अनेक इतिहासकारों ने कृषि सांख्यिकी अर्थात् कृषि उत्पादन के संदर्भ में अनुमान व्यक्त किये हैं। भारत के कृषि क्षेत्र के बारे में ठीक-ठीक जानकारी उपलब्ध न हो पाने के कारण और इन इतिहासकारों के दृष्टिकोणों में अंतर के कारण कृषि उत्पादन से सम्बन्धित इन विभिन्न अनुमानों में भी अंतर पाया जाता है। जॉर्ज बिलयन ने सरकारी आंकड़ों को आधार बनाकर 1891 से 1946 के बीच भारत में कृषि उत्पादन का अनुमान व्यक्त किया। उल्लेखनीय है कि कृषि उत्पादन पर किया गया बिलयन का अध्ययन अखिल भारतीय कृषि उत्पादन का सबसे व्यापक अनुमान है। तत्पश्चात् के. मुखर्जी और एस. शिव सुब्रमोनियन ने अपनी कुछ मान्यताओं के आधार पर कृषि उत्पादन के बारे में अपने कुछ अनुमान व्यक्त किये थे, जो जॉर्ज बिलयन के अनुमानों से भिन्न थे, किन्तु अनुमानों में भिन्नता होते हुए भी ये सभी कृषि उत्पादन की एक ही दिशा और प्रवृत्ति को बताते हैं। इन सबके बावजूद अंग्रेजी शासनकाल के पिछले 60 वर्षों के दौरान वाणिज्यिक फसलों के प्रतिव्यक्ति उत्पादन में कमी आई। प्रो. हेस्टल इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं। प्रो. हेस्टल ने भी कृषि उत्पादन के सम्बन्ध में अपने अनुमान दिये हैं। प्रो. हेस्टल के अनुमानों के अनुसार 1860 से 1920 की अवधि के दौरान खाद्यान्नों और कुल कृषि उत्पादन दोनों में ही काफी तेजी से वृद्धि हुई थी। इन दोनों की वृद्धि जनसंख्या में हुई वृद्धि से अधिक थी, किन्तु 1920 के बाद खाद्यान्नों के उत्पादन में तो जनसंख्या की तुलना में कम दर से वृद्धि हुई किन्तु गैर-खाद्य फसलों के उत्पादन में जनसंख्या की तुलना में अधिक तेजी से वृद्धि होती रही। परिणामस्वरूप पिछली अवधि की तुलना में कुल कृषि उत्पादन की कुल वृद्धि दर कुछ धीमी पड़ गई। हेस्टल ने उत्पादन सीरिज के मानक उत्पादन के आधिकारिक आंकड़ों और मौसमी अवस्था घटक के तत्त्वों को अविश्वसनीय मानते हुए जॉर्ज बिलयन की उत्पादन सीरिज की आलोचना की। क्लाइव डेवी ने प्रशासनिक आंकड़ों कौ विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया। एम.एम. इस्लाम तथा कॉर्ल प्रे ने क्रमश: बंगाल तथा पंजाब के कृषि उत्पादन के आंकड़ों में संशोधन करने की कोशिश की। कॉर्ल प्रे ने कृषि उत्पादन के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए बताया कि आंकड़ों को वास्तविकता से कम करके प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने इन अनुमानों में प्रौद्योगिकी की भूमिका को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।
जॉर्ज बिलयन के आंकड़ों के आलोचकों ने मानक पैदावार तथा मौसमी अवस्था पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। हेस्टन ने आधिकारिक उत्पादन आंकड़ों को आत्मनिष्ठ कहा। उन्होंने इन आंकड़ों को प्रशासनिक पूर्वाग्रह से प्रेरित बताया। हेस्टन ने अपनी आलोचना का शिकार मानक उत्पादन आंकड़ों को बनाया। उनके अनुसार मानक उत्पादन आंकड़े जो फसल कटाई से सम्बन्धित थे, में भारी कमियां थीं। हेस्टन ने राजस्व में छूट को भी प्रशासनिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त बताया। उनके अनुसार प्रशासनिक अधिकारी राष्ट्रवादी तत्त्वों को कमजोर करने के लिए कम उत्पादन तथा अधिक राजस्व छूट दिखाने को तत्पर रहते थे। हेस्टन ने आधिकारिक कृषि उत्पादन के आंकड़ों को अप्रामाणिक मानते हुए सम्पूर्ण अवधि में स्थिर उत्पादन प्राप्त करने के लिए खाद्यान्न फसलों के गिरते हुए उत्पादन की प्रक्रिया को त्यागने की सलाह दी। उनके अनुसार कपास, गन्ना और चाय जैसी फसलों के उत्पादन में वृद्धि देखी गई। इसके अलावा उन्होंने आधिकारिक उत्पादन आंकड़ों के संरक्षण का समर्थन किया।
आर.सी. देसाई ने 1937-1948 के बीच की अवधि के दौरान फसलों के रुझान का अध्ययन करके यह बताया कि कटी हुई फसल की उपज की तुलना में प्रशासनिक आंकड़े वास्तविकता से कम करके आंके गए थे। इसके अतिरिक्त आर.सी. देसाई सदृश इतिहासकारों ने प्रशासनिक आंकड़ों को सही ठहराया। इतिहासकार अश्विनी सेठ, अशोक देसाई तथा सुमित गुहा आदि ने हेस्टन के प्रशासनिक पूर्वाग्रह के आरोप को अतार्किक करार दिया। उल्लेखनीय है कि 1868 से 1947 के बीच हेस्टन का स्थिर उत्पादन का विकल्प कई मायनों में उपयुक्त है। हेस्टन के अनुसार, उत्पादन के आशावादी मूल्यांकन के विपरीत यथार्थ उपज में गिरावट की प्रवृत्ति पाई गई। अश्विनी सेठ इसे अंतरण प्रभाव कहते हैं। दूसरे शब्दों में, गेहूं की खेती को अ्सिंचित भूमि पर न करके सिंचित भूमि पर करना था। उल्लेखनीय है कि सिंचित क्षेत्र का उत्पादन असिंचित क्षेत्र की अपेक्षा दुगुना था। अंतरण प्रभाव की समाप्ति के बाद यथार्थ उपज में गिरावट की दीर्घकाल प्रवृत्ति देखी गई।
इस तरह 1890 से 1950 के बीच जॉर्ज ब्लियन के आंकड़े कृषि उत्पादन के संदर्भ में सबसे विश्वसनीय हैं। जॉर्ज बिलयन के ये आंकड़े सम्भवत: ब्रिटिश भारत के कृषि उत्पादन के महत्त्वपूर्ण पक्षों के रुझनों का सबसे अधिक विश्वसनीय आकलन है।
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