रचनाकारों की रचनाओं से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक समस्याओं को कवियों ने अपना विषय बनाया। युग करवट ले रहा था। घीसी-पीटी पुरानी मान्यताएँ अपने आप जर्जरित मकान के समान झर रही थीं। नई मान्यताओं से नए युग के निर्माण की नींव डाली जा रही थी। अब हम इस युग की साहित्यिक प्रवृत्तियों की चर्चा करेंगे जिससे आपको यह समझने में कठिनाई न हो कि बदलाव किस रूप में आया।
विषयों की व्यापकता
हम यह अध्ययन कर चुके हैं कि महावीरप्रसाद द्विवेदी के व्यक्तित्व के कारण एक नए युग की शुरुआत हुई। द्विवेदी जी स्वयं साहित्यकार थे। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों में रचनाएँ कीं। किंतु इनके अलावा उनका सबसे बड़ा कार्य था- हिंदी भाषा साहित्य को परिमार्जित रूप देना। वे साहित्यकार से ज्यादा एक महान संपादक के रूप में याद किए जाते हैं। तत्कालीन साहित्यकारों को उत्कृष्ट साहित्य रचना के लिए वे सदा प्रेरित करते रहे। साहित्य किस प्रकार देश के उत्थान में योगदान देता है और उसकी क्रांतिकारी भूमिका किस प्रकार की होती है उसके संबंध में द्विवेदी जी ने लिखा :
“आँख उठा कर जरा और देशों और जातियों की ओर तो देखिए। आप देखेंगे कि साहित्य ने वहाँ की साग्राजिक और राजकीय स्थितियों में कैसे- कैसे परिवर्तन कर डाले हैं साहित्य ने ही वहाँ समाज की दशा कुछ की कुछ कर दी है; शासन प्रबंध में बड़े- बड़े उथल- एथल कर डाले हैं. यहाँ तक कि अनुदार धार्मिक भावों को भी जड़ से उखाड़ फेंका है। साहित्य में जो शक्ति छिपी रहती है वह तोप, तलवार और बंब के योलों में भी नहीं पाई जाती। योरोप में हानिकारिणी धार्मिक रूढ़ियों का उत्पादन साहित्य ही ने किया है. जातीय स्वतंत्रता के बीज उसी ने बोया है. व्यक्तियत स्वातंत्रय के भावों को भी उसी ने पाला प्रोसा और बढ़ाया है; पतित देशों का पुनरुत्थान भी उसी ने किया है। पाप की ग्रभुत्ता को किसने कम किया है? फ्रांस में प्रजा की सत्ता का उत्पादन और उन्नयन किसने किया है पादाक्रांत इटली का मस्तक किसने ऊँचा उठाया है? साहित्य ने; साहित्य ने; साहित्य ने”
इस प्रकार साहित्य को उपयोगी बनाने के लिए उन्होंने पश्चिम में हुए क्रांति का उदाहरण दिया। भारतेंदु युग से ही साहित्य के विषय-वस्तु में परिवर्तन शुरू हो गया था। स्वयं भारतेंदु ने विभिन्न विषयों पर लेखन किया और अपने समय के लेखकों को इसी कार्य के लिए प्रेरित किया। द्विवेदी युग में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि क्षेत्रों में तेज़ी से बदलाव आ रहा था। प्रगतिशील विचारों का प्रचार हो रहा था। स्वयं द्विवेदी जी साहित्य में विविध विषयों के पक्षपाती थे। 1901 ई. वाले “कवि कर्तव्य' लेख में द्विवेदी जी ने कविता के विषय के बारे में लिखा था, यह विचार उस समय के संपूर्ण साहित्य पर लागू होता है :
“कविता का विषय मनोरंजक और उपदेशजनक होना चाहिए। यमुना के किनारे केलि कौतुहल का अदभुत वर्णन बहुत हो चुका। न परकीयाओं पर प्रबंध लिखने की अब कोई आवश्यकता है, और न स्वकीयाओं के “गतागत' की पहेली बुझाने की। चींटी से लेकर हाथी पर्यत; पशु, भिक्षुक से लेकर राजा पर्यत; मनुष्य, बिंदु से लेकर समुद्र पर्यत; जल, अनंत आकाश, अनंत पृथ्वी, अनंत पर्वत, समी पर कविता हो सकती है, सभी से उपदेश मिल सकता है और सभी के वर्णन से मनोरंजन हो सकता है। फिर क्या कारण है कि इन विषयों को छोड़कर स्त्रियों की चेष्टाओं का वर्णन करना ही कोई-कोई कवि कविता की चरम सीमा समझते हैं। केवल अविचार और अंध परंपरा ।“
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