लोंजाइनस ने काव्य को श्रेष्ठ बनाने वाले तत्वों पर विचार करते हुए इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। वे उदात्त को काव्य को श्रेष्ठ बनाने वाला तथा कवि को प्रतिष्ठा दिलाने वाल्रा तत्व मानते हैं। यह उदात्त महान विचारों संगठित अलंकार योजना, अभिजात्य पद रचना तथा प्रभाव की गरिमा में निहित है। वे वागाडंबर बालेयता और भावाडंबर को उदादूत्ता में बाधक तत्व मानते हैं।लरोॉंजाइनस का उदात्त सिद्धान्त पाश्चात्य समीक्षा की देन है। उनका उदात्त' जीवन के अर्जित पक्ष की अभिव्यक्ति हैं, मधुर पक्ष के लिए उसमें कोई स्थान नहीं है। अतः जीवन के आधे पक्ष का विवेचन करने के कारण उनका शास्त्र अधूरा है। भारतीय काव्यशास्त्र की पूर्णता उसमें कहाँ, जिसमें ओज के साथ माधुर्य गुण भी है। एक ओर वीर और अद्भुत रस है तो दूसरी ओर शुृंगार और हास्य रस हैं। वह सम्पूर्ण मानव की कृति है। लॉजाइनस की धारणा में इस एकांगिता का कारण यह है कि उसने अपने ग्रन्थ की रचना भाषण-शास्त्र के रूप में की थी, काव्यशास्त्र के रूप में नहीं। इसीलिए सफल भाषण के लिए महत्त्वपूर्ण तत्त्वों का ही निर्वेचन इसमें मिलता है।परवर्ती समीक्षकों में हीगेल ने उदात्त के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए उसकी तुलना सौन्दर्य से की है। उसके मतानुसार सौन्दर्य का अर्थ है सामंजस्य। सौन्दर्य में वस्तु और कला पक्ष का सामंजस्य रहता है। उदात्त की स्थिति सुन्दर से भिन्न है। उदात्त वह है जहाँ उसका भाव उसके रूप की अपेक्षा अधिक प्रशसर्त और विल्रष्ट होता है। हीगेल यह भी मानते हैं कि उदात्त के मूत्र में विचारों की उत्कृष्टता है और विचारों की महत्ता व्यक्ति के उच्च चरित्र से जन्म पाती है। व्यक्ति का चरित्र महान है तो उसके विचार भी महान होंगे।
एडमंड बर्क ने लॉजाइनस दूवारा विवेचित प्रतिभा-प्रसूत कल्पना तथा विचार भावना आदि की विशात्रता के आधार पर उदात्त के स्वरूप की स्पष्टीकरण करते हुए कहा है कि जिस वस्तु या रचना में प्रभावित करने की शक्ति है और जो अपने अभिनव प्रभाव से प्रेक्षक को चकित कर सकती है, वहीं उदात्ततव्य समझना चाहिए।
उदात्त-तत्त्व की रचना का उदाहरण हम पिरामिड तथा रामचरित्र-मानस के सुन्दर काण्ड में प्रस्तुत हनुमान के विराट रूप, महाभारत में कृष्ण के विराट रूप आदि को ले सकते हैं। बक ने उदात्त-तत्त्व पदार्थों के अतिरिक्त ध्वनि के भीतर भी स्वीकार किया है, जैसे भारी आँधी, विशाल प्रपात, बिजली की गरज, तोपों की गर्जना में भी उदात्त-तत्त्व रहता है। वस्तुतः सौन्दर्य की अपेक्षा अक्खड़पन उदात्त से अधिक निकट हैं।
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