बहुसंस्कृतिवाद आज के बदलते संसार में एक सामाजिक वास्तविकता के रूप में उभरा है। शिक्षाशास्त्रियों ने समाजों की शैक्षिक आवश्यकता के कारण शिक्षा में ‘बहुसंस्कृतिवाद’ नामक विशिष्ट परिप्रेक्ष्य विकसित किया। आत्मसातीकरण प्रक्रिया, विलीनीकरण अवस्था, सांस्कृतिक विकल्प की विचारधारा, सांस्कृतिक अनेकवाद आदि बहुसंस्कृतिवाद हेतु अनिवार्य उपागम हैं।बहुसंस्कृतिकवाद भूमंडलीकरण के दौर की एक खास विशेषता है जिसने विश्व ग्राम की संकल्पना को साकार किया है। इस संकल्पना के तहत शिक्षा व्यवस्था को भी प्रसार का पूर्ण अवसर मिला।विविध सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अवस्थाओं का एक मंच पर उपस्थित होना शिक्षा जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन था अतः उपेक्षितों को अपने ही देश में वैश्विक स्तर की शिक्षा एवं संस्कृति मिल रही थी, जो उनकी पहुँच एवं प्रतिदर्श वृद्धि कर रही थी।
संस्कृति, समाज और बहुसंस्कृतिवाद संस्कृति और समाज क्या है?-संस्कृतियाँ एक-दूसरे से श्रेष्ठ नहीं होती लेकिन एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं। संस्कृति का मतलब रीति-रिवाज, परंपराएं, कला, व्यवहार संगीत आदि है। इन्हें समाज में विरासत के रूप में प्राप्त करते हैं और यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है। इन संस्कृतियों में भी अनेक प्रकार की संस्कृति होती है। इनमें अनेक परिवर्तन आते रहते हैं। प्रजातीय, जातीय, नृजातीय, भाषायी, वर्गीय, व्यावसायिक, लैंगिक एवं धार्मिक ये समाजों की उपसंस्कृतियाँ हैं जो समाज में सांस्कृतिक व्यवहार से परस्पर भिन्न होती हैं। अतः संस्कृति जहां अपरिवर्तनीय एवं मानवीय विकास में स्थायी होती हैं, वहीं समाज परिवर्तनीय होता है। संस्कृति समाज की पहचान होती है।
बहुसांस्कृतिक समाज-बहुसांस्कृतिक समाज का आधार एक-दूसरे की संस्कृति के प्रति सम्मान और सहनशीलता का भाव है। | बहुसांस्कृतिक समाजों में कुछ ऐसे जनसमूह आते हैं जो सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक रूप से समाजों में अपनी पहचान एवं समान अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं। बहुसांस्कृतिक समाज सांस्कृतिक अधिकारों के लिए सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से नृजातीय एवं धार्मिक समूहों को अवसर प्रदान करते हैं। बहुसांस्कृतिक शिक्षा में सांस्कृतिक भिन्नताएँ बहुसांस्कृतिवाद शिक्षा में शिक्षार्थी व्यवहार, जीवनशैली, पहचान, विचार और सोच संबंधी एक ही संस्कृति से संबंध रखता है। कोई भी संस्कृति एक-दूसरे से श्रेष्ठ नहीं होती। संस्कृति के सदस्य भी संस्कृति के अनेक तत्त्वों में सहभागी होते हैं। संस्कृतिकरण और समाजीकरण सीखा और एक-दूसरे को बाँटा जाता है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा में कुछ विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति का लक्ष्य रखा जाता है जिनके अंतर्गत सांस्कृतिक समृद्धि एवं निकृस्तता से परे व्यक्ति सभी संस्कृतियों के प्रति सम्मान व्यक्त करता है।
सांस्कृतिक रूप से स्वयं का अभिजात्य समझने के कारण ही अनेक नृजातीय संस्कृति वाली जनजाति उपेक्षित रही जाती है कई बार संस्कृतियों में समानता के रूप भी परिवर्तन होते हैं। सांस्कृतिक समन्वय से व्यक्ति कई प्रकार के व्यवहारों का अर्जन करता है तथा यह सार्वभौमयवाद की दिशा में अग्रसर होता है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा के आयाम अनेक प्रकार की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आए छात्रों को विद्यालय में प्रवेश सुनिश्चित एवं आवश्यक समझा जाता है। इससे बहुसांस्कृतिक शिक्षा को समझने में आसानी होगी। सांस्कृतिक भिन्नताएँ बहुसांस्कृतिक शिक्षा में बहुमूल्य संसाधन होती हैं। बहुसांस्कृतिक शिक्षा का एक अन्य पहलू लोकतांत्रिक मूल्य है। लोकतांत्रिक मूल्यों एवं धारणाओं पर बहुसांस्कृतिक शिक्षा का अध्यापन एवं अध्ययन आधारित होता है।
बहुसांस्कृतिक शिक्षा द्वारा समुचित ज्ञान और कौशल मिलता है। इसके कारण नस्लीय भेदभाव और अन्य प्रकार के भेदभावों से संघर्ष करने का ज्ञान मिलता है। लोकतंत्र में बहुसांस्कृतिक समाज को सदा ही बहुत महत्त्व दिया गया है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा क्यों आवश्यक है? बहुसांस्कृतिक शिक्षा भूमंडलीय संसार में एक आवश्यकता बन गई है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है समस्त छात्र समुदाय के लिए शिक्षा में समानता का अधिकार समान शिक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। शिक्षा व्यवस्था में छात्र ऐसी शिक्षा प्राप्त कर सकें जो एक दूसरे से भिन्न न हो। सांस्कृतिक व्यवहारों के लिहाज से अनेकवादी समाजों में भिन्न-भिन्न कठिनाई होती है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा समाजीकरण प्रतिमानों, खानपान की आदतों, व्यवहार, वेशभूषा, मानदण्डों आदि इन आवश्यकताओं के प्रति बहुत ही संवेदनशील होती है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा इन अनेकताओं को पहचान कर इनके बीच संतुलन ला देती है।
बहुसांस्कृतिक शिक्षा प्रदूषण, गरीबी, जनसंख्या का बढ़ना, परमाणु शस्त्र, भुखमरी, एड्स एवं अनेक प्रकार की बीमारियाँ आदि को समझने के लिए एक मंच प्रदान करती हैं। बहुसांस्कृतिक शिक्षा मानवाधिकारों, सामाजिक न्याय एवं वैकल्पिक जीवन चयनाधिकारों, सम्मान आदि के प्रति उसकी वचनबद्धता को समझने के लिए स्थान एवं मंच प्रदान करती है। बहुसंस्कृतिवाद हेतु उपागम :
आत्मसातीकरण-बहुसांस्कृतिक समाज की उपसंस्कृतियों के समेकन की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया आत्मसातिकरण अर्थात स्वांगीकरण है। आंग्ल-अनुरूपता और घरिया या कुढ़ालीपन अमेरिका के संदर्भ में इन दो पहलुओं का प्रायः उल्लेख किया जाता है। आंगल अनुरूपता सिद्धांत पैतृक संस्कृति के पूरी तरह परित्याग की अपेक्षा रखता था। मेजबान समाज या प्रभावी संस्कृति में घुलमिल जाए और अपनी परंपराए छोड़ दे। यह अपेक्षा नृजातीय अल्पसंख्यक वर्ग से की जाती है। इसी को कुढ़ालीपन या घरि या कहते हैं।
सांस्कृतिक अनेकवाद-अमेरिका के संदर्भ में ही एक विशिष्ट परिप्रेक्ष्य सांस्कृतिक अनेकवाद या अनेकवाद है। सांस्कृतिक अनेकवाद का तात्पर्य यह है नृजातीय सांस्कृतिक परंपरा एवं समूह का अस्तित्व कायम रख सके और उसी समय अमेरिका के आम नागरिक पर उत्तरदायित्व निभाने में हस्तक्षेप न हो सके।
स्वैच्छिक सांस्कृतिक विकल्प संबंधी विचारधारा-सांस्कृतिक अनेकवाद ने व्यक्ति को नृजाति से संबद्ध एक संकीर्ण पहचान की नजर से देखा है। बहुसांस्कृतिक शिक्षा : उद्देश्य और कार्यनीतियाँ शिक्षक शिक्षार्थियों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की जानकारी ले। यह बहुसांस्कृतिक परिवेश में बहुत आवश्यक है। सांस्कृतिक भिन्नताओं का शैक्षिक प्रक्रियाओं में सकारात्मक रूप से लाभ उठा सके। विविध संसाधनों के रूप में बहुसांस्कृतिक शिक्षा में सांस्कृतिक भिन्नताओं को मान्यता दी जाती है।
(i) पाठ्यपुस्तक में बहुसांस्कृतिक विज़यवस्तु हेतु सुग्राह्यता एवं विवेचनात्मकता-बहुसंस्कृतिवाद के प्रति संवेदनशील हो, यह अपेक्षा पाठ्यपुस्तक लेखकों और अध्यापकों दोनों से की जाती है। चित्र निरूपण एवं दृष्टांत में किसी समूह की अदृश्यता को बहुसंख्यक प्रधान समाज में राष्ट्रीय अभिव्यक्ति के रूप में लिया जाता है। शिक्षार्थियों को पूर्वाग्रह ऐतिहासिक, समकालीन एवं घटनाओं की जटिलता का अहसास करने से रोकते हैं। चाहे “पुरुष हो या स्त्री”।
पाठ्यपुस्तक सामाजिक सच्चाई को प्रस्तुत करती है। सामाजिक आंदोलनों, असंतोष, यौन-शिक्षा, तलाक आदि विवादास्पद मुद्दों की चर्चा से बचा जाता है। जीवन संबंधी इन पहलुओं को पाठ्यचर्या में किंचित ही समेकित किया गया है।
(ii) बहुसांस्कृतिक पाठ्यक्रम का विकास
(क) उपलब्धि-पाठ्यक्रम में पर्याप्त रूप से संगीत, कला, खेल, शिक्षा, राजनीति आदि के क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की उपसंस्कृतियों की उपलब्धियों को प्रस्तुत किया जाए।
(ख) छात्रों की आवाज-बहुसांस्कृतिक शिक्षा के अनिवार्य अंग छात्र-जीवन के अनुभवों से लिए गए उदाहरण हैं। यहाँ छात्रों से अध्यापक नियमित रूप से बातचीत करते हैं।
(ग) संप्रेषण-अध्यापक और विद्यार्थी के बीच सांस्कृतिक भिन्नताओं की समस्या होती है। इस समस्या से बचने के लिए अध्यापकों को अन्त:क्रिया द्वारा छात्रों की दशाओं एवं आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
(घ)अध्यापन एवं अध्ययन शैली-समाजीकरण अध्यापन एवं अध्ययन शैलियों के अंतर्गत व्यक्तिगत भिन्नताओं को मन से दूर करने । के लिए एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(ङ) औपचारिक पाठ्यक्रम-बहुसांस्कृतिक शिक्षा में सांस्कृतिक विविधता में शिक्षक सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को सकारात्मक रूप से समेकित करने की कोशिश करते हैं। समकालीन सांस्कृतिक बहुसांस्कृतिक इतिहास की सुसंपन्नता एवं सभी संस्कृतियों के योगदान से निर्मित है।
समकालीन सांस्कृतिक रूप से छात्र के परिचय को बढ़ावा मिला है। छात्र और पाठ्यचर्या में बहुसांस्कृतिक शिक्षा में समसामयिक एवं ऐतिहासिक मुद्दों का आलोचनात्मक अध्ययन करता है। पाठ्यक्रम में संस्कृतियों की भिन्नताओं को दूर करने के लिए सकारात्मक भूमिकाओं में प्रस्तुत करना महत्त्वपूर्ण है।
(च) प्रच्छन्न पाठ्यक्रम-प्रच्छन्न पाठ्यक्रम को बहुसांस्कृतिक शिक्षा में औपचारिक रूप से नहीं पढ़ाया जाता। प्रच्छन्न का अर्थ गुप्त पाठ्यक्रम है। औपचारिक पाठ्यक्रम में मूल्यों एवं मानदंडों के कुछ हिस्से छिपे रहते हैं। बहुसांस्कृतिक शिक्षा छात्रों की जिज्ञासा को बढ़ावा देती है। अध्यापक अध्ययन में बाधा उत्पन्न न करे, इस बात को जानने के लिए छात्रों और शिक्षक की अंत:क्रियाओं का मूल्यांकन करती
(छ) आलोचनात्मक चिंतन-लोकतांत्रिक समाज में छात्रों को आलोचनात्मक तरीके से सोचने की शिक्षा देना अनिवार्य है। जाति, वर्ग, प्रजाति, लिंग, नृजाति, आयु आदि बहुसांस्कृतिक शिक्षा सामाजिक-सांस्कृतिक सच्चाई से संबंधित हैं।
(ज) अनुभव सच्चाइयाँ-समुदायों, उनके सांस्कृतिक मूल्यों एवं पहचानों को बहुसांस्कृतिक शिक्षा में शिक्षक के लिए अनुभव लेना आवश्यक है ताकि शिक्षक छात्रों के लिए निर्देशानुसार पाठ्यक्रम तैयार कर सकें। अध्यापक समाज की भावनाओं को समझकर समाज की सच्चाइयों को छात्रों को बताए।
(झ) समुदाय संसाधन-लघुकथाएं, कविताएं, प्रयुक्त प्रौद्योगिकी, वक्तागण, नेतागण आदि समुदायों के संसाधनों को कक्षा में शामिल किया जाए। ज्ञान अध्ययन एवं अध्ययन उद्देश्यों की संवेदनशीलता को व्यापक रूप से प्रयोग किया जाए। समुदाय ज्ञान का भंडार होता है।
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