुछ महत्त्वपूर्ण काम किए हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश अनुभवात्मक हैं और इन्होंने विशेषण के लिए व्यापक मुद्दों को नहीं लिया है। लिंगभेद आधारित दृष्टिकोण को नहीं अपनाया इस कारण भी दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि मध्यकालीन भारत के स्रोतों की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। यही देखा गया है कि लिंगभेद की दृष्टि से कभी इन स्रोतों का किसी क्रम से अध्ययन नहीं किया गया। भक्तिकाल की कविता और इस काल में मीराबाई को जिस तरह कुमकुम ने अपने अध्ययन में प्रस्तुत किया तथा विश्लेषित किया, वह एक उदाहरण है कि किस प्रकार मध्यकाल के भारत के साहित्य और व्यक्ति को इतिहास का रूप दिया गया। संगारी ने परिवार, नाते-रिश्ते और राज्य का जो विश्लेषण प्रस्तुत किया उससे स्पष्ट संकेत प्राप्त होता है कि लिंगभेद संवेदी इतिहास का लिखा जाना संभव है। आज इसके विविध विषयों पर अध्ययन किया जाना सौभाग्य की बात है जैसे कि भाषा में लिंगवाद भू-स्वाभित्व, विरासत, शाही घरानों की राजनीति, बहुपत्नी वाले परिवारों में महिलाओं के विरुद्ध महिलाओं की स्थिति तथा बदलते हुए आख्यान, जिन्होंने दुर्लभ वीरांगना का मॉडल प्रस्तुत किया। संभवत: इन तथा इन जैसे अन्य अध्ययनों को एक साथ मिलाया जा सकता है तथा इन सबको साथ लेकर मध्यकालीन भारत में लिंगभेद आधारित संबंधों की व्यापक समझ विकसित की जा सकती है।

प्राचीन तथा मध्यकालीन भारत दोनों में लिंगभेद संबंधी इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण खामी क्षेत्र आधारित अध्यनों की अनुपस्थिति है। तमिल साहित्य के कुछ अनुसंधानों और प्राचीन तथा मध्यकालीन दक्षिण भारत के कुछ अभिलखों को छोड दिया जाए तो हमारे पास कुछ ऐसी बहुत कम सामग्री है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों के सामाजिक संगठनों तथा उसके द्वारा उन क्षेत्रों में लिंगभेद आधारित संबंधों को कोई स्वरूप प्रदान करने के बीच हम संबंधों की स्थापना कर सकें। महिलाओं के इतिहास के विषय में और भी व्यापक खोज औपनिवेशिक तथा उत्तर औपनिवेशिक काल में संभव हुआ। यह स्रोत जिन भाषाओं में उपलब्ध हैं वह अपेक्षाकृत ज्यादा सुलभ हैं तथा स्रोतों को अच्छी तरह से संभालकर रखा गया है। परिणामस्वरूप नारीवादी विद्वान न केवल इतिहास में महिलाओं को सम्मिलित करने में सफल हुए बल्कि उन्हें विभिन्न सामाजिक, आर्थिक प्रक्रियाओं में तथा लिंगभेद के बीच छानबीन में भी सफलता प्राप्त हुई। वे कुछ विषयों की तह तक भी कुछ हद तक जा सके तथा राष्ट्रवाद, वर्ग संगठन तथा संचालन के विषय में ऐतिहासिक विषयों में भी अपनी छाप स्थापित की।

इस अवधि में महिलाओं के इतिहास में अनुसंधान के अपेक्षाकृत जो अधिक दुर्गम क्षेत्र थे, उनमें से एक उस तरीके का विश्लेषण था, जिससे नए औपनिवेशिक संरचना में, विशेष रूप से कानून के क्षेत्र में महिलाओं के जीवन को आकार प्रदान किया। उल्लेखनीय परिणाम में किए गए लेखन में कुछ विशिष्ट कानूनों के कामकाज की छानबीन की गई, जैसे कि विधवा पुनर्विवाह कानून, कानूनों के निर्माण तथा वर्गीकरण के पीछे की ताकतों तथा प्रेरक शक्ति, वैधानिक प्रणालियों के विभिन्न समूहों जैसे कि प्रचलित कानूनों तथा विधिसम्मत कानूनों तथा व्यक्तिगत कानून के उपयोगों के बीच अंतर्विरोधी का पता लगाया गया तथा सामाजिक रीति- रिवाजों तथा सांस्कृतिक व्यवहार की विविधता में एकरूपता स्थापित करने की दिशा में प्रयास किया गया। बीना अग्रवाल के द्वारा किए गए एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथा विस्तृत अध्ययन में इस बात पर ध्यान केन्द्रित किया गया कि जमीन के रूप में उत्पादक संसाधनों को महिलाओं के लिए सुलभ बनाने से इन्कार करके लिंगभेद पर आधारित संबंधों को कानून के द्वारा एक स्वरूप प्रदान किया गया। इस प्रकार उन्होंने महिलाओं की सामाजिक दुर्बलता के संदर्भ में राजनीतिक अर्थशास्त्र की एक समझ हमें प्रदान की है। इनमें से कुछ अध्ययन अनुभवजनित हैं। जबकि अन्य अध्ययनों में ऐतिहासिक संदर्भों, वर्ग, गतिशीलता तथा समय-समय पर उपनिवेशवादियों और राष्ट्रवादियों की विचारधाराओं में कानून के संदर्भों की छानबीन की गई है। इस अध्ययन में एक औपनिवेशिक राष्ट्रवादी प्रभुत्वकारी एजेडों की संभावनाओं और सीमाओं को भी उद्घाटित किया गया है।

अनेक पुस्तकों तथा लेखों में महिलाओं की शिक्षा को विषय बनाया गया है। प्रारम्भ में विद्वानों ने अलग-अलग चरणों के विषय में वर्णन किया है कि सामाजिक सुधार आन्दोलनों का क्या संदर्भ था, जिसके माध्यम से महिलाओं की शिक्षा के अवसर पैदा किए गए तथा उसका विस्तार किया गया। इसके सकारात्मक मुक्तिकारी तथा रूपांतरकारी क्षमता को स्वीकार करते हुए उन दिनों महिलाओं की शिक्षा के लिए पुरुषों द्वारा चलाए गए अभियान वास्तविक रूप में उदारवादी जान पड़ते थे। शायद इनमें पितृसत्तात्मक थी। लेकिन यह माना गया कि शिक्षा के अध्ययन से ही महिलाओं को विभिन्न वंचनाओं से मुक्ति प्राप्त हो सकती है। इन अध्ययनों को नई पितृसत्तात्मकता और वर्ग संरचनाओं की प्रक्रियाओं तथा स्कूली शिक्षा प्रदान करने के बीच के संबंध के संदर्भ में अब शिक्षा की महत्त्वपूर्ण भूमिका या दूसरे अर्थों में कहा जाए तो स्कूलिंग की भूमिका की छानबीन के लिए चुना गया है।

इस बात का भी प्रारूप तैयार किया गया है कि महिलाओं को शिक्षा प्रदान करने में पुरुषों की कौन-सी चीजें दाँव पर लगी थीं। तथा अनेक प्रकार के संक्रमण की प्रक्रिया में संघर्षरत परिवार में महिलाओं का कैसा प्रतिरोध का स्वरूप था। महिलाओं के लेखन की बारीकी से छानबीन करने के पश्चात इनमें से कुछ विश्लेषणों को संभव बनाया जा सकता है। महिलाओं को चूँकि साक्षरता और शिक्षा के क्षेत्र में ला दिया गया, जिनमें से अधिकांश अपने पतियों की प्रेरणा से आईं लेकिन कभी-कभी पतियों की स्वीकृति के बिना भी आईं तथा इनमें से कुछ के द्वारा लेखन का भी काम किया गया।

इसके अतिरिक्त इतिहास के पुनर्लेखन में कामगार महिलाओं के इतिहास को भी शामिल करने का प्रयास किया गया। किसान संघर्षो में उनकी भागीदारी के विवरण तथा जिन मुद्दों को उठाया गया तथा जिन मुद्दों को दबा दिया गया उनके विषय में महिलाओं की अनुभूति उन दिनों में किसानों के संघर्ष की स्थिति के अध्ययन के वर्ग और लिंगभेद से संबंधित मुद्दों के बीच जटिल संबंधों का पता चलता है तथा वर्ग उत्पीड़न एवं लिंगभेद आधारित उत्पीड़न उजागर करने में वामपंथी समूहों की रणनीति की बू आती है। नारीवादी विद्वानों के अनुसार महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता से संबंधित प्रारम्भिक इतिहासों में केन्द्रीय महत्त्व की बात है। यौन राजनीति का सवाल तथा व्यापक संघर्षों के साथ इनके जटिल संबंधों की पड़ताल अर्थात ऐसे संघर्ष जिनमें महिलाओं की जरूरत थी, जिनमें उन्हें गोलबंद किया गया, उन्हें एक राजनीतिक और सार्वजनिक पहचान दी गई है और फिर भी बड़ी बारीकी से उनकी भूमिका को पचा लिया और अपने खुद के अधिकारों के लिए उनके काम को दरकिनार कर दिया गया।

एक वैकल्पिक इतिहास निर्माण में भी महिलाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। महिलाएँ, बच्चे और दलित के नजरिए से इन इतिहासों को लिखा गया है। इनके द्वारा समुदाय की अवधारणा के संदर्भ में राज्य की विचारधारा को लेकर निर्णायक प्रश्न खड़े किए हैं और महिलाओं की वापसी तथा पुनर्वास के संदर्भ में उनके सम्मान को लेकर प्रश्न खड़े किए गए हैं।

महिलाओं की शक्ति का विषय नारीवादी विद्वानों से संबंधित व्यापक विषयों का एक हिस्सा है, जिसका सरलीकरण किया गया है। एक अलग प्रकार के इतिहास-लेखन की इच्छा ने नारीवादी विद्वानों को इसके लिए प्रेरित किया है कि वे व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में महिलाओं द्वारा किए गए प्रतिरोधों के इतिहास की खोज करें तथा महिलाओं पर पुरुषों के स्वामित्व की खोज करें। लखनऊ की तबायफों द्वारा अपनाई गई रणनीतियों को कभी भी विद्रोह नहीं माना जा सकता है, क्योंकि इस तरह की घटनाओं ने पितृसत्तात्मक विचारधारा को ही मजबूती प्रदान की है। यह भी ध्यान देना जरूरी है कि भारत में नारीवादी लेखन के संदर्भ में किसी भी क्रिया के राजनीतिक नतीजों तथा सैद्धान्तिक सूचीकरण का स्वरूप क्या है। इतना जरूर है कि हाल के लेखन ने महिलाओं की शक्ति को खोज करने का एक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया है।

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