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सुमित्रानंदन पंत की छायावादी कविताओं की प्रमुख विशेषताएं बताइए।

छायावादी काव्य के आरंभिक दौर की कविताओं को पढ़कर आरंभ में कुछ विद्वानों ने उसके सम्बन्ध में तिरस्कार के भाव व्यक्त किए। आचार्य शुक्ल ने उसे काव्य-शैली या पद्धति विशेष कहा और सद्गुरुशरण अवस्थी ने उसमें केवल व्यंजना का चमत्कार देखा, परन्तु बाद में उसका प्रौढ़ रूप सामने आया तथा आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेन्द्र जेसे छायावाद के समर्थक आलोचकों ने उसकी विषयगत तथा शिल्पगत विशेषताओं का, छायावाद के उद्गम कौ पृष्ठभूमि पर विचार करते हुए उसके काव्य-गुणों की प्रशंसा की तथा स्वयं छायावादी कवियों ने अपने काव्य के विरुद्ध लगाए गए आरोपों का खंडन करते हुए लम्बी-लम्बी भूमिकाएं जैसे पंतजी की 'पल्‍लव' की भूमिका तथा महादेवी की “दीपशिखा' की भूमिका लिखी ओर स्वतंत्र लेख प्रकाशित कराए, जैसे-प्रसादजी का छायावाद पर लेख, तो छायावादी काव्य के गुण, उसकी विशेषताएं सामने आईं और उसे वह सम्मान प्राप्त हुआ, जिसका वह अधिकारी था।

आचार्य वाजपेयी ने छायावाद की व्याख्या करते हुए लिखा, “मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म किन्तु व्यक्त सोन्दर्य में आध्यात्मिक छाया का भाव मेरे विचार में छायावाद की एक सर्वमान्य व्याख्या हो सकती हे।”

छायावाद के दूसरे समर्थक डॉ. नगेन्द्र ने लिखा, “छायावाद एक विशेष प्रकार की भाव-पद्धति हे; जीवन के प्रति एक विशेष भावात्मक दृष्टिकोण है।”

डॉ. रामकुमार वर्मा, शान्तिप्रिय द्विबेदी छायावादी काव्य में प्रकृति में अनन्त सत्ता का दर्शन कर उसके प्रति कवियों के कोतूहल, जिज्ञासा को देखकर उसे रहस्यवाद से जोड़ते हैं। डॉ. वर्मा कहते हें, “ परमात्मा की छाया आत्मा में पड़ने लगती है ओर आत्मा की परमात्मा में। यही छायावाद हे।” शान्तिप्रिय द्विवेदी इस काव्यधारा में दार्शनिक अनुभूति देखते हें।

जयशंकर प्रसाद ने अपने निबन्ध में छायावादी काव्य की विशेषताएं बताते हुए लिखा है, “ ध्वयात्मकता, लाक्षणिकता, सौोन्दर्यमय प्रतीक-विधान तथा उपचारवक्रता के साथ स्वानुभूति की विकृति छायावाद की विशेषताएं हैं।”

स्वयं छायावादी कवियों तथा छायावाद के सहृदय आलोचकों के विचारों का अध्ययन करने के उपरान्त हम कह सकते हैं कि छायावादी काव्य की मूलभूत निम्नलिखित विशेषताए हें :

1. स्वानुभूति निरूपण

2. प्रकृति-प्रेम और नये प्रकार का प्रकृति चित्रण

3. प्रणय-भावना जो लौकिक, मांसल, शरीरी न होकर अतीन्द्रिय है, सूक्ष्म है, उदात्त हे

4. आध्यात्मिक तत्त्व

5. कल्पना की मुक्त उड़ान

6. नूतन अभिव्यंजना-पद्धति।

7. गीतात्मकता, नया छन्द-विधान।

पंतजी के काव्य में ये सभी विशेषताएँ मिलती हैं। हम एक-एक कर इन सबकी संक्षिप्त चर्चा कर रहे हें।

स्वानुभूति निरूपण-छायावादी काव्य का प्रमुख गुण हे-आत्माभिव्यक्ति या व्यक्तिगत अनुभूतियों का चित्रण। छायावादी कवियों ने अपने निजी जीवन और हृदय की आशा-निराशा, प्रणयभाव, प्रणय में प्राप्त असफलता के कारण विरह-व्यथा तथा सौन्दर्यानुभूति के विविध चित्र प्रस्तुत किए हैं। पंत जी की कविता “ग्रन्थि' में जीवन में आई एक किशोरी के प्रथम मिलन तथा उससे ग्रंथि-बंधन न हो सकने की कसक हे, टीस है। प्रथम भेंट के समय नायिका के सान्निध्य से प्राप्त होने वाली सुखानुभूति का चित्रण देखिए,

प्रिय बिना तम-शेष मेरे हृदय को

प्रणय कालिमा की तुम्हीं प्रिय कांति हो।

विगत संयोग-काल की मादक-मधुर स्मृतियों का चित्रण उनकी मनोदशा को साकार कर देता हेै। प्रेयसी के नव योवन एवं सौन्दर्य की जो छवि उनके मन पर अंकित हुई, उसका बड़ी चित्रमय भाषा में अंकन किया गया हे,

इन्दु पर, उस इन्दु मुख पर साथ ही

थे पड़े मेरे नयन जो उदय से

लाज से रक्तिम हुए थे-पूर्व को

पूर्व था, पर वह द्वितीय अपूर्व था।

प्रकृति के चित्रण-पंतजी की काव्य प्रेरणा का प्रमुख स्रोत प्रकृति का सुरम्य वातावरण रहा हे। कूर्मांचल प्रदेश के कौसानी गांव की नेसर्गिक प्राकृतिक शोभा ने उन्हें बचपन से ही आकृष्ट किया और इस प्राकृतिक परिवेश में रहने वाले कवि के कंठ से कविता की मंदाकिनी बहने लगी। प्रकृति के प्रति अपना आभार प्रकट करते हुए कवि स्वयं लिखता है, “कविता की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति-निरीक्षण से मिली, जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि कूर्मांचल प्रदेश को हे....... प्रकृति के साहचर्य ने जहाँ एक ओर मुझे सोन्दर्य, स्वप्न ओर कल्पनाजीवी बनाया, वहाँ दूसरी ओर जनमसि भी बना दिया।” अन्य छायावादी कवियों की तरह पंत जी प्रकृति को जड़ न मानकर चेतन, मानव के सुख-दुःख के प्रति संवेदनशील मानते हैं। अतः प्रकृति के मानवीकरण के अनेक चित्र पंतजी के काव्य में मिलते हें। कहीं संध्या की कल्पना एक सुन्दरी के रूप में की गयी है,

मौन, तुम रूपसि कौन?

व्योम से उतर रही चुपचाप

छिपी निज छाया में छवि आप

सुनहला फैला केश कलाप

मधुर, मंथर, मृदु मौन।

नारी भावना का आरोप करते हुए वह प्रकृति को कहीं सुन्दरी, कहीं देवी तथा कहीं सहचरी आदि रूपों में चित्रित करते हैं, कहीं उन्हें प्रकृति वाली उम्र की किशोरी दिखती है, तो कहीं वृक्ष की छाया उन्हें दमयन्ती प्रतीत होती है, प्रकृति का विराट्‌ सौन्दर्य कवि के मन में जिज्ञासा तथा कौतूृहल उत्पन्न करता हे। सूर्य की प्रथम किरण को देखते ही उन्हें लगता है कि कोई परम पुरुष का संदेश लेकर सूर्य की किरण पृथ्वी-तल पर अवतरित होती है और उसका सामीप्य पाकर पक्षी कलरव करने लगते हें,

प्रकृति को देखकर उनके मन में जीव, जगत्‌, ब्रह्म आदि के सम्बन्ध में विचार भी कौंधने लगते हैं-'एक तारा' कविता में संध्या समय पहला तारा और उसके बाद एकाएक असंख्य तारों को चमकते देख उन्हें उपनिषद के कथन “एको5हं बहुस्याम्‌' की स्मृति हो आती हे-

वह आत्म और यह जग दवर्श,

इसी तरह “नोका विहार' कविता के अन्त में जगत्‌ की शाश्वतता की ओर संकेत किया है,

नारी-सौन्दर्य और प्रणयानुभूति-पंतजी को प्रमुखतः प्रकृति और प्रणय भाव का चितेरा कवि कहा गया है। वह निसर्ग से सौन्दर्यप्रेमी हैं। प्रकृति का सोन्दर्य तथा नारी का कामिनी रूप उन्हें आकृष्ट करता रहा है। अतः प्राकृतिक सोन्दर्य के साथ ही उनकी दृष्टि नारी-सोन्दर्य की ओर आकृष्ट हुई है और उन्होंने अपनी लेखनी का तूलिका की तरह प्रयोग कर नारी की शोभा का चित्रण किया है। उनकी कविताएं “'ग्रंथ', 'आंसू' तथा “नारी रूप' शीर्षक कविताओं में रमणी के असंख्य अभिनव चित्र हें, परन्तु उनका नारी-सोन्दर्य का चित्रण रीतिकालीन कवियों के समान स्थूल, मांसल, शारीरिक एवं कामोद्दीपक नहीं है। वह नारी के अंगों का नख-शिख वर्णन की पद्धति पर चित्रण न कर उसकी सम्पूर्ण सुन्दरता तथा दर्शक के मन पर उसके प्रभाव का चित्रण करते हें।

लाज की मादक सुरा सी लालिमा

फैल गालों में, नवीन गुलाब-से

छलकती थी वाद सी सौन्दर्य की

इन पंक्तियों में कपोलों के सौन्दर्य का चित्रण मात्र नहीं है, उसके प्रभाव का वर्णन हे।

उनकी प्रणयानुभूति भी स्थूल, मांसल, शरीरी न होकर सूक्ष्म हे और उनके काव्य में भी अन्य छायावादी कवियों के समान वेदना का भाव प्रमुख है। भवभूति, जायसी, घनानन्द की तरह पंत भी विरह को प्रेम का तप्त स्वर्ण मानते हैं। वह कविता का स्रोत ही कवि के हृदय की वेदना में मानते हैं।

वियोगी होगा पहला कवि

आह से उपजा होगा गान

उमड़कर आँखों से चुपचाप

बही होगी कविता अनजान

पंतजी का प्रथम प्रेम असफल रहा, ग्रंथि-बंधन न हो सका और उनका सम्पूर्ण जीवन महादेवी की तरह जीवन-सहचर के अभाव में सूना, एकाकीपन के भार से दबा रहा। परन्तु वह कबीर तथा कवसयित्री महादेवी के समान विरह को वरदान मानते हें,

कल्पना की मुक्त उड़ान-जिस प्रकार पश्चिम के रोमांटिक युग में कॉलरिज, वर्ड्सवर्थ, शैले और कौट्स ने न केवल अपनी काव्यकृतियों में स्वच्छन्द कल्पना का प्रयोग किया है, अपितु सामीष्य में कल्पना तत्त्व के महत्त्व तथा प्रयोग पर गंभीर-गूढ़ सैद्धान्तिक चर्चा भी की है, उसी प्रकार छायावादी कवियों ने कल्पना-शक्ति के महत्त्व को समझकर उसकी प्रशंसा की है। उसे कविता-कानन की रानी कहा हे। प्रकृति-चित्रण, नारी-सोन्दर्य के अंकन, प्रणयानुभूति की अभिव्यक्ति सर्वत्र कवियों ने स्वच्छन्द कल्पना का प्रयोग कर अपनी रचनाओं को अभिनव आकर्षण प्रदान किया है। इनकी मूल उद्भावनाओं, अलंकार-योजना, बिम्ब-विधान, प्रतीकों के प्रयोग सब में उनकी कल्पना गतिशील हे, उसके द्वारा इन्होंने काव्य और कथन पद्धति दोनों में नूतन उद्भावनाएं प्रस्तुत की हैं। ये कवि स्वणद्रष्टा भी थे तथा सौन्दर्य प्रेमी भी। अत: अपने स्वप्नों को साकार करने तथा सोन्दर्य चित्रों के अंकन दोनों में उन्होंने मौलिक उद्भावनाएं की हें। पंतजी ने तरु के नीचे छाया को नल द्वारा परित्यक्त दमयन्ती कहा हे,

कहो कौन तुम दमयन्ती-सी तरु के नीचे सोयीं

हाय, तुम्हें भी त्याग गया क्‍या भाल नल-सा निष्ठुर कोई।

'बादल' कविता में बादल के लिए प्रयुक्त संबोधनों में कल्पना की प्रचुरता देखी जा सकती है। कभी वह उसे सुरपति के अनुचर, कभी जगत्प्राण के सहचर कहता है तथा कभी उनकी गति को देखकर उनकी तुलना मृग, शशक, हाथी, गृध से करता हे।

इस कविता में बादल एक सजीव सत्ता के रूप में अपना परिचय देता है और कवि जब बादलों के आकाश में धीरे-धीरे प्रकट होने, फैलने, उमड़ने आदि का वर्णन करने लगता है, तो मूर्त के लिए अमूर्त भावों-संशय, अपयश, मोह, लालसा, चिन्ता आदि का प्रयोग करता है। यह भी उसकी मौलिक उद्भावना एवं कल्पनाप्रवणता का प्रमाण है,

धीरे-धीरे संशय से उठ

बढ़ अपयश-से शीघ्र अछोर

नभ के उर में उमड़ भोर-से

फैल लालसा-से निशि-भोर

प्रकृति-चित्रण के असंख्य चित्रों में पंत की कल्पना शक्ति का वैभव देखा जा सकता हे। इसी प्रकार प्रणयी हृदय के सूक्ष्म भावों के अंकन में पंतजी ने अनूठी कल्पना का परिचय दिया हे।

ध्वन्यात्मकता-पंत के काव्य में जहाँ कोमल भावों तथा प्रकृति के सुरम्य वातावरण का चित्रण हुआ हे, वहाँ कोमल ध्वनियों वाले शब्दों का प्रयोग किया गया है। वर्षाकालीन रात के सनन्‍नाटे में पपीहा, दादुर, झींगरों तथा बादलों की गर्जन, रिमझिम वर्षा की ध्वनियों का प्रयोग कर संगीतमय वातावरण की सृष्टि की गई हे,

पपीहों की यह पीन पुकार, निर्झरों की भारी झरझर

झींगुरों की झीनी झंकार, घनों की गुरु गंभीर कहर

बिंदुओं की छननी छनकर दादुरों के वे दुहरे स्वर

अनुप्रास के प्रयोग के कारण काव्य का सौन्दर्य ओर भी बढ़ गया हे।

संध्या के झुटपुटे में पक्षियों का कलरव भी ध्वन्यात्मकता की सृष्टि करता हे,

हैं चहक रहीं चिड़ियाँ

टी वी टी-टुट टुट

जहाँ प्रकृति का रौद्र रूप चित्रित किया गया है, वहाँ कवि ने कठोर वर्णों तथा संयुक्त पदों का प्रयोग किया है,

शत शत फेनोच्छवासित फूत्कार भयंकर

ध्वन्यात्मकता के इस गुण को अंग्रेजी में ऑनोमेटोपिया अलंकार कहा गया हेै।

अलंकार योजना-छायावादी कवियों की अलंकार-योजना सायास नहीं है। कविता में अलंकार भावों के साथ उसी प्रकर उमड़ कर आते हैं, जेसे सागर की तरंगों से मणि-मोती या नदी की लहरों से सीपी। उन्होंने पंत के काव्य में परम्परा से प्राप्त अलंकार उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक आदि तो हें ही, कुछ पाश्चात्य अलंकारों का भी प्रयोग किया गया हे जेसे मानवीकरण और विशेषण विपर्यय, सादृश्यमूलक अलंकारों की विशेषता है नये उपमानों का प्रयोग और मूर्त उपमेय के लिए अमूर्त उपमानों का प्रयोग, 

धीरे-धीरे संशय से उठ

बढ़ अपयज्ञ से शीघ्र अछोर

नभ के उर में उमड़ भोर से

फैल लालसा से निशि-भोर

यहाँ मूर्त बादलों की गति की तुलना अमूर्त, सूक्ष्म मानव मनोभावों से की गई है।

पंत के काव्य में प्रतीकों का भी प्रयोग किया गया हे, काव्य में भी तथा स्वर्ण काव्य में भी।

उषा का था उर में आवास

मुकुल का मुख में मृदुल विकास

चांदनी का स्वभाव में हास

विचारों में बच्चों के सांस

जहाँ उषा, चांदनी, मुकुल परम्परागत प्रतीक हें, वहाँ भोले-भाले विचारों के लिए बच्चों की सांस नया प्रतीक है।

इस प्रकार पंत के काव्य में छायावादी काव्य के सब गुण विद्यमान हैं ओर उन्हें हिन्दी छायावादी काव्य के चार प्रमुख स्तंभों में गिना जाता हे।

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